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मुंबई की झोपड़पट्टियों में चलाए गए अभियानों से महिला एवं बाल स्वास्थ्य में सुधार: 'स्नेहा' संस्था की रिपोर्ट

👉 बच्चों में शारीरिक विकास रुकने की दर 30% से घटकर सीधे 21% पर आई। 2021 से 2026 के दौरान छोटे बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रस्तुत रिपोर्ट में यह सकारात्मक तस्वीर सामने आई।

👉 महिलाओं में एनीमिया की समस्या पर भी काफी हद तक काबू पाया गया। पिछले पांच वर्षों में यह प्रमाण 40% से घटकर सीधे 17% पर आ गया।

मुंबई: 'सोसायटी फॉर न्यूट्रिशन, एजुकेशन एंड हेल्थ एक्शन' (स्नेहा) नामक गैर-सरकारी संस्था ने हाल ही में मुंबई महानगर की वंचित महिलाओं और बच्चों की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी साझा करने के लिए एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया।
इस वर्ष यह कार्यक्रम 'सस्टेनिंग इम्पैक्ट थ्रू पार्टनरशिप' (साझेदारी के माध्यम से टिकाऊ प्रभाव) की थीम के तहत आयोजित किया गया था। इस अवसर पर स्वास्थ्य एवं पोषण आहार के क्षेत्र में कार्यरत सार्वजनिक संस्थाओं के प्रतिनिधी, दानदाता, शोधकर्ता, विकास संस्थाएं, स्वयंसेवी संस्थाएं और स्वयंसेवक उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मुंबई महानगर क्षेत्र की शहरी झोपड़पट्टियों में दो दशकों के दैरान चलाए गए स्वास्थ्य अभियानों की समीक्षा की गई।

कार्यक्रम में 'स्नेहा' संस्था द्वारा वर्ष 2021-22 से 2025-26 की अवधि में किए गए प्रत्यक्ष कार्यों की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। प्रस्तुतीकरण के माध्यम से संस्था की निरंतर सफल कार्यप्रणाली की जानकारी दी गई। संस्था द्वारा चलाए गए स्वास्थ्य अभियानों के परिणामस्वरुप बच्चों में बौनेपन की दर 30 % से घटकर 21% दर्ज की गई। गंभीर कुपोषण का प्रमाण 14% से घटकर 11% हो गया। कम वजन की समस्या 28% से घटकर 22% पर आ गई। इसके साथ ही, छोटे बच्चों के संपूर्ण टीकाकरण में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। पहले संपूर्ण टीकाकरण का प्रमाण केवल 79% दर्ज किया जाता था, जो नई रिपोर्ट के अनुसार बढ़कर 93% हो गया है। बच्चों के शारीरिक और मानसिक में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सफलता मिली, जिससे इस समस्या का प्रमाण 18% से घटकर सीधे 7% पर आ गया। महिलाओं में समय पर गर्भावस्था पंजीकरण 45% से बढ़कर 76% हो गया। संस्थागत (अस्पतालों में) सुरक्षित प्रसव में भी वृद्धि होने की जानकारी दी गई; रिपोर्ट के निष्कर्षों में यह भी बताया गया कि स्थानीय नागरिक सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और एकीकृत बाल विकास योजना का लाभ उठा रहे हैं तथा इस भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

इस अवसर पर 'स्नेहा' संस्था की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुश्री वैनेसा डिसूधा ने कहा, “ यह कार्यक्रम केवल प्राप्त परिणामों की प्रस्तुति तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से हमने जो सकारात्मक परिणाम हासिल किए है, उन्हें दीर्घकाल तक बनाए रखने के लिए सरकारी और सामुदायिक साझेदारों के साथ आवश्यक पहलुओं को समझना हमारा प्रमुख उद्देश्य है। प्रत्यक्ष कार्य के साक्ष्यों एवं अनुभवों को साझा करना तथा सरकार, शैक्षणिक संस्थानों, समाज और हितधारकों के बीच संवाद बढ़ाना इस मंच का मुख्य ध्येय है। इससे भविष्य की योजनाओं के निर्माण और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता बढ़ाने के व्यावहारिक मार्ग खोजे जाएंगे। संस्था, सरकारी तंत्र को सशक्त बनाने और समय-समय पर आवश्यक तकनीकी सहायता प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिससे भविष्य में भी यह सफलता कायम रहे और इसका दायरा और अधिक व्यापक हो सके।”

इस कार्यक्रम के आयोजन ने 'स्नेहा' संस्था की कार्यशैली के एक महत्वपूर्ण पड़ाव को रेखांकित किया है। प्राप्त सफलता को केवल जानकारी तर सीमित न रखते हुए, इसे सरकारी और सामुदायिक व्यवस्था में स्थायी रूप से शामिक करने के लिए संस्था प्रयासरत है। 'स्नेहा' संस्था द्वारा 'शाश्वत मॉडल' की संकल्पना लागू की जाती है, जिसके तहत स्वास्थ्य संबंधी पहलों का नेतृत्व चरणबद्ध तरीके से स्थानीय समुदाय को सौंपा जाता है। संस्थागत स्तर पर सफल उपक्रमों को स्थापित करने के लिए सार्वजनिक प्रणाली को मजबूक किया जाता है। स्थानीय समुदाय की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करके तथा नगर निगमों के स्वास्थ्य विभागों एवं एकीकृत बाल विकास सेवा जैसी सरकारी प्रणालियों के साथ साझेदारी करके अपेक्षित सफलता प्राप्त की जा सकती है, यह संस्था ने अपने अभियानों के माध्यम से सिद्ध किया है। अभियानों का विस्तार होने के साथ ही प्रत्यक्ष कार्य की जिम्मेदारी प्रशिक्षित स्वयंसेवकों और सरकारी कर्मचारियों को सौंपी गई। संस्था पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय समुदाय और सरकारी तंत्र की स्वायत्तता बढ़ाने वाला यह जनभागीदारी आधारित मॉडेल अत्यंत प्रभावी साबित हुआ। बड़ी संख्या में लोगों ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया, जिससे माताओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में टिकाऊ व व सकारात्मक बदलाव देखे गए। इसके अतिरिक्त, बच्चों में बौनेपन की समस्या 31% से घटकर 27% हो गई। गंभीर कुपोषण में 2% की कमी आई और यह 11% से घटकर 9% दर्द किया गया। बच्चों में कम वजन की समस्या भी धीरे-धीरे कम हो रही है; पहले यह 28% थी, जो अब घटकर 25% पर आ गई है। इस जनभागीदारी मॉडेल के कारण बच्चों का संपूर्ण टीकाकरण 84% से बढ़कर 92% हो गया तथा समय पर गर्भावस्था पंजीकरण 45% सुधारकर 64% तर पहुंच गया।

'स्नेहा' संस्था ने प्रत्यक्ष जनभागीदारी को बढ़ावा देने वाले अभियानों के साथ-साथ अन्य पहलों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्था ने 'गोद ली गई आंगनवाड़ी / सक्षम आंगनवाड़ी' पहल के माध्य से एकीकृत बाल विकास सेवा के साथ भागीदारी की है। इस पहल के तहत मानकीकृत मूल्यांकन ढांचे और मार्गदर्शक मॉडेल का पालन किया गया, जिससे आंगनवाड़ी केंद्र की बुनियादी सुविधाओं, सामग्री प्रबंधन,दस्तावेजीकरण और सेवा वितरण में व्यापक सुधार देखा गया। मध्यम या उत्त दर्जा हासिल करने वाले आंगनवाड़ी केंद्रो का प्रमाण 13% से बढ़कर सीधे ५३% हो गया, जबकि अत्यंत निर्म दर्जे वाले केंद्रों का प्रमाण, जो पहले 24% था, घटकर मात्र ३% रह गया। ताजा पका हुआ भोजन, घर ले जाने हेतु पोषक आहार, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, बच्चों की शारीरिक वृद्धि की निगरानी और पोषण संबंधी सलाह जैसी सेवाओं के प्रति लोगों में व्यापक जागरूकता पैदा हुई है। हालांकि, इस बढ़ती जागरूकता की तुलना में सेवाओं के प्रत्यक्ष उपयोग और लाभार्थिओं की संतुष्टि में कुछ अंतर पाया गया है, जिस पर भविष्य में ध्यान केंद्रित करने हेतु चर्चा की गई।

'स्नेहा' संस्था मुंबई महानगर क्षेत्र के विभिन्न नगर निगमों के साथ मिलकर काम करती है। इन शहरों की झोपड़पट्टियों में निवास करने वाली महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर को सुधारने में संस्था ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्था के प्रयासों से गर्भवती महिलाओं को गंभीर स्थिती में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल स्थानांतरित करने की प्रक्रिया (पेशेंट रेफरल सिस्टीम) को मजबूती मिली है। सभी नगर निगमों के साथ दीर्घकालिक सहयोग के माध्यम से यह संभव हो सका है। इसके लिए मरीजों को स्थानांतरित करने के अधिकृत मार्ग, परस्पर संवाद, प्रत्यक्ष देखरेख और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे घटकों पर विशेष ध्यान दिया गया। स्थानीय चिकित्सा सुविधाओं और दो अस्पतालों के बीच की दूरी को ध्यान में रखकर यह नेटवर्क तैयार किया गया। वर्ष 2007 में शुरू हुई यह व्यवस्था प्रारंभ में केवल एक नगर निगम तक सीमित थी, जो 2025 तर बढ़कर 10 नगर निगमों में कार्यरत हो चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानांतरिक की गई महिला मरीज के निश्चित अस्पताल तर पहुँचने की पुष्टि करने का प्रमाण 2024 के 36% से बढ़कर २०२३ में ८४% हो गया है। रेफरल स्लिप (स्थानांतरण रसीद) पूरी भरने का प्रमाण 78७८% से ८९% तक पहुँच गया है। मानक चिकित्सा नियमों के अनुसार मरीज स्थानांतरण का प्रमाण 76% से सुधारकर ८७% दर्ज किया गया है। पहले जो देखरेख और दस्तावेजीकरण 'स्नेहा' संस्था करती थी, वह जिम्मेदारी अब नगर निगम के नोडल अधिकारी संभाल रहे हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की स्वायत्तता और संस्थागत सशक्तीकरण को दर्शाता है। संस्था अब केवल आवश्यकतानुसार तकनीकी मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान करती है।

संस्था का व्यक्तिगत अनुभव भी इस रिपोर्ट में साझा किया गया है। किसी भी उपक्रम का स्थायित्व रातों-रात हासिल नहीं होता, बल्कि यह स्थिती और तैयारी के साथ होने वाला एक निरंतर प्रवास है। इन सफल अभियानों के माध्यम से आगामी समय में सरकारी स्वास्थ्य प्रणालियों का मजबूत करना और उन्हें सहयोग देना 'स्नेहा' संस्था का मुख्य उद्देश्य है। इस परिचर्चा में सरकारी अधिकारियों और नागरिकों को चार प्रमुख बिंदुओं पर विचार-मंथन करने का अवसर मिला: 1. उपक्रम के निर्माण के समय ही उसके दीर्घकालिक स्थायित्व का ध्यान कब रखा जाए? 2. शहरी झोपड़पट्टियों में बड़े पैमाने पर होने वाले लोगों के आवागमन के बावजूद सकारात्मक परिणामों को कैसे बनाए रखा जाए? 3. किस स्तर पर निरंतर तकनीकी सहायता का सर्वाधिक लाभ मिल सकता है? 4.सरकारी व्यवस्था को मजबूत बनाकर इस बदलाव को टिकाऊ बनाने में नागरिक कैसे योगदान दे सकते हैं?
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