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वक्फ की दुकान-ज़मीन ने बंद कर दिया था यूपी के कुछ पत्रकारों का मुंह !

नवेद शिकोह

" उ.प्र.वक्फ घोटाले की जांच में सीबीआई उनकी पर्ची भी काट सकती है जो सौ रुपए की पर्ची (रसीद) कटवाकर करोड़ों की सम्पत्ति पर कब्जा हासिल कर चुके हैं "

उत्तर प्रदेश में वक्फ घोटाले की सीबीआई जांच के जाल में बड़ी मछलियों के साथ छोटी मछलियां, सीप, घोंघे सब फंस सकते है। पूर्व वक्फ मंत्री आज़म खान और नसीमुद्दीन ही नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी अज़ीम हस्तियां इस जांच के दायरे में आ सकती हैं। पूर्व वक्फ मंत्री, वक्फ बोर्ड के पूर्व तमाम चेमरमैन, मेंबरान, मुतावल्ली, बिल्डर, धार्मिक गुरु, मौलाना और पत्रकार भी जांच की आंच की गर्मी का शिकार हो सकते हैं।

ऐसे पकड़ी जा सकती है वक्फ खुद-बुर्द में पत्रकारों की संलिप्तता !

कम्पलीट जर्नलिस्ट होना और सिर्फ पत्रकार कहलाना दोनों में काफी अंतर है। लखनऊ ने देश को बेहतरीन सहाफी दिए लेकिन इस शहर मे ही पत्रकारिता के पवित्र दरिया में स्वार्थवश खरपतवार भी पैदा हुई। पुलिस के मुखबिरों और वक्फ माफियाओं के गुर्गों ने खुद को पत्रकार बताने का टैग लगा लिया। और जो इस कैटगिरी में नहीं भी था उनमें से भी कुछ को वक्फखोर वक्फ की जमीन-दुकान या बड़ी सौदेबाजी में छोटा सा हिस्सा देकर सेट कर लेते थे। ज्यादातर उर्दू अखबारों के पत्रकार मुस्लिम समाज से होते हैं। और हिंदी-अंग्रेजी अखबारों में भी किसी भी मुस्लिम पत्रकार को मुस्लिम मामलात, हज कमेटी और वक्फ बोर्ड की बीट की जिम्मेदारी दी जाती रही है। वक्फ की नियमावली के मुताबिक जरुरतमंद और गरीब मुस्लिम शख्स को जीविका या रहने के लिए वक्फ की जमीन, दुकान या मकान बेहद कम कियाये पर दिया जा सकता है। बस इसी नियम का फायदा उठाकर मंहगे भूखंड और कामर्शियल सम्पत्तियां भी सौ-दो सौ रुपए के किराए की पर्ची कटवाकर अपात्र लोगों को दी जाती रही। ऐसे लाभार्थी वक्फ बोर्ड की बीट पर काम करने वाले पत्रकार भी होते थे। मुतावल्ली और वक्फ बोर्ड के ओहदेदार कुछ पत्रकारों का मुंह बंद करने या अपने पक्ष में रखने के लिए उनकी पर्ची काटकर उन्हें वक्फ जायदादों पर कब्जा दे देते थे। और ऐसा कब्जा मंहगे दामों बेचा भी जाता था।

शिया वक्फ बोर्ड ज्यादा मालामाल है

अवध और सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश के ज्यादातर बादशाह, नवाब और रियासतदार मुसलमानों के शिया वर्ग से तालुक़ रखते थे और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। इन लोगों ने सैकड़ों भव्य इमामबाड़े, दरगाहें, कर्बलाएं और मस्जिदें बनवाईं। और इस तरह की तमाम सम्पत्तियां वक्फ कर दीं थी।

उनकी नींदें उड़ीं, मैं चैन से सोता हूं.

उनकी रातों की नींद उड़ी होगी जिन्होंने वक्फ की जमीन अवैध रूप से बेची.. इस पर बड़े-बड़े कॉप्लेक्स, फ्लैट्स या आलीशान मकान बनवायें होंगे। कुछ ने मुतावल्ली बनकर वक्फ को बेचा तो कुछ पत्रकारों ने वक्फखोरों को संरक्षण देकर या ब्लैकमेल करके जमीने- दुकानें हासिल की। किरायेदारी की पर्चियां कटवायीं, कब्जे किए।

जब करोड़ों की जमीनों का बड़े-बड़े बिल्डरों से अवैध रूप का सौदा होता था तो दौलत की बारिश की कुछ छीटें कुछ कथित पत्रकारों को भी पड़ती होंगी। इसीलिए ही शायद कुछ ऐसे कथित पत्रकार दौलतमंद हो गये जो अवैतनिक तौर से छोटे-छोटे हिंदी-उर्दू अखबारों से नाममात्र के लिए जुड़े थे।
पिछले करीब पच्चीस वर्षों में यूपी में भाजपा, बसपा और सपा.. सबको हुकुमत करने का मौका मिला। इस ड्यूरेशन में हर सरकार में वक्फ की लूटमार का कद्दू कटा और सबको बंटा। सपा-बसपा में ज्यादा लूटमार हुई।

ऐसे में कुछ ऐसे पत्रकार भी करोड़पति और करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक बन गये जिनको कभी किसी अखबार ने पांच हजार रुपए भी वेतन नहीं दिया।

मैंने बड़े-बड़े हिंदी अखबारों में लम्बे समय तक माइनोरिटी बीट कवर की। वक्फ बोर्ड की खूब खबरें लिखीं। बड़े-बड़े वक्फ घोटालों का पर्दाफाश किया। मुझे भी ज्यादा तनख्वाह नहीं मिलती थी। पैदल रिपोर्टिंग करता था। मेरे पास पुरानी स्कूटर भी नहीं थी। हांलाकि पच्चीस साल की पत्रकारिता में अब तक एक नई बाइक तक नहीं खरीद पाया। अभी भी सेकेंड हेंड खरीदी हुई बाइक से चलता हूं।
जब पैदल चलता था और करोड़ों की वक्फ सम्पत्तियों के खुलासे करता था तो लोग कहते थे कि तुम बेवकूफ हो !

अब लगता है कि गरीबी सह कर ईमानदारी से रहना बेवकूफी नहीं अक्लमंदी है। आज जब किसी जांच की खबर पर दौलतमंद लोग रातों को सो नहीं पाते तो मैं चैन की नींद सोता हूं।

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