सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया यानी BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल और उनके फ़ैसले लेने के अधिकार को सीमित कर दिया है। अदालत ने साफ़ साफ़ कह दिया कि मनन मिश्रा केवल प्रो टेम यानी अस्थायी चेयरमैन हैं और वह लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए अध्यक्ष नहीं हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मनन कुमार मिश्रा को स्थायी और लोकतांत्रिक रूप से चुने गए अध्यक्ष की तरह नहीं देखा जा सकता। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि जब तक नई बार काउंसिल ऑफ इंडिया का चुनाव नहीं हो जाता, तब तक मनन कुमार मिश्रा केवल एक प्रो टेम चेयरमैन के रूप में काम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि उनका कार्यकाल नई बार काउंसिल के गठन तक ही सीमित है और यह केवल अंतरिम व्यवस्था है।
'मनन सिर्फ रोजमर्रा के काम संभाल सकते हैं'
शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी भी संस्था में जब तक नियमित चुनाव नहीं हो जाते तब तक अंतरिम अध्यक्ष केवल दैनिक प्रशासनिक कार्यों का संचालन करता है। इस दौरान बड़े नीतिगत फैसले लेने से बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनन कुमार मिश्रा भी इसी सिद्धांत के तहत केवल बार काउंसिल के सामान्य और नियमित कामकाज का संचालन कर सकते हैं।बड़े फ़ैसलों में एजी और एसजी की भागीदारी ज़रूरी
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक नई निर्वाचित बार काउंसिल नहीं बन जाती तब तक बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के हर अहम नीतिगत फ़ैसले में भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को शामिल किया जाए। दोनों अधिकारी कानून के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया के स्थायी पदेन सदस्य हैं।संस्थागत पारदर्शिता बनाए रखना ज़रूरी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत किसी तरह का टकराव पैदा नहीं करना चाहती, लेकिन संस्थागत पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब तक नई निर्वाचित बार काउंसिल नहीं बन जाती, तब तक हर नीतिगत निर्णय अटॉर्नी जनरल की उपस्थिति में लिया जाना चाहिए।BCI ने भी माना अदालत का सुझाव
बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार और मनींदर सिंह ने अदालत के सुझाव से सहमति जताई। उन्होंने अदालत को भरोसा दिया कि भविष्य में बार काउंसिल के सभी अहम नीतिगत फ़ैसलों में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को शामिल किया जाएगा। अदालत ने इस आश्वासन को अपने आदेश में दर्ज भी किया।क्यों उठा यह विवाद?
मनन कुमार मिश्रा के लंबे समय तक बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष बने रहने को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएँ दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनका कार्यकाल बार काउंसिल के नियमों में निर्धारित अवधि से आगे बढ़ चुका है, इसलिए उनका अध्यक्ष बने रहना सही नहीं है। यह विवाद उस समय और बढ़ गया था जब NALSAR यानी नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च से जुड़ा मामला सामने आया।NALSAR विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद मनन कुमार मिश्रा ने NALSAR के स्नातकों के एनरोलमेंट को लेकर निर्देश जारी किए थे।
चुनाव जल्द कराने के लिए तय की समय-सीमा
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चुनाव जल्द कराने के लिए साफ़ समय-सीमा तय की है। अदालत ने निर्देश दिए कि सभी हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीश दो सप्ताह के भीतर राज्य बार काउंसिलों में दो महिला सदस्यों का सह-चयन पूरा करें। इसके एक सप्ताह के भीतर राज्य की सभी बार काउंसिल अपनी नई संरचना की अधिसूचना जारी करें। नई गठित राज्य बार काउंसिल अधिसूचना जारी होने के तीन सप्ताह के भीतर अपने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, अन्य पदाधिकारियों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए अपने प्रतिनिधि का चुनाव करें। अदालत ने कहा कि इन सभी प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया की नई संरचना पर विचार किया जाएगा।सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर तय की है। उस दिन अदालत यह जाँच करेगी कि राज्य बार काउंसिलों के गठन और चुनाव को लेकर दिए गए निर्देशों का पालन हुआ है या नहीं।
वित्तीय ऑडिट की भी उठी मांग
इस मामले में अधिवक्ता एम. वरदन और योगमाया एमजी ने याचिकाएं दायर की हैं। याचिकाओं में मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल को चुनौती देने के साथ-साथ बार काउंसिल ऑफ इंडिया और BCI-PEARL FIRST TRUST के वित्तीय मामलों की ऑडिट कराने की मांग भी की गई है। हालाँकि फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से बार काउंसिल के चुनाव और उसके गठन की प्रक्रिया को तेजी से पूरा कराने पर ध्यान केंद्रित किया है।बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रशासन और उसके लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए अहम माना जा रहा है। अदालत ने साफ़ कर दिया है कि अंतरिम अध्यक्ष नियमित रूप से चुने गए अध्यक्ष के समान अधिकार नहीं रखता। इसके साथ ही, अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया में जल्द चुनाव कराकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने पर जोर दिया है, ताकि संस्था का संचालन निर्वाचित नेतृत्व के हाथों में हो सके।

