छठे पीड़ित की मौजूदगी का दावा और प्रशांत की मेडिकल जांच
मूल रूप से बिहार के निवासी और दिल्ली के मयूर विहार में रहने वाले प्रशांत कुमार सिंह वॉटरकलर, पेस्टल और ऑयल पेंटिंग के चित्रकार हैं। 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च के दौरान दाएं हाथ और सीने में छर्रे लगने से वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। प्रशांत के अनुसार, 20 जुलाई को शाम लगभग 4:30 बजे जब उन्हें लेडी हार्डिंग अस्पताल ले जाया गया, तब उनके साथ ही एक अन्य घायल प्रदर्शनकारी भी वहां पहुंचा था। प्रशांत ने मीडिया में आए अन्य चार घायल पुरुषों और एक महिला की तस्वीरें देखी हैं और उनका कहना है कि अस्पताल पहुंचा छठा व्यक्ति इनमें से कोई नहीं था।एक सूत्र ने इस छठे व्यक्ति की तस्वीर साझा की है जिसका इलाज उसी अस्पताल में हुआ था, हालांकि उसकी पहचान और वर्तमान स्थिति की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। प्रशांत के दाहिने हाथ और सीने में अभी भी धातु के छर्रे (pellets) मौजूद हैं। डॉक्टरों ने उन्हें चेतावनी दी है कि इन्हें निकालने के लिए नसों और मांसपेशियों को काटना पड़ेगा, जिससे उनके हाथ को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, ऑपरेशन करने पर भविष्य में उनके चित्रकारी के करियर पर बुरा असर पड़ सकता है।प्लास्टिक नहीं, धातु (Metal) के छर्रों का हुआ प्रयोग
सुरक्षा बलों और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने दावा किया था कि भीड़ को हटाने के लिए केवल प्लास्टिक या रबर के छर्रों का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि द हिन्दू, इंडिया टुडे और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक प्रशांत के मेडिकल रिकॉर्ड सरकारी एजेंसियों के दावे को खारिज करते हैं: मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट (MLC): लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के एमएलसी में स्पष्ट रूप से "पेलेट" (pellet) चोट दर्ज है।
पेंटर प्रशांत की एक्स-रे रिपोर्ट
29 जुलाई को होली फैमिली अस्पताल में कराए गए एक्स-रे में प्रशांत के दाहिने हाथ और सीने के ऊपरी हिस्से में कम से कम 10 धातु के छर्रे फंसे होने की पुष्टि हुई है। लेडी हार्डिंग अस्पताल में शुरुआत में केवल सतह के घावों का इलाज कर कुछ टुकड़ों को निकाला गया था। बाद में लोक नायक अस्पताल और होली फैमिली अस्पताल में जांच के बाद पता चला कि छर्रे मांसपेशियों में गहराई तक धंसे हुए हैं।
20 जुलाई को क्या हुआ था?
प्रशांत जेन ज़ी छात्र आंदोलन के पहले दिन से ही जंतर-मंतर पर मौजूद रहकर अपनी कला के ज़रिए विरोध प्रदर्शन को पेश कर रहे थे।20 जुलाई की दोपहर प्रशांत संसद से करीब 50 मीटर दूर अंतिम बैरिकेड के पास मौजूद थे। आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद के भाषण के बाद पुलिस और RAF ने भीड़ को कनॉट प्लेस और महात्मा गांधी रोड की ओर पीछे धकेलना शुरू किया। पुलिस ने पहले आंसू गैस के गोले छोड़े और फिर लाठीचार्ज किया। प्रशांत के अनुसार, इसके तुरंत बाद बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के सुरक्षा बलों ने शॉटगन (शॉटगन पैलेट गन) से भीड़ पर सीधी फायरिंग शुरू कर दी।
पेलेट गन से घायल अन्य documented पीड़ित
- 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान अब तक सामने आए 5 प्रमुख पीड़ितों में प्रशांत कुमार सिंह 25 वर्षीय पेंटर; दाहिने हाथ व सीने में 10 से अधिक मेटल के छर्रे धंसे हैं।
- साहिल लोचब 19 वर्षीय युवक; आंखों की रोशनी को स्थायी नुकसान पहुंचने का खतरा।
- शेख इरशाद मंसूरीः पैलेट गन से घायल प्रदर्शनकारी; सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता।
- नूतन (32 वर्ष) रांची की निवासीः गुड़गांव में कार्यरत; राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल की रिपोर्ट के अनुसार दाहिने कान पर "गनशॉट" आघात, कान का हिस्सा कटने के कारण टांके लगाने पड़े।
- 20-वर्षीय युवकः पीठ और हाथ में छर्रे लगे; पहचान गुप्त रखी गई है।
दिल्ली पुलिस का इनकार बनाम RAF की जनरल डायरी
शुरुआत में दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल से साफ इनकार किया था। हालांकि, पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में 22 जुलाई की तड़के दर्ज रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की जनरल डायरी (GD) एंट्री से यह साबित हुआ कि 20 जुलाई को दिल्ली पुलिस द्वारा ही पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति दी गई थी। घटना के बाद बढ़ते विवाद को देखते हुए RAF ने जंतर-मंतर पर तैनात अपने कर्मियों से पंप-एक्शन गन (PAGs), एंटी-रॉयट गन और इलेक्ट्रिक शील्ड्स वापस मंगा लिए थे।पैलेट गन को लेकर राहुल गांधी का ज़बरदस्त हमला
राहुल गांधी ने सबसे पहले पीड़ित छात्रों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर और उन्हें मीडिया के सामने लाकर इस मुद्दे को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया। उन्होंने पैलेट गन से गंभीर रूप से घायल और आंख की रोशनी गंवाने की कगार पर पहुंचे 19 वर्षीय साहिल लोचब के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की तथा लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए उनके घाव और एक्स-रे रिपोर्ट्स देश के सामने रखे। राहुल गांधी ने सरकार और दिल्ली पुलिस के 'पैलेट गन न चलाने' के दावों को खारिज करते हुए इसे युवाओं पर "बर्बरता और दमन" करार दिया और सवाल उठाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे देश के बच्चों पर जानलेवा हथियारों के इस्तेमाल की अनुमति किसने दी।

