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नसीम बानो: हिंदी सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार की अनकही कहानी

नसीम बानो: हिंदी सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार की अनकही कहानी

Stress Buster 1 week ago

नसीम बानो: एक अद्वितीय यात्रा

मुंबई, 3 जुलाई। आज की युवा पीढ़ी जब सायरा बानो का नाम सुनती है, तो उनके मन में एक खूबसूरत और प्रतिभाशाली अभिनेत्री की छवि उभरती है। सायरा की यह चमकती विरासत उनकी मां नसीम बानो से आई है, जो अपने समय की सबसे बड़ी स्टार मानी जाती थीं।

हिंदी सिनेमा के प्रारंभिक दौर में, जब महिलाओं का फिल्मों में काम करना कठिन था, नसीम बानो ने अपनी खूबसूरती और अदाकारी से एक अलग पहचान बनाई। उन्हें उस समय की 'ब्यूटी क्वीन' कहा जाता था और वे हिंदी सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टारों में से एक थीं।

4 जुलाई 1916 को जन्मी नसीम बानो का बचपन एक शाही माहौल में गुजरा। कहा जाता है कि वह स्कूल जाने के लिए पालकी का उपयोग करती थीं। उनके परिवार ने उनकी खूबसूरती के कारण उन्हें लोगों की नजरों से बचाकर रखा। उनका असली नाम रोशन आरा बेगम था और उनका पालन-पोषण एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनकी मां चाहती थीं कि वह डॉक्टर बनें, लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही तय किया।

फिल्मों में उनका जुड़ाव एक दिलचस्प संयोग से हुआ। एक बार स्कूल की छुट्टियों में, वह अपनी मां के साथ फिल्म 'सिल्वर किंग' की शूटिंग देखने गईं। वहां की दुनिया ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उसी समय अभिनेत्री बनने का निर्णय लिया।

हालांकि, उनके परिवार ने इस फैसले का विरोध किया। उस समय फिल्म इंडस्ट्री को सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था, इसलिए उनकी मां नहीं चाहती थीं कि वह फिल्मों में जाएं। इसी बीच, प्रसिद्ध फिल्मकार सोहराब मोदी ने नसीम बानो को अपनी फिल्म 'हेमलेट' के लिए साइन करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उनकी मां ने इसे ठुकरा दिया। नसीम बानो अपने फैसले पर अडिग रहीं और यहां तक कि उन्होंने भूख हड़ताल भी की। अंततः उनकी मां मान गईं, लेकिन शर्त यह रखी कि वह केवल स्कूल की छुट्टियों में ही शूटिंग करेंगी।

1935 में रिलीज हुई 'हेमलेट' ने नसीम बानो की जिंदगी बदल दी। फिल्म सफल रही और उनकी खूबसूरती और अभिनय की चर्चा चारों ओर होने लगी। दर्शक सिनेमाघरों से निकलकर उनकी जमकर तारीफ करते थे। इसके बाद उन्हें फिल्मों के कई प्रस्ताव मिले और उन्होंने पढ़ाई छोड़कर पूरी तरह से अभिनय को अपना करियर बना लिया।

इसके बाद उन्होंने 'पुकार', 'तलाक', 'मीठा जहर', 'चांदनी रात' जैसी कई सफल फिल्मों में काम किया। उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई और उन्हें अपने दौर की सबसे बड़ी अभिनेत्रियों में गिना जाने लगा। उस समय, जब फिल्म उद्योग में पुरुषों का दबदबा था, नसीम बानो ने अपनी अलग पहचान बनाई और दर्शकों के दिलों पर राज किया।

नसीम बानो की निजी जिंदगी भी काफी दिलचस्प रही। उन्होंने एहसान उल हक से शादी की और दोनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया। बाद में उनकी बेटी सायरा बानो का जन्म हुआ, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनाई। कहा जाता है कि बेटी के करियर और परवरिश पर ध्यान देने के लिए नसीम बानो ने धीरे-धीरे फिल्मों से दूरी बना ली।

माना जाता है कि 1950 के दशक के मध्य तक उन्होंने अभिनय छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान सायरा बानो की परवरिश और उनके करियर को संवारने में लगाया। बाद में वह फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में भी सक्रिय रहीं और कई फिल्मों के लिए कॉस्ट्यूम डिजाइन किए।

देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार भी बिखर गया। उनके पति पाकिस्तान चले गए, जबकि नसीम बानो अपनी बेटी के साथ भारत में रहीं। जीवन के अंतिम वर्षों में भी उन्होंने सादगी और गरिमा के साथ जीवन बिताया। 18 जून 2002 को मुंबई में उनका निधन हो गया।


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