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Sunday, July 5, 2026
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दिल्ली दंगा मामला: उमर खालिद-शरजील इमाम की जमानत पर कोर्ट का आदेश आज आ सकता है
July 4, 2026
Updated:July 4, 2026
ByTBN Desk
नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने वर्ष 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश (Larger Conspiracy Case) से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में मैराथन सुनवाई पूरी करने के बाद अपना कानूनी फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह बहुप्रतीक्षित निर्णय जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शोध छात्र शरजील इमाम की नियमित जमानत याचिकाओं (Regular Bail Pleas) से संबंधित है। दोनों ही मुख्य आरोपियों ने इस मामले में कस्टडी से रिहाई और नियमित जमानत दिए जाने की गुहार लगाते हुए निचली अदालत का रुख किया था।
यूएपीए (UAPA) के कड़े प्रावधानों के बीच दोनों पक्षों में हुई तीखी कानूनी बहस
विशेष अदालत ने इस हाई-प्रोफाइल मामले में अभियोजन पक्ष (दिल्ली पुलिस) और बचाव पक्ष (आरोपियों के वकीलों) की दलीलों और कानूनी साक्ष्यों को बेहद विस्तार से सुना। मामले की संवेदनशीलता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को देखते हुए कोर्ट ने तुरंत आदेश जारी करने के बजाय अपना निर्णय सुरक्षित रखने का फैसला किया। गौरतलब है कि यह पूरा मामला आतंकवाद विरोधी कड़े कानून 'गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA) के तहत दर्ज किया गया है। विधिक प्रावधानों के अनुसार, यूएपीए के तहत दर्ज मुकदमों में आरोपियों को आसानी से जमानत मिलना बेहद जटिल और मुश्किल माना जाता है।
याद दिला दें कि वर्ष 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के दौरान दिल्ली में बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा भड़की थी, जिसमें जान-माल का भारी नुकसान हुआ था। दिल्ली पुलिस ने इस हिंसा के पीछे एक सोची-समझी और सुनियोजित साजिश रचने का गंभीर आरोप लगाया है, जिसके तहत उमर खालिद और शरजील इमाम को मुख्य साजिशकर्ता के रूप में गिरफ्तार किया गया था।
लबीं हिरासत और पुख्ता सबूतों के अभाव का हवाला देकर मांगी गई जमानत
अदालती कार्यवाही के दौरान उमर खालिद और शरजील इमाम के कानूनी सलाहकारों ने अपनी दलीलें पेश करते हुए कहा कि जांच एजेंसी के पास उनके मुवक्किलों के खिलाफ दंगों की साजिश में सीधे तौर पर शामिल होने के कोई पुख्ता या प्रत्यक्ष सबूत मौजूद नहीं हैं। बचाव पक्ष ने मानवाधिकारों और कानूनी सिद्धांतों का तर्क देते हुए कहा कि आरोपी पिछले कई वर्षों से लगातार न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं, इसलिए उन्हें अब नियमित जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश हुए विशेष लोक अभियोजक (Prosecution) ने इस जमानत अर्जी का पुरजोर विरोध किया। अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि दोनों आरोपी बेहद प्रभावशाली हैं और इस नाजुक मोड़ पर यदि इन्हें रिहा किया जाता है, तो इससे मामले की आगे की जांच और गवाहों की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
आज ही फैसला आने की संभावना, देश के राजनीतिक-सामाजिक हलकों की टिकी नजरें
विधिक सूत्रों के अनुसार, विशेष अदालत द्वारा इस संवेदनशील जमानत याचिका पर आज ही अपना अंतिम फैसला सुनाए जाने की प्रबल उम्मीद जताई जा रही है। इस अदालती आदेश का इंतजार देश के तमाम राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक हलकों में बेहद बेसब्री से किया जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कड़कड़डूमा कोर्ट का यह निर्णय दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े अन्य सह-आरोपियों के मामलों और उनकी जमानत की अपीलों पर भी दूरगामी प्रभाव डालेगा। यह फैसला इस पूरे मामले की आगामी कानूनी दिशा और दशा तय करने में मील का पत्थर साबित होगा।
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