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इन नक्षत्रों में शादी का मतलब खतरा? विद्वानों ने दी सख्त चेतावनी

इन नक्षत्रों में शादी का मतलब खतरा? विद्वानों ने दी सख्त चेतावनी

नातन धर्म में विवाह को केवल एक सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार माना जाता है। आपके द्वारा साझा की गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र के उन सूक्ष्म पहलुओं को उजागर करती है जिन्हें अक्सर लोग सामान्य शुभ मुहूर्त और विवाह मुहूर्त के बीच भ्रमित कर देते हैं।

ज्योतिष और पंचांग के दृष्टिकोण से इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण और बिंदु नीचे दिए गए हैं:

1. पुष्य नक्षत्र: राजा होकर भी विवाह के लिए वर्जित क्यों?

यह एक अत्यंत रोचक तथ्य है कि पुष्य नक्षत्र को 'नक्षत्रों का राजा' कहा जाता है। यह खरीदारी, व्यापार आरंभ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन विवाह के लिए इसे वर्जित माना गया है।

  • पौराणिक कारण: ऐसी मान्यता है कि पुष्य नक्षत्र को ब्रह्मा जी का श्राप प्राप्त है, जिसके कारण यह मांगलिक कार्यों (विशेषकर विवाह) के लिए फलदायी नहीं होता।

  • प्रकृति: पुष्य नक्षत्र की प्रकृति 'लघु और क्षिप्र' है, जो अध्यात्म और संचय के लिए अच्छी है, लेकिन दाम्पत्य सुख के लिए इसे कठोर माना जाता है।

2. नक्षत्र और वैवाहिक स्थिरता

जैसा कि आपने उल्लेख किया, पूर्वा फाल्गुनी और रेवती जैसे नक्षत्रों के संबंध में विद्वानों की अलग-अलग राय होती है:

  • पूर्वा फाल्गुनी: इसका स्वामी शुक्र है, लेकिन इसकी प्रकृति 'उग्र' मानी जाती है, जो कभी-कभी वैवाहिक जीवन में कलह का कारण बन सकती है।

  • वर्जित नक्षत्र: शास्त्रानुसार मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, मूल, अनुराधा, रेवती, रोहिणी, मृगशिरा, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, स्वाति और रेवती को आमतौर पर शुद्धिकरण के बाद विवाह के लिए चुना जाता है, लेकिन इनमें से कुछ को विशेष परिस्थितियों में टाला जाता है।

3. लग्न का महत्व: स्थिरता की कुंजी

विवाह में 'पाणिग्रहण' (हाथ थामना) और 'सिंदूर दान' के समय लग्न का शुद्ध होना सबसे आवश्यक है।

  • स्थिर लग्न (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ): ये लग्न जीवन में स्थायित्व लाते हैं। यदि सिंदूर दान स्थिर लग्न में हो, तो माना जाता है कि रिश्ता अटूट रहता है।

  • वर्जित काल: भद्रा, राहुकाल और पंचक के दौरान शुभ कार्य न करने की सलाह इसलिए दी जाती है क्योंकि ये समय ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करते हैं।

4. खरमास और मांगलिक कार्य

17 मई से शुरू होने वाले खरमास (जब सूर्य वृषभ राशि से निकलकर मिथुन में प्रवेश की तैयारी या अन्य संक्रमण काल में होते हैं, हालांकि मुख्य खरमास धनु और मीन संक्रांति में होता है) या शुक्र/गुरु तारे के अस्त होने पर भी विवाह वर्जित हो जाते हैं। इसे 'मलमास' या 'अशुद्ध मास' भी कहा जाता है क्योंकि इस दौरान सौर ऊर्जा मांगलिक कार्यों के लिए पर्याप्त नहीं मानी जाती।

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