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नरेन्द्र मोदी: एक सफल 'मीडिया मैनेजर' और एक 'विफल पीएम'?

नरेन्द्र मोदी: एक सफल 'मीडिया मैनेजर' और एक 'विफल पीएम'?

ब किसी देश का प्रधानमंत्री फ़ेल हो जाता है तब यह फेलियर उसका व्यक्तिगत नहीं होता, यह फेलियर राष्ट्रीय होती है, अंतरराष्ट्रीय होती है। ज़्यादा स्पष्ट तरीके से कहें तो, भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री का विफल होना एक राष्ट्रीय आपदा की तरह है।
भारत इस समय ऐसे ही दौर से गुज़र रहा है। नरेंद्र मोदी भारत के अबतक के सर्वाधिक विफल प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उन्हें चुनावों में तो सफलता मिली है, मिल रही है लेकिन इस जीत पर संदेह है, चुनाव आयोग और उसकी भेदभावपूर्ण कार्यप्रणाली ने पूरी चुनाव व्यवस्था को ही संदिग्ध बना दिया है। किसी भी हाल में यह कहना मुमकिन नहीं है कि ऐसे चुनावों के परिणाम भारत के लोगों की इच्छा को व्यक्त करते हैं। संदेह इतना अधिक गहरा हो गया है कि यह कहना मुश्किल है कि क्या नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं भी या नहीं? क्या उनका इस पद पर बने रहने को, भारत के लोगों की स्वीकृति प्राप्त है?

चूँकि भारत एक समृद्ध लोकतांत्रिक विरासत वाला देश हैं, जहाँ सत्ता हस्तांतरण शांतिपूर्वक ढंग से होता है, भले ही हारने वाला पक्ष चुनाव परिणामों को लेकर अपनी असहमति ज़ाहिर करे लेकिन वो खुलकर कभी भारतीय लोकतंत्र के ख़िलाफ़ नहीं खड़ा होता, जैसा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों में होता है, इसलिए नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हुए हैं, इसलिए विपक्षी दल (भेदभाव से भरी) चुनाव प्रक्रिया में भाग लेते हैं और प्रतिरोध के अन्य लोकतांत्रिक तरीके अपनाकर भारत की मजबूत विरासत को बचाकर रखते हैं।

पीएम मोदी की भाषा के संदेश
लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि पीएम मोदी फ़ेल नहीं हैं। उनका फ़ेलियर उनके 'एक्स' अकाउंट में ही दिख जाएगा। आर्थिक रूप से बदहाल और पानी के लिए तरस रहे भारत को देने के लिए पीएम मोदी के पास 'सुभाषित' हैं। अपने एक्स अकाउंट पर एक पोस्ट शेयर करते हुए पीएम मोदी लिखते हैं, "विनम्रता, क्षमाशीलता और उत्तम आचरण ही व्यक्तित्व के सच्चे आभूषण हैं। इन गुणों के साथ ही आज देशवासी विकसित भारत के संकल्प की सिद्धि में निरंतर जुटे हैं।" ऐसे ही कई अन्य सुभाषित हैं जो पीएम मोदी ने शेयर किए हैं। हर सुभाषित अपने साथ एक ऐसा संदेश लिए है जिसका अनुपालन देशवासियों को करना है। एक संवेदनहीन किंग की तरह पेश आ रहे पीएम मोदी चाहते हैं कि देशवासी "विनम्रता, क्षमाशीलता और उत्तम आचरण" जैसे आभूषण धारण करें और 'विकसित भारत' के 'संकल्प' को 'सिद्ध' करे।

कुछ लोगों को यह बिल्कुल आम बात लग रही होगी लेकिन ये बात इतनी आम बात नहीं है और इसे आम समझने वाले लोग बिल्कुल ग़लत हैं। असल में 140 करोड़ लोगों के भविष्य को अपनी हथेली में लेकर चलने वाला नेता जब ऐसी सुभाषित बातें करने लगे तो समझना पड़ेगा कि वो, अब बुरी तरह हारने वाला है। या ये कि अब उसने हार मान ली है। उसने मान लिया है कि उसको दी गई जिम्मेदारियों पर वो ख़रा नहीं उतर पाया इसलिए अब उसे देशवासियों से त्याग और समर्पण चाहिए, उत्तम आचरण चाहिए। जिस व्यक्ति को इसलिए चुनकर भेजा गया था कि वो लोगों का जीवन आसान बना सकेगा, उन्हें सुख-सुविधाएं न सही तो कम से कम मूलभूत सुविधाएं तो उपलब्ध करा ही सकेगा, वो आदमी सुभाषित शेयर करके लोगों को धैर्य का पाठ पढ़ा रहा है।

पीएम को लोगों की नहीं, अपनी 'इमेज' की चिंता?

पीएम मोदी की असफलताएँ और उनकी खुद की अक्षमताएँ उनके सामने खड़े होकर नृत्य कर रही हैं और उस नृत्य से मोदी डर गए हैं। उन्हें लगातार तीसरी बार भारत का प्रधानमंत्री बनने का मौक़ा मिला लेकिन वो देश को कुछ भी महत्वपूर्ण देने में नाकाम रहे। कांग्रेस से उनकी चिढ़, अंबानी परिवार और अडानी समूह को लेकर उनका बेतहाशा प्यार, महिलाओं को अपमानित करने वालों को लेकर उनकी चुप्पी, छात्रों, किसानों और अन्य वर्गों की समस्याओं को लेकर उनका अड़ियल रवैया आज भारत को इस मोड़ पर ले आया है कि पिछले 75 सालों में किए गए अन्य प्रधानमंत्रियों के सारे प्रयास धूल में मिल रहे हैं। लेकिन आज भी पीएम मोदी के लिए प्राथमिकता इस देश के लोग नहीं बल्कि वो ख़ुद हैं। उन्हें सबसे ज़्यादा फ़िक्र अपनी 'इमेज' की है और इस इमेज को चमकाए रखने के लिए उन्होंने पूरे देश को दाँव पर लगा दिया है।यह उनका सबसे प्रिय काम था, जिसे उन्होंने बीबीसी के एक पुराने इंटरव्यू में कहा भी था कि अगर उन्होंने मीडिया को 'मैनेज' कर लिया होता तो 2002 का गुजरात दंगा ऐसा नहीं दिखता जैसा वो दिखा। उनके इस वक्तव्य का मतलब ही यह था कि उन्हें गुजरात दंगे को ख़त्म करने, उसे रोकने आदि में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें सिर्फ़ इस बात में दिलचस्पी थी कि काश वो उसे मीडिया के माध्यम से मैनेज कर पाते जिससे लोगों को उसकी भयावहता ना दिखती। आज जब वो प्रधानमंत्री हैं तो उनका यह सपना पूरा हो चुका है। भारत अपने सबसे बदहाल दौर में है और पीएम मोदी मीडिया के सहयोग से देश की दुर्दशा को सफलतापूर्वक मैनेज करने में लगे हैं जिससे लोगों को भारत की दुर्दशा का अंदाजा भी ना हो!

जल संकट पर नहीं बोले पीएम- 'पानी ज़्यादा पिया करें'

प्रधानमंत्री ने अपने पद के दायित्वों अर्थात अपना काम कभी नहीं किया, वो कैबिनेट की मीटिंग में बैठकर मंत्रियों को सलाह दे रहे हैं कि 'पानी ज़्यादा पिया करें' गर्मी बहुत है। पर ताज्जुब ये है कि उन्हें देशभर में हो रही पानी की कमी पर कुछ नहीं कहना है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भारत दुनिया की 18% आबादी का घर है लेकिन यहाँ दुनियाभर में मौजूद ताजे पानी का मात्र 4% ही उपलब्ध है। इस ताजे पानी का 85% भाग कृषि कार्यों में खर्च हो जाता है, नतीजा यह है कि भारत की 60 करोड़ से अधिक आबादी पानी का घोर संकट झेल रही है। भारत का 70% सतही जल प्रदूषित है। हजारों करोड़ रुपये खर्च करने और ख़ुद गंगा माँ के बेटे बनने के बाद पीएम मोदी गंगा और यमुना जैसी नदियों को 12 साल में साफ़ नहीं कर सके। जिस प्रधानमंत्री को समस्याएं दूर करने के लिए देश की गद्दी मिली थी वो कांग्रेस की सरकारों की समस्याओं को गिनाते थकता नहीं है।

एमपी में जल संकट

20 साल से अधिक हो गए बीजेपी को मध्यप्रदेश की सत्ता में, 12 साल से अधिक हो गया यहाँ 'डबल इंजन' की सरकार चलते हुए। चुनाव दर चुनाव पीएम मोदी वहां जाकर भाषण देते रहे और वादे करते रहे लेकिन मध्यप्रदेश पानी की कमी से जूझ रहा है, मध्य प्रदेश प्यासा है और मोदी जी सुभाषित शेयर करके धीरज की बात कर रहे हैं। पिछले कई सालों से स्वच्छता सर्वेक्षण पर पहले स्थान पर आने वाले इंदौर की हालत को देखना चाहिए। यहाँ पर या तो लोग गंदे पानी पीने से मरने के लिए अभिशप्त हैं या फिर प्यास से मरने के लिए। स्थिति ये है कि इतने महत्वपूर्ण शहर के 50% से अधिक सरकारी बोरवेल सूखे पड़े हैं, शहर के 85 नगरपालिका वार्डों में से 75 प्यास के मारे बिलख रहे हैं। जहाँ पानी है भी वहां का पानी प्रदूषित है। 29 वार्ड ऐसे हैं जहाँ के 98% नमूने खतरनाक बैक्टीरिया से संदूषित पाये गए हैं। सवाल यह है कि सरकार है ही क्यों जब वो पीने के पानी की भी व्यवस्था नहीं कर सकती।

'विश्वगुरु' और 'विकसित भारत' के सपने

पीएम मोदी अपने देश के लोगों के लिए पानी की भी व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं और विश्वगुरु और विकसित भारत जैसे सपने आम भारतीयों को बेचे जा रहे हैं जिससे उनकी सत्ता बनी रहे। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जलस्तर घटकर कुल क्षमता का 35-40% हो चुका है जिसकी वजह से शहर 'कोलेप्स' होने की कगार पर खड़े हैं। हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, जयपुर और बाड़मेर जैसे महत्वपूर्ण शहरों में पानी को लेकर त्राहि-त्राहि मची हुई है और पीएम मोदी के पास कोई प्लान नहीं है, अगर कुछ है तो सुभाषित है। प्यास की वजह को लेकर शहरों में जगह जगह सड़कों पर प्रदर्शन हो रहा है लेकिन 'मैनेज' की हुई मीडिया के पास यह दिखाने से फुर्सत नहीं कि जब मोदी एयरोप्लेन से उतरते हैं तो कोई सहारा नहीं लेते। दुर्भाग्य यह है कि भारत के प्रधानमंत्री की मजबूती इस बात से तय की जा रही है कि वो प्लेन से कैसे उतरता है, आम कैसे खाता है, बटुआ रखता है या नहीं या फिर उसके भीतर कितना स्टैमिना है। मोदी ख़ुद अपनी तारीफ़ में यह कहने से नहीं चूकते कि वो 18 घंटे काम करते हैं।

मुझे बताना पड़ेगा कि इंग्लैंड के इतिहास के सबसे सफल राजनेताओं में से एक, दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैराल्ड विल्सन से जब उनकी सफलता का राज पूछा गया तो उन्होंने कहा कि "एक सफल प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे जरूरी है नींद और इतिहास का ज्ञान"। मोदी जी के पास ये दोनों ही नहीं है। वो ख़ुद कहते हैं कि वो 18 घंटे काम करते हैं मतलब अच्छी नींद नहीं लेते और इतिहास का ज्ञान पीएम मोदी को छूकर भी नहीं गया है।

पीएम मोदी अपनी दुनिया में मस्त हैं जबकि एक दशक का सबसे सूखा मानसून सामने खड़ा है। समस्या सिर्फ़ एल-नीनो जैसी भौगोलिक गतिविधियों की नहीं है, समस्या है एक ऐसे विफल प्रधानमन्त्री और राजनेता की, जिसे यह तक नहीं पता कि उसे देश की प्यास कैसे बुझानी है, देश के खेत क़ैसे सींचे जाएँगे, किसानों को खाद कैसे मिलेगी! उन्हें बिल्कुल नहीं पता कि देश का पेट कैसे भरना है, कैसे देश के लोगों में पोषण की समस्या को दूर करना है!

तमाम रिपोर्ट्स आगाह कर रही थीं कि भारत डायबिटीज और मोटापे की राजधानी बन रहा है लेकिन मोदी सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। NFHS-6 के ताजे आंकड़े बता रहे हैं कि 15-49 वर्ष की 30.7% महिलाएं और 27.3% पुरुष मोटापे का शिकार हो चुके हैं। इसके अलावा 15 वर्ष से अधिक की 17.8% महिलाएं और 20.9% पुरुष डायबिटीज का शिकार हो चुके हैं। मतलब भारत की सबसे प्रोडक्टिव आबादी अब मोटापे और डायबिटीज की शिकार हो रही है और सरकार को यह तक नहीं पता कि करना क्या है?

रुपया गिरा, विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट

यहाँ बात सिर्फ़ लोगों के स्वास्थ्य की नहीं अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य की भी है, देश में शिक्षा और प्रतियोगिता के स्वास्थ्य की भी है और सद्भाव और लोकतांत्रिक स्वास्थ्य की भी है। डॉलर के मुक़ाबले रुपये की कीमत पर स्व. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को कोसने वाले मोदी आज किसी सन्नाटे में गुम हैं। डॉलर और रुपया शब्द उनकी ज़ुबान में ही नहीं आता। उन्हें पता चल चुका है कि शाखा जाने और प्रधानमंत्री बनने में बहुत फ़र्क़ है। एक डॉलर की कीमत 96.96 रुपये को छू चुकी है। आरबीआई द्वारा भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लाखों करोड़ों डॉलर मुद्रा बाजार में बेचने के बाद यह आगे गिरने से रुका लेकिन कब तक डॉलर बेचकर इसे रोका जा सकेगा? मोदी एक विफल प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने भारत को हर तरफ़ से खतरे में डाल दिया है। मोदी सिर्फ़ झूठी कहानियाँ बेचने में लगे हैं। फिर चाहे वो कहानी भारत में विदेशी निवेश की हो या भारत के विदेशों में परचम लहराने की। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत में नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(FDI) घटकर मात्र 1 बिलियन डॉलर रह गया था। बहुत कोशिशों के बावजूद 2025-26 में 7.7 बिलियन डॉलर ही पहुँच सका। सवाल यह है कि भारतीय विदेशों में जाकर निवेश क्यों कर रहे हैं? नौकरियों की जरूरत भारत में, भारत के लोगों को भी हैं? क्या भारत के संसाधन विदेशियों के लिए आरक्षित किए जा रहे हैं?

विदेश नीति डिजास्टर!
विदेश नीति में डिजास्टर पैदा करने के बाद पीएम मोदी ने भारत को ऐसी समस्याओं में फेंक दिया है जहाँ पर आम आदमी के लिए कुछ नहीं है। न पेट्रोल-डीजल की उपलब्धता, ना खाना पकाने के लिए रसोई गैस। पीएम मोदी की नाकामी कोई आम सरकारी नाकामी नहीं है। यह भारत की शांतिप्रिय व्यवस्था को ध्वस्त करने की क्षमता रखती है, भारत को अस्थिर रखने की क्षमता रखती है। पीएम मोदी की नाकामी भारत की अखंडता के लिए खतरा बन गई है। छात्रों के पास पढ़ने-लिखने की प्रेरणा ख़त्म होती जा रही है क्योंकि सरकार ने पेपरलीक माफिया के सामने हथियार डाल दिए हैं। विश्वगुरु अब दुनिया का सबसे बड़ा मजाक है। जो देश अपने यहाँ साफ़-सुथरी परीक्षाएं भी नहीं करवा सकता उसे कोई देश गंभीरता से नहीं लेगा। पीएम मोदी के अंतर्गत भारत हर दिन अपमानित हो रहा है, कमजोर हो रहा है, और एक ऐसे रूप में बदलता जा रहा है जो भारत का चरित्र कभी नहीं रहा। एक नाकाम प्रधानमंत्री से इससे अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती, कि वो इस देश की हर एक महत्वपूर्ण समस्या को सुलझाने के लिए या तो अपने आँसू बहाए या जनता से समर्पण की अपील करे और 'सुभाषित' शेयर करे।

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