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हबीब तनवीर: रंगमंच के अनोखे नायक जिन्होंने लोक कलाकारों को दी पहचान

हबीब तनवीर: रंगमंच के अनोखे नायक जिन्होंने लोक कलाकारों को दी पहचान

Stress Buster 1 week ago

हबीब तनवीर का रंगमंचीय सफर

मुंबई, 31 अगस्त। हबीब तनवीर ने रंगमंच की दुनिया में अपनी एक खास पहचान बनाई, जब उस समय पढ़े-लिखे और प्रशिक्षित कलाकारों को प्राथमिकता दी जाती थी। उन्होंने इस धारणा को चुनौती देते हुए गांवों और छोटे क्षेत्रों के लोक कलाकारों को अपने नाटकों में शामिल किया।

शुरुआत में, उनका उद्देश्य इन कलाकारों को थिएटर की तकनीक सिखाना था, लेकिन समय के साथ उन्हें एहसास हुआ कि उनसे सीखना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यही सोच उनके थिएटर की पहचान बन गई।

हबीब तनवीर का जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर में हुआ। उनका असली नाम हबीब अहमद खान था। शिक्षा के बाद, उनका झुकाव साहित्य, कविता और रंगमंच की ओर बढ़ा। उन्होंने मुंबई में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) से जुड़कर थिएटर को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आम जनता की आवाज के रूप में देखा। इसके बाद, उन्होंने दिल्ली में भी कई प्रमुख रंगकर्मियों के साथ काम किया।

तनवीर ने थिएटर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड का रुख किया, जहां उन्होंने रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स से अभिनय की ट्रेनिंग ली और ब्रिस्टल ओल्ड विक थिएटर स्कूल में निर्देशन और प्रोडक्शन का अध्ययन किया। उन्होंने पश्चिमी थिएटर की तकनीकों को सीखा और ब्रेख्त के काम से प्रेरित हुए। भारत लौटने के बाद, उन्होंने भारतीय लोक परंपराओं को अपने रंगमंच का आधार बनाया।

यहां से उनकी जिंदगी में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया, जिसने उन्हें अन्य रंगकर्मियों से अलग किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों के साथ काम करना शुरू किया। शुरुआत में, वह उन्हें मंच पर खड़े होने, चलने और संवाद बोलने के तरीके सिखाते थे। लेकिन जब कई कलाकार उनकी बताई हुई शैली में अभिनय नहीं कर पाए, तो उन्हें समझ आया कि समस्या उनके दृष्टिकोण में थी। इन कलाकारों के पास किताबों से सीखी हुई एक्टिंग नहीं थी, लेकिन उनके पास लोक जीवन का अनुभव और सहज अभिनय था।

तनवीर ने इन कलाकारों की स्वाभाविक शैली को मंच पर जगह देने का निर्णय लिया। इस बदलाव का असर उनके नाटकों में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उन्होंने लोक कलाकारों को शहरी और पढ़े-लिखे कलाकारों के साथ मंच पर लाया। 1954 का 'आगरा बाजार' इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें उन्होंने आम बाजार और शायर नजीर अकबराबादी की दुनिया को दर्शाया। यह पारंपरिक थिएटर से काफी भिन्न था। 1959 में, उन्होंने भोपाल में नया थिएटर की स्थापना की और छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों के साथ लगातार काम किया।

उनके प्रयोगों से 'चरनदास चोर', 'मिट्टी की गाड़ी', 'गांव के नांव ससुराल, मोर नांव दमाद', 'बहादुर कलारिन' और 'जिस लाहौर नइ देख्या, ओ जम्याई नइ' जैसे चर्चित नाटक सामने आए। 'चरनदास चोर' उनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक बन गई, जिसे 1982 में एडिनबर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में फ्रिंज फर्स्ट पुरस्कार मिला।

हबीब तनवीर को उनके कार्यों के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, जवाहरलाल नेहरू फेलोशिप, पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे कई सम्मान प्राप्त हुए। 1990 में उन्हें कालिदास सम्मान और 1996 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप भी मिली। 2002 में, उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

तनवीर ने फिल्मों में भी अभिनय किया, जैसे 'गांधी' और 'प्रहार', लेकिन उनकी असली पहचान हमेशा रंगमंच के क्षेत्र में रही। उनका निधन 8 जून 2009 को 85 वर्ष की आयु में हुआ।


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