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शरिया के तहत रजस्वला की उम्र में निकाह पॉक्सो एक्ट का उल्लंघनः हाईकोर्ट

शरिया के तहत रजस्वला की उम्र में निकाह पॉक्सो एक्ट का उल्लंघनः हाईकोर्ट

लाहाबाद हाई कोर्ट ने बाल विवाह को लेकर एक ऐतिहासिक और बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) समेत देश का कोई भी पर्सनल लॉ, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) के तहत लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं कर सकता।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पर्सनल लॉ, बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाले पॉक्सो एक्ट (POCSO Act, 2012) के प्रावधानों से ऊपर नहीं हो सकता।यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने 'रूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' (Rubi Vs State of UP) मामले की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने 19 आरोपियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिन पर बुलंदशहर में एक 16 वर्षीय नाबालिग मुस्लिम लड़की का निकाह रुकवाने गई पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम पर हमला करने और सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप है।

शरिया कानून पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

याचिकाकर्ताओं (आरोपियों) की ओर से वकील ने कोर्ट में दलील दी थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत, यदि कोई लड़की प्यूबर्टी (रजस्वला) की उम्र पार कर लेती है जिसे आमतौर पर 15 वर्ष माना जाता है तो वह निकाह के योग्य हो जाती है। उनका तर्क था कि बाल विवाह निषेध अधिनियम उनके पर्सनल लॉ को प्रभावित नहीं कर सकता।अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा: "शरिया कानून, जो लड़की के विवाह के लिए प्यूबर्टी (रजस्वला) की उम्र को सक्षम मानता है, वह साफ तौर पर बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के प्रावधानों के विपरीत है।"कोर्ट ने आगे जोड़ा कि देश के हर नागरिक के लिए, चाहे उसका धर्म कोई भी हो, शादी की न्यूनतम उम्र वही होगी जो बाल विवाह निषेध अधिनियम में तय की गई है। इसके अलावा, अदालत ने चेतावनी दी कि यदि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की की शादी की अनुमति दी जाती है, तो यह पॉक्सो एक्ट का भी सीधा उल्लंघन होगा, क्योंकि विवाह और शारीरिक संबंध एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।

जन स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति पर आधारित कानून

हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) और पॉक्सो (POCSO) कानून देश के जन स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति पर आधारित हैं। बेंच ने कहा: "इन कानूनों के पीछे एक वैज्ञानिक समझ है, जिसे विधायिका ने निषेधात्मक कानूनों (Prohibitory Statutes) में बदला है। इससे बचने का रास्ता देश में किसी के पास भी नहीं है।"कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह की वैध उम्र तय करने के मामले में बाद में बने ये सर्वव्यापी कानून, मेजॉरिटी एक्ट, 1875 (Majority Act) जैसे पुराने कानूनों में पर्सनल लॉ को दी गई छूटों पर हावी होंगे। अदालत ने टिप्पणी की कि भले ही बाल विवाह निषेध अधिनियम के उल्लंघन में की गई शादी अमान्य (Void) न होकर कानूनी रूप से शून्यकरणीय (Voidable) हो, लेकिन ऐसी शादी का आयोजन कराने वाले विभिन्न पक्षों को कानूनन सजा दी जा सकती है।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के ककोर थाने में 15 फरवरी 2026 को दर्ज हुई एक एफआईआर से जुड़ा है। पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम को सूचना मिली थी कि एक घर में नाबालिग लड़की की शादी कराई जा रही है। टीम मौके पर पहुंची और शादी रुकवाकर लड़की को बाल कल्याण समिति (CWC) के सामने ले जाने लगी।तभी आरोपियों और उनके साथ मौजूद कई अन्य लोगों ने पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम के साथ गाली-गलौज की, उन्हें धमकियां दीं और जबरन लड़की को चाइल्ड लाइन टीम की कस्टडी से छीनकर भगा ले गए। कोर्ट ने माना कि पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम अपनी ड्यूटी कर रही थी, इसलिए आरोपियों के खिलाफ एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती और मामले की जांच जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट और केरल हाई कोर्ट के फैसलों का संदर्भ

हाई कोर्ट ने माना कि इस विषय पर अलग-अलग राज्यों के हाई कोर्ट्स के रुख में टकराव रहा है। हालांकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 2024 के केरल हाई कोर्ट के उस फैसले से पूरी सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि बाल विवाह कानूनन प्रतिबंधित है और यह नियम सभी पर समान रूप से लागू होता है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।अदालत ने यह भी नोट किया कि साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस असमंजस को रेखांकित किया था कि क्या पर्सनल लॉ बाल विवाह निषेध अधिनियम पर हावी हो सकते हैं, लेकिन तब शीर्ष अदालत ने इस पर कोई अंतिम या आधिकारिक फैसला नहीं दिया था। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि 2021 में एक संशोधन विधेयक लाया गया था जो PCMA को पर्सनल लॉ पर प्राथमिकता देता, लेकिन 17वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही वह बिल फिलहाल निष्प्रभावी (Lapse) हो चुका है।इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि बाल विवाह रोकने वाले कानून देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होंगे और धर्म की आड़ में नाबालिगों की शादी को सही नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि राजस्थान में बाल विवाह के मामले अक्सर चर्चा में आ जाते हैं। तमाम कानून लागू करने के बाद सरकार राजस्थान में बाल विवाह रोक नहीं पाई है। हालांकि राजस्थान में डबल इंजन की सरकार है।
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