आज का युग विज्ञान तकनीक और भौतिक सुविधाओं का युग है। मनुष्य ने विकास के अनेक नए आयाम स्थापित किए हैं। इसके बावजूद उसका जीवन पहले की अपेक्षा अधिक तनावपूर्ण होता जा रहा है। बाहरी सुख सुविधाओं की वृद्धि के साथ मन की शांति घटती जा रही है।
चिंता असंतोष प्रतिस्पर्धा महत्त्वाकांक्षा और जीवनशैली में आए असंतुलन ने मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बना दिया है। तनाव अब केवल किसी एक वर्ग की समस्या नहीं रहा बल्कि यह समाज के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन गया है। यदि समय रहते इसके कारणों को नहीं समझा गया तो यह व्यक्ति परिवार और समाज तीनों के लिए गंभीर संकट का रूप ले सकता है।
तनाव का सबसे बड़ा कारण दूषित वातावरण और प्रदूषण है। बढ़ता शोर वायु प्रदूषण और अव्यवस्थित जीवन मनुष्य के साथ साथ पशुओं को भी प्रभावित कर रहा है। लगातार शोर और प्रदूषण से शरीर और मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शांत और स्वच्छ वातावरण मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसलिए पर्यावरण की रक्षा केवल प्रकृति की सुरक्षा नहीं बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा भी है। महत्त्वाकांक्षा जीवन में प्रगति का आधार है लेकिन जब यह असीमित हो जाती है तब यही तनाव का सबसे बड़ा कारण बनती है। प्रत्येक व्यक्ति सम्मान सफलता और प्रतिष्ठा चाहता है। जब उसकी इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं तब वह निराशा और तनाव से घिर जाता है। दूसरों से आगे निकलने की अंधी दौड़ मनुष्य को संतोष से दूर ले जाती है।
वह वर्तमान की उपलब्धियों का आनंद लेने के बजाय भविष्य की कल्पनाओं में उलझा रहता है। यही असंतोष धीरे धीरे उसके जीवन की शांति समाप्त कर देता है। एक किसान की कथा इस सत्य को स्पष्ट करती है। किसान को जितनी भूमि मिलती गई उसकी इच्छा उतनी ही बढ़ती गई। अंत में अधिक भूमि पाने की लालसा में वह लगातार दौड़ता रहा और थककर उसकी मृत्यु हो गई। यह कहानी बताती है कि अनियंत्रित महत्त्वाकांक्षा अंततः जीवन का सुख और शांति दोनों छीन लेती है। आज का मनुष्य भी बिना लक्ष्य और संतोष के इसी प्रकार भाग रहा है। उसे यह सोचने का समय नहीं है कि उसकी दौड़ का उद्देश्य क्या है।
अत्यधिक चिंता और निरर्थक चिंतन भी तनाव का बड़ा कारण है। जो व्यक्ति हर समय भविष्य की आशंकाओं और कल्पनाओं में डूबा रहता है उसका मन कभी शांत नहीं रह सकता। लगातार सोचते रहने से मानसिक ऊर्जा नष्ट होती है और व्यक्ति अवसाद तथा अनेक मानसिक रोगों का शिकार हो जाता है। इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य केवल उतना ही चिंतन करे जितना आवश्यक हो और शेष समय सकारात्मक कार्यों में लगाए।क्रोध ईर्ष्या प्रतिशोध और नकारात्मक भावनाएँ भी तनाव को बढ़ाती हैं। जब मनुष्य दूसरों के प्रति द्वेष रखता है तब उसका मन निरंतर अशांत रहता है। प्रतिशोध की भावना वर्षों तक मनुष्य की ऊर्जा को नष्ट करती रहती है। इसके विपरीत क्षमा सहनशीलता और सद्भाव मन को हल्का बनाते हैं तथा तनाव को दूर करते हैं।
आज समाज में नैतिक मूल्यों का भी तेजी से पतन हो रहा है। लोग अपने अधिकारों की बात तो करते हैं लेकिन अपने कर्तव्यों को भूलते जा रहे हैं। दूसरों की आलोचना करना और स्वयं को श्रेष्ठ मानना सामान्य प्रवृत्ति बन गई है। जब व्यक्ति स्वयं को सुधारने के बजाय दूसरों को बदलने का प्रयास करता है तब उसके भीतर असंतोष और तनाव जन्म लेता है। वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होती है। आत्मानुशासन ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है।
मन का अनुशासन तनाव से मुक्ति का सबसे प्रभावी उपाय है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं विचारों और व्यवहार पर नियंत्रण रखता है वह कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति दूसरों पर शासन करना चाहता है वह स्वयं चिंता और असुरक्षा से घिरा रहता है। इसलिए आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण जीवन को संतुलित और सुखी बनाते हैं। भोजन का मन और शरीर दोनों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। असंतुलित अशुद्ध और तामसिक भोजन शरीर में अनेक विकार उत्पन्न करता है जिससे मानसिक तनाव भी बढ़ता है। भोजन हमेशा शांत मन से संयमपूर्वक और उचित मात्रा में करना चाहिए। ग्रामीण जीवन का उदाहरण बताता है कि सरल सात्त्विक भोजन और नियमित दिनचर्या व्यक्ति को अधिक स्वस्थ और तनावमुक्त बनाए रखती है।
शारीरिक स्थिति और जीवनशैली भी तनाव को प्रभावित करती है। गलत ढंग से बैठना लगातार काम करते रहना या अत्यधिक विश्राम करना दोनों ही शरीर के लिए हानिकारक हैं। शरीर में ऊर्जा और रक्त का संतुलित प्रवाह तभी संभव है जब व्यक्ति सही मुद्रा में बैठे नियमित व्यायाम करे और पर्याप्त विश्राम भी ले। इसी प्रकार पर्याप्त और नियमित नींद मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। नींद की कमी से चिड़चिड़ापन थकान और तनाव बढ़ता है।
आज आर्थिक असुरक्षा भी तनाव का एक बड़ा कारण बन गई है। बढ़ती महँगाई बेरोजगारी और अधिक धन कमाने की होड़ ने मनुष्य के जीवन को बेचैन बना दिया है। धन आवश्यक है लेकिन जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं। यदि मनुष्य संतोष ईमानदारी और सादगी को अपनाए तो आर्थिक चुनौतियों का सामना भी अधिक धैर्य और आत्मविश्वास के साथ कर सकता है।
तनाव से मुक्त जीवन का आधार संतुलन है। इच्छाओं में संतुलन विचारों में संतुलन भोजन में संतुलन कार्य और विश्राम में संतुलन तथा जीवन मूल्यों में संतुलन ही स्वस्थ और सुखी जीवन का मार्ग है। मनुष्य यदि वर्तमान में जीना सीखे सकारात्मक सोच अपनाए प्रकृति के निकट रहे और आत्मानुशासन का पालन करे तो वह तनाव पर काफी हद तक विजय प्राप्त कर सकता है।
अंततः कहा जा सकता है कि तनाव किसी एक कारण से उत्पन्न नहीं होता बल्कि अनेक छोटी छोटी असंतुलित आदतों और विचारों का परिणाम होता है। इसलिए केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलने से समाधान संभव नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपने भीतर संतोष संयम सद्भाव और सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास करे। जब मन संतुलित होगा तब जीवन भी संतुलित होगा और तभी वास्तविक सुख शांति तथा सफलता प्राप्त की जा सकेगी।
कांतिलाल मांडोत

