Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
हिंदुत्व, जाति और बंगाल का भविष्य

हिंदुत्व, जाति और बंगाल का भविष्य

- महेन्द्र तिवारी

श्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 2026 केवल एक चुनावी वर्ष नहीं बल्कि एक ऐसी निर्णायक ऐतिहासिक घटना बनकर उभरा है जिसने पूरे देश की राजनीति को नए ढंग से सोचने पर विवश कर दिया है।

यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रहा। इसके भीतर सांस्कृतिक अस्मिता, धार्मिक चेतना, राजनीतिक हिंसा, जातीय समीकरण, सामाजिक न्याय और वैचारिक संघर्ष के अनेक स्तर एक साथ दिखाई दिए। यही कारण है कि इस चुनाव को केवल भाजपा की विजय या तृणमूल कांग्रेस की पराजय कह देना उसकी व्यापकता को सीमित कर देना होगा। यह चुनाव उस लंबे सामाजिक और मानसिक संघर्ष का परिणाम था जो वर्षों से बंगाल के भीतर धीरे धीरे आकार ले रहा था।

2026 के विधानसभा चुनाव में कुल 91.46 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। कुछ चरणों में मतदान का प्रतिशत 92 तक पहुँचा। यह केवल चुनावी उत्साह का संकेत नहीं था बल्कि जनता के भीतर जमा असंतोष, भय, गुस्से और परिवर्तन की इच्छा का भी स्पष्ट प्रमाण था। 294 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा ने 207 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया जबकि तृणमूल कांग्रेस लगभग 80 सीटों तक सीमित रह गई। 2016 में भाजपा के पास केवल 3 सीटें थीं। 2021 में यह संख्या 77 तक पहुँची और 2026 में यह 207 हो गई। यह परिवर्तन अचानक नहीं था बल्कि एक लंबे सामाजिक और राजनीतिक विस्तार का परिणाम था।

बंगाल लंबे समय तक वामपंथी राजनीति का गढ़ रहा। 1977 से 2011 तक 34 वर्षों तक वाममोर्चा ने यहाँ शासन किया। उसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने 15 वर्षों तक सत्ता संभाली। इस पूरी अवधि में भाजपा को बंगाल की राजनीति में कभी गंभीर शक्ति नहीं माना गया। बंगाल की बौद्धिक परंपरा, साहित्यिक संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष छवि को देखते हुए यह माना जाता था कि यहाँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति कभी व्यापक जनाधार नहीं बना पाएगी। लेकिन 2026 ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया।

इस परिवर्तन की जड़ें केवल चुनावी रणनीति में नहीं बल्कि उन घटनाओं में थीं जिन्होंने बंगाल के समाज को भीतर तक प्रभावित किया। संदेशखाली की घटनाएँ, राजनीतिक हिंसा, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, धार्मिक नारों को लेकर टकराव और अनेक स्थानों पर उत्पन्न असुरक्षा की भावना ने समाज के बड़े हिस्से को मानसिक रूप से बदल दिया। 2021 के चुनावों के दौरान 85 वर्षीय शोभा मजूमदार की मृत्यु को भाजपा और उसके समर्थकों ने राजनीतिक हिंसा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। बंगाल के अनेक क्षेत्रों में भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या, हमले और पलायन की घटनाओं ने यह धारणा मजबूत की कि राज्य में लोकतांत्रिक असहमति के लिए स्थान सीमित होता जा रहा है।

इसी बीच धार्मिक पहचान का प्रश्न भी लगातार मजबूत होता गया। जय श्री राम का नारा केवल धार्मिक उद्घोष नहीं रहा बल्कि राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। भाजपा ने इसे सांस्कृतिक स्वाभिमान से जोड़कर प्रस्तुत किया। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस पर लंबे समय से तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगता रहा। 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा के लिए लगभग 5713 करोड़ रुपये के आवंटन ने इस बहस को और तीखा कर दिया। भाजपा समर्थकों ने इसे हिंदू समाज की उपेक्षा और वोट बैंक की राजनीति का प्रमाण बताया।

राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि भाजपा को केवल शहरी या उच्च वर्गीय समर्थन नहीं मिला। अनुसूचित जाति और जनजाति की आरक्षित सीटों में भाजपा ने भारी सफलता प्राप्त की। 84 आरक्षित सीटों में से 67 पर विजय ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर आकर्षित हुआ। यही वह बिंदु है जहाँ बंगाल की राजनीति एक नए वैचारिक मोड़ पर पहुँचती दिखाई देती है।

भाजपा ने लंबे समय तक हिंदू एकता की राजनीति की। चुनाव प्रचार के दौरान जातीय पहचान की तुलना में धार्मिक पहचान अधिक प्रभावी दिखाई दी। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद जिस प्रकार सामाजिक अभियान्त्रिकी की चर्चाएँ सामने आने लगीं, उससे नए विवाद पैदा हुए। कुछ विचारकों और रणनीतिकारों ने यह तर्क देना शुरू किया कि बंगाल में सवर्ण और मुसलमानों का एक ऐतिहासिक गठबंधन रहा जिसने दलितों और पिछड़ों को सत्ता से दूर रखा। इस प्रकार की व्याख्या ने भाजपा समर्थक सवर्ण वर्ग के भीतर असहजता पैदा की।

यहीं से यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या भाजपा अब हिंदू एकता की राजनीति से आगे बढ़कर मंडल राजनीति की ओर लौट रही है। यदि ऐसा है तो यह भाजपा के लिए अवसर भी हो सकता है और संकट भी। अवसर इसलिए क्योंकि सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति भारतीय लोकतंत्र की वास्तविकता है। संकट इसलिए क्योंकि यदि हिंदू समाज को पुनः जातीय आधार पर विभाजित किया गया तो वह सांस्कृतिक एकता कमजोर हो सकती है जिसने भाजपा को बंगाल में इतनी बड़ी सफलता दिलाई।

बंगाल की सामाजिक संरचना उत्तर भारत के अनेक राज्यों से भिन्न रही है। यहाँ जातीय पहचान मौजूद अवश्य रही लेकिन उसने राजनीति को उस स्तर तक नियंत्रित नहीं किया जैसा बिहार या उत्तर प्रदेश में देखा गया। बंगाल की सांस्कृतिक चेतना लंबे समय तक भाषा, साहित्य और बौद्धिकता के इर्द गिर्द निर्मित होती रही। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और चैतन्य महाप्रभु की परंपरा ने धर्म को विभाजन के बजाय आध्यात्मिक समन्वय के रूप में प्रस्तुत किया। इसलिए यदि बंगाल में जातीय ध्रुवीकरण को कृत्रिम रूप से बढ़ाने का प्रयास होगा तो उसका सामाजिक प्रतिरोध भी सामने आ सकता है।

इस चुनाव में महिलाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उत्पन्न गुस्से ने सरकार विरोधी वातावरण तैयार किया। भाजपा ने इसे प्रभावी ढंग से राजनीतिक मुद्दा बनाया। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया।

दूसरी ओर चुनाव परिणामों को लेकर विवाद भी सामने आए। विपक्षी दलों और कुछ आलोचकों ने मतदाता सूची संशोधन और मतदाता नाम हटाने की प्रक्रिया पर प्रश्न उठाए। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए जिससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुए। हालांकि चुनाव आयोग और भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया।

इन सभी विवादों के बावजूद यह तथ्य निर्विवाद है कि बंगाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ है। पहली बार भाजपा ने राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। यह केवल संगठनात्मक विस्तार नहीं बल्कि वैचारिक स्वीकृति का भी संकेत है। लेकिन वास्तविक चुनौती अब शुरू होती है। चुनाव जीतना अपेक्षाकृत सरल होता है जबकि सामाजिक संतुलन बनाए रखना कहीं अधिक कठिन।

यदि भाजपा केवल धार्मिक ध्रुवीकरण पर निर्भर रहती है तो उसे दीर्घकालिक सामाजिक स्थिरता प्राप्त नहीं होगी। यदि वह केवल जातीय प्रतिनिधित्व की राजनीति करेगी तो उसका मूल सांस्कृतिक आधार कमजोर पड़ सकता है। बंगाल जैसे राज्य में स्थायी राजनीतिक सफलता के लिए सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक न्याय दोनों को साथ लेकर चलना आवश्यक होगा।

आज बंगाल के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह परिवर्तन समावेशी होगा या टकरावपूर्ण। क्या जय श्री राम और जय भीम को परस्पर विरोधी नारों की तरह प्रस्तुत किया जाएगा या उन्हें सामाजिक समन्वय के रूप में देखा जाएगा। यदि भाजपा इस संतुलन को साध लेती है तो बंगाल में उसका राजनीतिक आधार लंबे समय तक मजबूत रह सकता है। लेकिन यदि सत्ता के बाद समाज को नए नए वर्गों में बाँटने की राजनीति शुरू होती है तो वही जनता जिसने 2026 में ऐतिहासिक जनादेश दिया है, भविष्य में उससे निराश भी हो सकती है।

बंगाल का यह चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं था। यह भारतीय राजनीति की बदलती दिशा का संकेत था। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक असुरक्षा, राजनीतिक हिंसा और प्रतिनिधित्व की राजनीति मिलकर किस प्रकार नए राजनीतिक समीकरण बना सकती है। आने वाले वर्षों में पूरा देश बंगाल को ध्यान से देखेगा क्योंकि यहाँ जो प्रयोग शुरू हुआ है उसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा। बंगाल अब केवल साहित्य और संस्कृति की भूमि नहीं रहा बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी वैचारिक प्रयोगशाला बन चुका है।

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: swatantraprabhat