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रामपुर रज़ा पुस्तकालय एंव संग्रहालय द्वारा कबीर जयंती पर विशेष प्रदर्शनी का किया गया आयोजन

रामपुर रज़ा पुस्तकालय एंव संग्रहालय द्वारा कबीर जयंती पर विशेष प्रदर्शनी का किया गया आयोजन

रामपुर:रामपुर रज़ा पुस्तकालय एवं संग्रहालय द्वारा कबीर जयंती के अवसर पर एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।प्रदर्शनी का का उद्घाटन पुस्तकालय के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र के करकमलों द्वारा किया गया।इस अवसर पर प्रदर्शनी में संत कबीर के जीवन,दर्शन,काव्य,लोकचेतना तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में उनके अमूल्य योगदान से संबंधित दुर्लभ सामग्री का प्रदर्शन किया गया।प्रदर्शनी का उद्देश्य संत कबीर के विचारों को जनसामान्य,शोधार्थियों एवं युवा पीढ़ी तक पहुँचाना तथा उनकी शिक्षाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

इस अवसर पर पुस्तकालय के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र ने कहा कि संत कबीर भारतीय समाज में समरसता,मानवीय मूल्यों तथा आध्यात्मिक चेतना के अद्वितीय प्रतीक हैं।उनके विचार आज भी सामाजिक सद्भाव,समानता और मानवता का संदेश देते हैं।रामपुर रज़ा पुस्तकालय एवं संग्रहालय का सतत प्रयास है कि ऐसी प्रदर्शनियों और आयोजनों के माध्यम से देश की समृद्ध सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विरासत को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुँचाया जाए।कहा कि कबीर की वाणी समय और समाज की सीमाओं से परे जाकर आज भी उतनी ही प्रासंगिक है,जितनी उनके जीवनकाल में थी। उनकी शिक्षाएँ समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करती हैं।डॉ. मिश्र ने कहा कि संत कबीरदास के विषय में बोलना अत्यंत कठिन माना गया है,क्योंकि कबीर जितने सहज हैं,उतने ही गहन और जटिल भी हैं।कबीर को समझने के लिए भारतीय चिंतन की दो प्रमुख धाराओं-सगुण और निर्गुण-को समझना आवश्यक है।उन्होंने बताया कि उपनिषदों ने ब्रह्म को "नेति-नेति" कहकर उसकी अनंतता और अनिर्वचनीयता को स्वीकार किया है।

वहीं पुराणों तथा गोस्वामी तुलसीदास जैसे संतों ने ब्रह्म के सगुण स्वरूप की उपासना का मार्ग प्रस्तुत किया,अर्थात ऐसे ईश्वर की आराधना जिसे अनुभूत और साकार रूप में देखा जा सके।संत कबीर निर्गुण भक्ति धारा के उपासक थे।उनका मानना था कि ब्रह्म अनिर्वचनीय है और उसकी पूर्ण व्याख्या शब्दों के माध्यम से संभव नहीं है।इसी भाव को तुलसीदास ने भी व्यक्त किया है-"जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई" अर्थात ईश्वर को जानने वाला स्वयं उसी में लीन हो जाता है।कहा कि कबीर ने बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों का विरोध करते हुए यह संदेश दिया कि वास्तविक ईश्वरत्व मनुष्य के भीतर विद्यमान है और उसकी अनुभूति करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।

शेष सब कुछ गौण है।गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कबीर ने अनेक स्थानों पर कहा है कि यदि ईश्वर रुष्ट हो जाए तो गुरु रक्षा कर सकते हैं,परंतु यदि गुरु रुष्ट हो जाए तो ईश्वर भी रक्षा नहीं कर सकते।उन्होंने कहा कि कबीर ने अपने समय की सामाजिक रूढ़ियों और धार्मिक कट्टरताओं को खुली चुनौती दी।वह ऐसा काल था जब विश्व के अनेक भागों में उपासना-पद्धतियों के नाम पर हिंसा अपने चरम पर थी।ऐसे समय में कबीर का साहस,उनकी निर्भीक वाणी और लोकभाषा में संवाद की शैली उन्हें विशिष्ट बनाती है।इसी कारण वे भक्ति आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तकों में गिने जाते हैं।भक्ति आंदोलन का उद्देश्य शास्त्रीय और दार्शनिक विचारों को सरल एवं सहज भाषा में आमजन तक पहुँचाना था।

कबीर ने इस कार्य को प्रभावी ढंग से किया।उनके पश्चात गोस्वामी तुलसीदास,सूरदास,रहीम तथा अनेक संत-कवियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया,जिसने न केवल भारतवर्ष बल्कि विश्व की चिंतन-धारा को भी प्रभावित किया।कहा कि कबीर ने प्रेम को जीवन का आधार माना।"पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ,पंडित भया न कोय।ढाई आखर प्रेम का,पढ़े सो पंडित होय॥"अर्थात केवल ज्ञान अर्जित कर लेना पर्याप्त नहीं है।जब तक मनुष्य के व्यवहार और वाणी में प्रेम नहीं होगा,तब तक उसका ज्ञान अधूरा है।यही प्रेम मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है,वैमनस्य को समाप्त करता है और सहयोग,सद्भाव तथा सामूहिक उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

यही कबीर का मूल संदेश था। कहा कि यदि हम कबीर के विचारों को अपने आचरण में उतार सकें,तभी कबीर जयंती का यह आयोजन वास्तव में सफल माना जाएगा।स्मृतियों में कहा गया है-"आचारः परमो धर्मः" अर्थात आचरण ही परम धर्म है।यदि हमारे आचरण में उत्कृष्टता,सद्भाव और मानवीयता का समावेश नहीं है,तो अन्य सभी बातें अर्थहीन हो जाती हैं।यदि हम इस संदेश को आत्मसात कर लें,तो कबीर जयंती का यह आयोजन न केवल सफल होगा,बल्कि संत कबीर को सच्ची श्रद्धांजलि भी सिद्ध होगा।
आयोजित कार्यक्रम का सफल एवं प्रभावी संचालन आस्था भारती झा द्वारा किया गया।

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