Sunday, 24 Jan, 9.01 am तरुण मित्र

खेती-बारी
सरकार के प्रस्ताव पर किसान नेताओं को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए

दिल्ली :पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों द्वारा दिल्ली को घेर कर कृषि कानूनों को हटाने के लिए जो आंदोलन चलाया जा रहा है वह अब एक जिद में तब्दील हो गया दिखता है। लगता है कि किसान नेताओं का मकसद सरकार को नीचा दिखाना है।
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों द्वारा दिल्ली को घेर कर कृषि कानूनों को हटाने के लिए जो आंदोलन चलाया जा रहा है, वह अब एक जिद में तब्दील हो गया दिखता है। किसान नेताओं ने सरकार के उस प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, जिसमें इन कानूनों को डेढ़ साल तक रोकने को कहा गया था।किसान नेता उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाई गई कमेटी के सामने भी अपनी बात कहने को तैयार नहीं। वे कृषि कानूनों को वापस लेने और एमएसपी को कानूनी रूप देने पर अड़े हैं। किसान नेताओं के इसी रवैये को देखते हुए सरकार को यह कहना पड़ा कि अब उसके पास उनके लिए कोई प्रस्ताव नहीं। वास्तव में इसका कोई औचित्य नहीं कि सरकार तो लगातार नरमी दिखाए, लेकिन किसान नेता टस से मस न हों
{राजनीति का मोहरा बने किसान}

नि:संदेह भारत का किसान गरीब है, लेकिन सारे किसान गरीब नहीं हैं और जो किसान करीब दो महीने से दिल्ली में डेरा डाले हैं, वे तो खास तौर पर अपनी समृद्धि के लिए जाने जाते हैं। इसकी पुष्टि पंजाब, हरियाणा से लाखों ट्रैक्टर दिल्ली लाने की तैयारी से भी होती है। किसान ये ट्रैक्टर अपने खर्चे से लाएंगे और ले जाएंगे। संपन्नता के चलते ही यहां के किसान आमतौर पर दिहाड़ी मजदूरों से खेती कराते हैं। इसी कारण वे अपना काम-धाम छोड़कर इतने दिन से दिल्ली में डटे हैं। चूंकि किसान संगठनों को समर्थन दे रहे कांग्रेस एवं वाम दलों की दिलचस्पी किसानों को उकसाने में अधिक है इसलिए वे यह कहने को तैयार नहीं कि किसान गणतंत्र दिवस की गरिमा का ध्यान रखें। अपेक्षाकृत समृद्ध किसान तो दिल्ली में डेरा डाले हैं, लेकिन आम किसान उनके आंदोलन से दूरी बनाए हुए हैं। वे इस आंदोलन में अपना हित नहीं देख रहे हैं।

Dailyhunt
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