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दुनिया की तमाम समस्याओं का समाधान देती है मनुस्मृति

दुनिया की तमाम समस्याओं का समाधान देती है मनुस्मृति

मनोज कुमार अग्रवाल

दुनिया भर में हिंसा अराजकता अपराध अर्थ की अंधी दौड़ और परस्पर गलाकाट प्रतियोगिता के बीच धर्म ही है जो जीवन जीने की सरल सुगम पद्धति देता है। एक ऐसा धार्मिक पर्व भी है जो मानव मात्र को जीवन का वास्तविक बोध कराते हुए जीवन के परम वैभव को हासिल करने का सुगम मार्ग प्रशस्त करता है दसलक्षण पर्व या पर्युषण पर्व जैन धर्म का सबसे पवित्र, आत्मिक और शाश्वत पर्व है।आपको जानकर हैरानी होगी कि यह सभी दस लक्षण हिन्दू पौराणिक ग्रंथ मनुस्मृति में से ही सार स्वरूप लिए गए हैं जिस मनुस्मृति को आज के कुछ कथित प्रगतिशील आलोचना करते रहते हैं।

पर्युषण पर्व या दस लक्षण पर्व जैन धर्मावलम्बी इसे पर्वाधिराज यानी समस्त पर्वों का राजा भी मानते है, तीर्थँकरों व जिनवाणी के मार्ग का अनुसरण करते हुए यह पर्व दुनिया को आत्मा की शुद्धि, क्षमा अहिंसा, तप, त्याग, अपरिग्रह और संयम का संदेश देता है।

जैन मुनि आचार्य विनिश्चय सागर के अनुसार दशलक्षण पर्व भाद्रपद महीने में भाद्रपद शुक्ल पंचमी से अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता है. दसलक्षण पर्व में दस धर्मों का विशेष महात्मय है जिसमें उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, और ब्रह्मचर्य, इन दस धर्मों का पालन किया जाता है. यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मअनुशासन, संयम और आत्मचिंतन का बोध कराने वाला पर्व है, इस दौरान व्रत, ध्यान, उपवास और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से आत्मा को शुद्ध करने की 10 दिवसीय साधना की जाती है। दसलक्षण पर्व आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है और व्यक्ति को क्रोध, लालच, मोह-माया, और ईर्ष्या जैसे विकारों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है.

उत्तम सत्य - धर्म हमे यही सिखाता है कि आत्मा की प्रकृति जानने के लिए सत्य आवश्यक है और इसके आधार पर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करना मुमकिन है। अपने मन आत्मा को सरल और शुद्ध बना लें तो सत्य स्वयं आ जाएगा. उत्तम संयम - पसंद नापसंद ग़ुस्से का त्याग करना। इन सब से छुटकारा तब ही मुमकिन है जब अपनी आत्मा को इन सब प्रलोभनों से मुक्त करे और स्थिर मन के साथ संयम रखें इस राह पर चलते परम आनंद मोक्ष की प्राप्ति मुमकिन है.

उत्तम तप-तप का मतलब सिर्फ उपवास भोजन नहीं करना सिफॅ इतना ही नहीं है बल्कि तप का असली मतलब है कि इन सब क्रिया के साथ अपनी इच्छाओं और ख्वाहिशों को वश में रखना ऐसा तप अच्छे गुणवान कर्मों में वृद्धि करते है साधन इच्छाओं की वृद्धि ना करना है. पहले तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने करिब छह महीनों तक ऐसी तप साधना (बिना खाए बिना पिए) की थी और परम आनंद मोक्ष को प्राप्त किया था ॥

हमारे तीर्थंकरों जैसी तप साधना करना लक्ष्य होना चाहिए।

उत्तम त्याग- 'त्याग' शब्द से ही पता लग जाता है कि इसका मतलब छोडना है और जीवन को संतुष्ट बना कर अपनी इच्छाओं को वश में करना है यह न सिर्फ अच्छे गुणवान कर्मों में वृद्धि करता है बल्कि बुरे कर्मों का नाश भी करता है. छोडने की भावना जैन धर्म में सबसे अधिक है क्योंकि जैन संत सिर्फ घर बार नहीं यहां तक कि अपने कपडे भी त्याग देता है उत्तम त्याग हमें यही सिखाता है कि मन को संतोषी बनाके ही इच्छाओं और भावनाओं का त्याग करना मुमकिन है त्याग की भावना भीतरी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही होती है।

उत्तम आकिंचन्य-आँकिंचन हमें मोह को त्याग करना सिखाता है। दस शक्यता है जिसके हम बाहरी रूप में मालिक हो सकते है; जमीन, घर, चाँदी, सोना, धन, अन्न, महिला नौकर, पुरुष नौकर, कपडे और संसाधन इन सब का मोह न रखकर ना सिर्फ इच्छाओं पर काबू रख सकते हैं बल्कि इससे गुणवान कर्मों मे वृद्धि भी होती है आत्मा के भीतरी मोह जैसे गलत मान्यता, गुस्सा, घमंड, कपट, लालच, मजाक, पसंद नापसंद, डर, शोक, और वासना इन सब मोह का त्याग करके ही आत्मा को शुद्ध बनाया जा सकता है।

उत्तम ब्रह्मचर्य-ब्रह्मचर्य हमें सिखाता है कि उन परिग्रहो का त्याग करना जो हमारे भौतिक संपर्क से जुडी हुई है. जैसे जमीन पर सोना न कि गद्दे तकियों पर, जरुरत से ज्यादा किसी वस्तु का उपयोग न करना, व्यय, मोह, वासना ना रखते सादगी से जीवन व्यतीत करना। 'ब्रह्म' जिसका मतलब आत्मा, और 'चर्या' का मतलब रखना, ईसको मिलाकर ब्रह्मचर्य शब्द बना है, ब्रह्मचर्य का मतलब अपनी आत्मा मे रहना है. ब्रह्मचर्य का पालन करने से आपको पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान और शक्ति प्राप्त होगी.

मिच्छामी दूक्कडम-क्षमा मांगीए सबसे और सबको क्षमा दीजिए,सबको क्षमा सबसे क्षमा का नियम जीवन में अभिमान का स्थान समाप्त कर देता है।

आपको बता दें कि आज स्वार्थ और राजनीतिक कारणों से कुछ लोग मनुस्मृति की आलोचना करते नहीं थकते लेकिन पर्युषण दस लक्षण धर्म के दस लक्षण इसी मनुस्मृति में उल्लिखित धर्म के दस लक्षणों की प्रतिछाया और अभिव्यक्ति हैं।सनातन धर्म ग्रंथ मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षणों को आधार बताया गया है। यहां मनुस्मृति में उल्लेखित सनातन धर्म के इन दस मूल सिद्धांत लक्षणों को आपको बताते हैं इनमें सबसे पहले धृति (धैर्य): कठिन समय में भी विचलित न होना और अपने मार्ग पर अडिग रहना।

क्षमा: अपने साथ बुरा करने वाले का भी भला चाहना और माफ कर देना। दम (मन पर संयम): मन को बुरे विचारों से बचाकर हमेशा धर्म में लगाए रखना। अस्तेय (चोरी न करना): मन, वचन या कर्म से किसी की वस्तु को चुराने का विचार न लाना। शौच (पवित्रता): शरीर की स्वच्छता के साथ-साथ मन और विचारों की शुद्धता। इन्द्रिय निग्रह: अपनी इंद्रियों (देखने, सुनने, बोलने आदि की शक्ति) को गलत मार्ग से रोककर अच्छे कार्यों में लगाना। धी (बुद्धि): सत्कर्मों को करने और अच्छे-बुरे की पहचान करने वाला विवेक। विद्या (ज्ञान): सत्य और यथार्थ ज्ञान को प्राप्त करना। सत्य: हमेशा सच बोलना और सत्य का आचरण करना। अक्रोध (क्रोध न करना): गुस्से का त्याग करके शांत और संयमित रहना।

आज के कलिकाल में मनुस्मृति का दस लक्षण धर्म सबसे अधिक प्रासंगिक है और इस के अनुपालन से विश्व भर में मानवता के लिए बेहतर माहौल तैयार किया जा सकता है दुनिया की तमाम समस्याओं का निराकरण इस में निहित है लेकिन पूंजीवाद और साम्यवाद राजतंत्र और लोकतंत्र शस्त्रीकरण और निशस्त्रीकरण भूखमरी और अय्याशी के दो पाटों के बीच अस्तित्व को बचाने में लगी विश्व सत्ता धर्म के रास्ते को अनुसरण कर मानवता का संरक्षण कर सकती है ।

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