'दुःख से आनंद तक चेतना के विभिन्न स्तर हैं । प्रत्येक स्तर के अनुसार हमारे मन में विशिष्ट भावनाएं उत्पन्न होती हैं, साथ ही जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी बदलता है । प्रस्तुत लेख में चेतना के विभिन्न स्तरों तथा उनका ग्रहयोगों से संबंध, इनका विवेचन किया गया है ।
१. चेतना से संबंधित सैद्धांतिक विवेचन
१ अ. चेतना क्या है ? : मनुष्य को अपने अस्तित्व का बोध होता है । चेतना अर्थात जागरूकता (Awareness) । इस चेतना का स्रोत आत्मा (चैतन्य) है; परंतु जीव को 'मैं अमुक हूं', ऐसी अनुभूति अहं के कारण होती है । जीव में अहं की मात्रा के अनुसार उसकी चेतना का स्वरूप बदलता है । उदाहरणार्थ, अहं अधिक होने पर व्यक्ति को 'मैं शरीर हूं', ऐसी, तो अहं अल्प होने पर 'मैं चैतन्य हूं', ऐसी अनुभूति होती है ।
१ आ. चेतना के प्रत्येक स्तर के अनुसार व्यक्ति के मन की स्थिति भिन्न होना : चेतना के प्रत्येक स्तर पर मन की स्थिति, मन में उत्पन्न होने वाली भावनाएं, मन द्वारा दी जानेवाली प्रतिक्रिया आदि सभी भिन्न होते हैं । चेतना के निम्न स्तर संकुचित होते हैं, जबकि उच्च स्तर व्यापक होते हैं । निम्न स्तरों की चेतना के कारण मन में काम, क्रोध, द्वेष, मत्सर आदि नकारात्मक भावनाएं उत्पन्न होती हैं, जबकि उच्च स्तरों की चेतना के कारण मन में प्रेम, सद्भाव, जिज्ञासा, आनंद आदि सकारात्मक भावनाएं उत्पन्न होती हैं ।
२. व्यक्ति की चेतना के विभिन्न स्तर और उनका ग्रहों से संबंध !
श्री. राज कर्वेअमेरिका के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. डेविड आर. हॉकिन्स (मृत्यु - वर्ष २०१२) ने 'व्यक्ति की चेतना के विभिन्न स्तरों के अनुसार उसकी मानसिक स्थिति कैसी होती है ?', इसका मूल्यांकन किया है । इस मूल्यांकन को उन्होंने 'Map of Consciousness' नाम दिया । यह मूल्यांकन 'चेतना के प्रत्येक स्तर पर व्यक्ति के मन में कौन-सी भावनाएं उत्पन्न होती हैं ? साथ ही व्यक्ति जीवन और ईश्वर की ओर किस दृष्टिकोण से देखता है ?', यह दर्शाता है । व्यक्ति की भावनाओं और उसके दृष्टिकोण आदि का ग्रहों से भी संबंध है; क्योंकि ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जन्मकुंडली के ग्रह व्यक्ति के चित्त में स्थित संस्कारों को दर्शाते हैं । चित्त के संस्कारों के अनुसार ही व्यक्ति की भावनाएं एवं दृष्टिकोण आदि होते हैं । चेतना के विभिन्न स्तर, उनमें कार्यरत भावनाएं तथा उनका ग्रहों से संबंध, इनका विवेचन आगे दिया गया है ।
टिप्पणी : डॉ. डेविड आर. हॉकिन्स ने प्रत्येक स्तर को जो मूल अंग्रेजी नाम दिया है, वह कोष्ठक में दिया गया है ।
२ अ. दुःखप्रधान स्तर : इसमें क्रमशः 'लज्जा', 'अपराधबोध', 'निराशा', 'शोक' और 'भय', ये स्तर हैं । इन स्तरों पर व्यक्ति निराश, कर्तव्य से बचनेवाला, ऊर्जाहीन और दुर्बल होता है । वह मन से टूट चुका होता है । उसे जीवन कारागार का दंड प्रतीत होता है । वह ईश्वर को 'निष्ठुर और दंड देनेवाला' मानता है ।
२ अ १. लज्जा (Shame)
यह सबसे निम्न स्तर है । किसी व्यक्ति को दूसरों द्वारा निरंतर तुच्छ समझे जाने अथवा अपनी असमर्थता के कारण स्वयं पर लज्जा आती है । वह स्वयं से घृणा करता है । उसे अपना कोई मूल्य नहीं लगता । उसे जीवन अच्छा नहीं लगता, साथ ही उसे जीवन समाप्त कर देने की इच्छा होती है ।
२ अ २. अपराधबोध (Guilt)
इस स्तर पर व्यक्ति को दूसरों द्वारा निरंतर दोष दिए जाने अथवा स्वयं से हुई गंभीर भूलों के कारण अपराधबोध होता रहता है । वह सदैव स्वयं को दोष देता है, साथ ही स्वयं को दंडित करता है । वह भूतकाल की घटनाओं में उलझा रहता है तथा स्वयं को क्षमा नहीं करता ।
२ अ ३. निराशा (Apathy)
इस स्तर का व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों, बाधाओं, असफलताओं, अकार्यक्षमता आदि के कारण निराश रहता है । 'जीवन में कुछ भी अच्छा, सकारात्मक और उन्नतिकारक नहीं होनेवाला', ऐसी उसकी धारणा बन चुकी होती है । वह भाग्य और बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर रहता है । उसमें प्रयास करने की ऊर्जा नहीं होती ।
२ अ ४. शोक (Grief)
इस स्तर पर व्यक्ति दुःखी होता है । निकट संबंधी की मृत्यु होना, जीवनसाथी से अलग होना, बडी आर्थिक हानि होना आदि दुःखद प्रसंगों के कारण उसे अत्यधिक मानसिक वेदना होती है । वह स्वयं को परिस्थितियों से पीडित मानता है । उसे संपूर्ण संसार दुःखमय प्रतीत होता है ।
२ अ ५. भय (Fear)
इस स्तर पर व्यक्ति को अपने विषय में असुरक्षा का अनुभव होता है । किसी भी कार्य को करने से पूर्व वह संभावित खतरों पर अधिक विचार करता है । उसे सभी बातों में अनिश्चितता अनुभव होती है । उसे भविष्य की चिंता लगी रहती है । इसलिए सुरक्षा प्राप्त करने के लिए वह अपने आसपास के लोगों, परिस्थितियों आदि पर नियंत्रण प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहता है । वह रक्षात्मक भूमिका में रहता है ।
२ आ. दुःखप्रधान स्तरों से संबंधित ग्रहयोग : ग्रह का दूषित होना, अर्थात उसका शत्रु ग्रह के कुयोग में, प्रतिकूल स्थान में, प्रतिकूल राशि में होना आदि ।
२ आ १. दूषित शुक्र : 'शुक्र' ग्रह मानसिक सुख से संबंधित है । कुंडली में शुक्र ग्रह दूषित होने पर पारिवारिक सुख न मिलना, निकट संबंधी की मृत्यु होना, किसी का सहारा न मिलना, जीवन में अत्यधिक कष्ट होना आदि परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं । इससे निराशा, शोक और दुःख आदि का अनुभव होता है ।
२ आ २. दूषित चंद्र : 'चंद्र' मनोबल का द्योतक है । कुंडली में चंद्र दूषित होने पर चिंता, फिक्र, भय, हीनभावना आदि का अनुभव होना, साथ ही अन्य मानसिक कष्ट होने की संभावना रहती है ।
२ आ ३. दूषित बुध :'बुध' ग्रह मस्तिष्क और ग्रहणशक्ति से संबंधित है । कुंडली में बुध ग्रह दूषित होने पर शारीरिक विकलांगता, वाणीदोष, मस्तिष्क का अपर्याप्त विकास, ग्रहणशक्ति अल्प होना आदि के कारण स्वयं पर लज्जा आना, स्वयं को दोष देना, विवशता का अनुभव होना आदि भावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं ।
२ इ १. लालसा (Desire) : इस स्तर पर व्यक्ति बाह्य वस्तुओं के प्रति आसक्त होता है । उसका सुख बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर होता है । वह इंद्रियों, भौतिक वस्तुओं, धन, सत्ता, प्रतिष्ठा आदि के माध्यम से सुख प्राप्त करने के लिए उतावला रहता है । यह प्राप्त न होने पर उसके व्यसनों का शिकार होने की संभावना रहती है । वह दूसरों की व्यावहारिक स्थिति से अपनी तुलना करता है और इस कारण वह असंतुष्ट एवं असमाधानी रहता है ।
२ इ २. क्रोध (Anger) : इस स्तर का व्यक्ति संघर्षप्रिय होता है । वह अपना महत्त्व सिद्ध करने के लिए दूसरों पर वर्चस्व स्थापित करता है । उसके उत्कर्ष के मार्ग में आनेवाली बातों का वह विरोध करता है । वह अवसर आने पर हिंसा का मार्ग भी अपनाता है । जो बातें उसे सुख देती हैं, उनके प्रति वह आसक्त रहता है, जबकि जो बातें उसे दुःख देती हैं, उनसे वह द्वेष करता है । जो लोग उसका समर्थन नहीं करते, उनके साथ वह प्रतिशोध की भावना से व्यवहार करता है ।
२ इ ३. अभिमान (Pride) : इस स्तर पर व्यक्ति स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है । वह दूसरों के बीच अपनी अच्छी छवि बनाए रखने का प्रयास करता है । उसे दूसरों से मान्यता प्राप्त करने की इच्छा रहती है । वह अपनी भूल स्वीकार कर विनम्रता नहीं अपनाता, साथ ही उसमें सीखने की वृत्ति भी अल्प होती है । उसकी वृत्ति बहिर्मुख होती है ।
२ ई. अहंकारप्रधान स्तरों से संबंधित ग्रहयोग
२ ई १. शुक्र, मंगल और राहु के परस्परयोग : कुंडली में शुक्र, मंगल और राहु के परस्पर महत्त्वपूर्ण योग होने पर व्यक्ति में कामनाएं अधिक होती हैं । वह अन्न, वस्त्र, आभूषण, इंद्रियों, भौतिक वस्तुओं आदि के माध्यम से सुख प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है । ये ग्रहयोग विशेषतः पृथ्वीतत्त्व की वृषभ और मकर, साथ ही जलतत्त्व की कर्क एवं वृश्चिक राशि में अधिक प्रभावी होते हैं ।
२ ई २. चंद्र, बुध और मंगल के परस्परयोग : कुंडली में चंद्र, बुध और मंगल के परस्पर महत्त्वपूर्ण योग होने पर व्यक्ति में आलोचना करना, स्पर्धा करना, मनमानी करना, अविवेक, उतावलापन, हठी स्वभाव आदि दोष होते हैं । व्यक्ति मनस्वी (अपने मत के अनुसार आचरण करनेवाला), लहरी और क्रोधी होता है । वह केवल अपने ही सुख और लाभ का विचार करता है ।
२ ई ३. चंद्र, रवि और मंगल के परस्परयोग : कुंडली में चंद्र, रवि और मंगल के परस्पर महत्त्वपूर्ण योग होने पर व्यक्ति में स्वयं को श्रेष्ठ समझना, स्वयं को महत्त्व देना, दूसरों पर वर्चस्व स्थापित करना, अपनी छवि बनाए रखना आदि अहं के पहलू होते हैं । ये योग विशेषतः अग्नितत्त्व की मेष और सिंह, साथ ही पृथ्वीतत्त्व की वृषभ एवं मकर राशि में अधिक प्रभावी होते हैं ।
२ उ. विकासप्रधान स्तर : 'इसमें क्रमशः 'साहस', 'तत्परता', 'स्वीकार भाव' और 'विवेक', ये स्तर हैं । इन स्तरों पर व्यक्ति का मानसिक तथा बौद्धिक विकास होता है । साथ ही व्यक्ति सकारात्मक, कर्मशील तथा परिपक्व बनता है । उसमें उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न होती है तथा सत्य को जानने की जिज्ञासा भी जागृत होती है । उसे जीवन संवाद, समृद्धि, उन्नति और ज्ञान का साधन प्रतीत होता है । वह ईश्वर को दयालु, कृपावान, प्रेरणादायी तथा ज्ञानस्वरूप मानता है ।
२ उ १. साहस (Courage) : इस स्तर पर व्यक्ति स्वयं में परिवर्तन लाने के लिए तैयार होता है । वह परिस्थिति को दोष देने के स्थान पर 'परिस्थिति सुधारने के लिए मैं क्या प्रयास करूं ?', ऐसा विचार करता है । वह अपनी पुरानी आदतों, संकुचित प्रवृत्तियों, नकारात्मक मानसिकता आदि में परिवर्तन करने का प्रयास करता है । वह अपने उत्तरदायित्व का वहन स्वयं करता है । वह केवल कल्पना और तर्क करने की अपेक्षा ठोस प्रयास करने पर अधिक बल देता है ।
२ उ २. तत्परता (Willingness) : इस स्तर पर व्यक्ति में सीखने की वृत्ति उत्पन्न होती है । उसके पूर्वाग्रह कम होने लगते हैं और वह नए विचार, सिद्धांत, तथ्य आदि स्वीकार करने के लिए तैयार होता है । वह परस्पर विरोधी बातों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास करता है । वह कर्मशील, सकारात्मक और उत्साही होता है । उसे स्वयं पर विश्वास होता है तथा वह भविष्य के प्रति भी सकारात्मक रहता है ।
२ उ ३. स्वीकारभाव (Acceptance) : इस स्तर पर व्यक्ति में वैचारिक परिपक्वता आती है । 'अमुक बात अमुक प्रकार से ही होनी चाहिए', ऐसा उसका आग्रह कम हो जाता है । वह अन्य व्यक्तियों के दृष्टिकोण का सम्मान करता है । वह तटस्थ रहकर तथा समस्याओं की जड तक जाकर उनके कारण खोजता है । वह अन्य लोगों को उनके गुण-दोषों सहित स्वीकार करता है । इससे उसका मानसिक संघर्ष कम होता है और संबंधों में सुसंवाद उत्पन्न होता है ।
२ उ ४. विवेक (Reason) : इस स्तर पर व्यक्ति में सत्य की खोज करने की तीव्र लगन उत्पन्न होती है । वह विश्व के भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक तथ्यों का विवेचन करता है । उसे विश्वरूपी पहेली को सुलझाने की उत्सुकता होती है । वह विश्व के अस्तित्व के पीछे निहित अर्थ को जानने का प्रयास करता है । उसके लिए 'ज्ञान' ही जीवन की प्रेरणा होता है । उसमें समाज को उचित ज्ञान देने की तीव्र लगन होती है ।
२ ऊ. विकासप्रधान स्तरों से संबंधित ग्रहयोग
२ ऊ १. 'सूर्य', 'मंगल' और 'गुरु' के परस्पर योग : कुंडली में 'सूर्य', 'मंगल' और 'गुरु' के परस्पर महत्त्वपूर्ण योग होने पर व्यक्ति में महत्त्वाकांक्षा, साहस, दृढ निश्चय, उद्योगशीलता, निर्णयक्षमता तथा उत्तम कार्यक्षमता जैसे गुण होते हैं । उसमें बडे कार्य करने की क्षमता होती है । वह सकारात्मक तथा आशावादी होता है ।
२ ऊ २. 'गुरु' ग्रह का 'चंद्र' एवं 'शुक्र' से योग : 'गुरु' ग्रह स्वभाव में व्यापकता दर्शाता है । कुंडली में गुरु ग्रह का 'चंद्र' एवं 'शुक्र', इन ग्रहों से शुभयोग होने से व्यक्ति में प्रेमभाव, सहानुभूति, सद्भाव, श्रद्धा, सुनने की वृत्ति, स्वीकार करने की वृत्ति, अन्यों की सहायता करना आदि गुण होते हैं । उसका मन आनंदी, उत्साही एवं खुले विचारोंवाला होता है । वह समााज से अच्छे संबंध प्रस्थापित करता है ।
(क्रमशः)
- श्री राज कर्वे, ज्योतिष विशारद, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (२.६.२०२६)

