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नेपाल में तबाही की असली वजह आई सामने! 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ का विशाल हिस्सा 2,000 मीटर नीचे गिरा - Sanjeevni Today

नेपाल में तबाही की असली वजह आई सामने! 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ का विशाल हिस्सा 2,000 मीटर नीचे गिरा - Sanjeevni Today

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के पीछे अब एक बेहद शक्तिशाली प्राकृतिक घटना की तस्वीर सामने आ रही है। वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों के शुरुआती अध्ययन के मुताबिक, उत्तरी लैंगटांग क्षेत्र में करीब 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ और बर्फीला मलबा लगभग 2,000 मीटर नीचे आ गिरा।

इतनी विशाल मात्रा में बर्फ और मलबे के अचानक गिरने से जो ऊर्जा पैदा हुई, उसका असर एक बड़े विस्फोट जैसा महसूस हुआ। विशेषज्ञों के अनुसार, इस घटना ने नदी तंत्र में अचानक भारी मात्रा में पानी, बर्फ, चट्टान और मलबा पहुंचाया, जिसके बाद बाढ़ ने बेहद कम समय में बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लिया।

2,000 मीटर की ऊंचाई से आया बर्फ का विशाल सैलाब

विशेषज्ञों के मुताबिक यह सामान्य हिमस्खलन जैसी छोटी घटना नहीं थी। शुरुआती सैटेलाइट आंकड़ों के आधार पर करीब 25 मिलियन घन मीटर यानी 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ और बर्फीला पदार्थ नीचे की ओर गिरा। यह विशाल हिस्सा करीब 2,000 मीटर की ऊंचाई का अंतर तय करते हुए तेजी से घाटी की तरफ पहुंचा। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में सामग्री के अचानक गिरने से जमीन और आसपास के इलाके पर जबरदस्त ऊर्जा का प्रभाव पड़ा।

भूवैज्ञानिक प्रोफेसर डॉ. रंजन कुमार दहाल के शुरुआती आकलन के अनुसार, इस गिरावट से पैदा हुई ऊर्जा का प्रभाव करीब 5.2 तीव्रता वाले भूकंप के बराबर दर्ज किया गया। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने भी इस घटना से पैदा हुई ऊर्जा को M5.2 भूकंप के बराबर बताया है। हालांकि वैज्ञानिक अभी भी यह अध्ययन कर रहे हैं कि यह पूरी तरह ग्लेशियर का टूटना था या ग्लेशियर से जुड़ा एक बड़ा ढलान-विफलता यानी debris avalanche था।

बर्फ के साथ चट्टान और पानी भी नीचे आया

इस घटना को समझने के लिए केवल बर्फ गिरने की बात पर्याप्त नहीं है। जब इतना बड़ा बर्फीला और चट्टानी हिस्सा तेजी से नीचे आया तो उसने रास्ते में मौजूद पानी, बर्फ, मिट्टी, चट्टानों और अन्य मलबे को भी अपने साथ बहा लिया। इससे एक बेहद तेज और भारी debris flow तैयार हुआ, जिसने नदी की धाराओं को अचानक प्रभावित किया।

यही वजह थी कि बाद में नदी का पानी सामान्य बाढ़ की तरह धीरे-धीरे नहीं बढ़ा, बल्कि बहुत तेज गति से नीचे की ओर पहुंचा। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियर क्षेत्र से रासुवागढ़ी के आसपास के संगम क्षेत्र तक लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर मलबे और पानी का प्रवाह बेहद तेज गति से आगे बढ़ा।

विस्फोट जैसा क्यों हुआ असर?

वैज्ञानिकों के मुताबिक जब करोड़ों घन मीटर बर्फ और मलबा हजारों मीटर नीचे गिरता है तो गुरुत्वाकर्षण के कारण अत्यधिक ऊर्जा पैदा होती है। जमीन से टकराने के बाद यही ऊर्जा आसपास की चट्टानों, बर्फ और पानी को तेजी से आगे धकेल सकती है।

इस मामले में भी गिरते हुए बर्फीले मलबे ने नदी घाटी में मौजूद सामग्री को अपने साथ जोड़ लिया। परिणामस्वरूप पानी और मलबे का एक बेहद शक्तिशाली प्रवाह तैयार हुआ। इसी कारण प्रत्यक्षदर्शियों ने घटना की आवाज और प्रभाव को विस्फोट जैसा बताया।

USGS के अनुसार शुरुआती slope failure से करीब M5.2 के बराबर ऊर्जा पैदा हुई और इसके बाद बना debris flow तथा flood लगभग 100 किलोमीटर तक पहुंचा। इसके करीब तीन घंटे बाद एक दूसरी भूकंपीय घटना भी दर्ज की गई, जिसकी ऊर्जा लगभग M4.2 के बराबर आंकी गई है।

नदी का रास्ता बदला, फिर आई विनाशकारी बाढ़

विशेषज्ञों के मुताबिक बर्फ और चट्टानों के विशाल मलबे ने नदी के प्रवाह को प्रभावित किया। कुछ जगहों पर प्राकृतिक अवरोध बने और पानी जमा हुआ। इसके बाद जब पानी ने रास्ता बनाया तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर चला गया।

इस प्रक्रिया ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी। कुछ स्थानों पर नदी का जलस्तर बहुत तेजी से बढ़ा। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक नदी के स्तर में करीब 30 मिनट के भीतर कई मीटर तक बढ़ोतरी देखी गई।

इसके बाद बाढ़ का असर नेपाल के कई इलाकों में दिखाई दिया। रास्ते, पुल, इमारतें और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुईं। नदी घाटियों में रहने वाले लोगों के लिए यह घटना बेहद अचानक आई, जिससे उन्हें संभलने का पर्याप्त समय नहीं मिल सका।

क्या जलवायु परिवर्तन भी बना वजह?

इस घटना के बाद वैज्ञानिकों का ध्यान हिमालय में बदलते तापमान और ग्लेशियरों की स्थिति पर भी गया है। विशेषज्ञों ने बताया है कि हिमालयी क्षेत्र तेजी से गर्म हो रहा है और ग्लेशियरों के पिघलने तथा पर्वतीय ढलानों के अस्थिर होने का खतरा बढ़ रहा है। हालांकि इस खास घटना को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी। वैज्ञानिक इसके पीछे तापमान, बर्फ की स्थिति, चट्टानों की संरचना और स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों समेत कई कारकों का अध्ययन कर रहे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार लैंगटांग क्षेत्र में हाल के वर्षों में तापमान में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है। शोधकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि लगातार गर्म और ठंडे दौर ने बर्फ तथा पर्वतीय ढलानों की स्थिरता को किस तरह प्रभावित किया।

सबसे बड़ी चुनौती—पहाड़ों में निगरानी और चेतावनी

इस आपदा ने हिमालयी क्षेत्रों में बेहतर निगरानी और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था की जरूरत को भी सामने ला दिया है। ऊंचे और दुर्गम इलाकों में जमीन पर लगातार निगरानी करने वाले मौसम या पर्यावरणीय स्टेशन सीमित हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों को सैटेलाइट तस्वीरों और रिमोट सेंसिंग डेटा पर काफी निर्भर रहना पड़ता है।

संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अधिकारियों ने भी चेतावनी दी है कि हिमालय में ग्लेशियरों से जुड़ी बाढ़ का जोखिम बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में बेहतर सैटेलाइट निगरानी, स्थानीय चेतावनी प्रणाली, जोखिम वाले इलाकों की पहचान और नदी घाटियों में सुरक्षित निर्माण बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

अभी जारी है वैज्ञानिकों का अध्ययन

वैज्ञानिकों की टीम सैटेलाइट तस्वीरों, भौगोलिक मॉडल और घटना से पहले तथा बाद के आंकड़ों का विश्लेषण कर रही है। शुरुआती 2.5 करोड़ घन मीटर का अनुमान अपेक्षाकृत सावधानी बरतते हुए लगाया गया है। कुछ अन्य प्रारंभिक आकलन इससे कहीं अधिक मात्रा की ओर भी संकेत करते हैं, इसलिए अंतिम आंकड़ा आगे के अध्ययन के बाद बदल सकता है।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि नेपाल की इस भीषण आपदा के पीछे एक असाधारण बर्फ-चट्टान ढलान घटना और उसके बाद आया तेज मलबा प्रवाह महत्वपूर्ण भूमिका में था। करोड़ों घन मीटर बर्फ का हजारों मीटर नीचे गिरना, उससे पैदा हुई भारी ऊर्जा और फिर नदी तंत्र में पानी-मलबे का अचानक पहुंचना—इन घटनाओं की श्रृंखला ने बाढ़ को बेहद विनाशकारी बना दिया। वैज्ञानिक अब इस घटना को विस्तार से समझने में जुटे हैं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं के खतरे को पहले पहचानने और लोगों को समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था मजबूत की जा सके।

Author: Rashmi Repoter


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