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क्या कानून बचा सकता है एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर के आरोपी पति को? सुप्रीम कोर्ट ने दिया अहम फैसला

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Saturday, July 4, 2026

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क्या कानून बचा सकता है एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर के आरोपी पति को? सुप्रीम कोर्ट ने दिया अहम फैसला

July 4, 2026

Updated:July 4, 2026

ByTBN Desk

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस महत्वपूर्ण फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसमें तलाक के एक मुकदमे के दौरान विवाह-बाह्य संबंध (एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर) के आरोपी पति के 'निजता के अधिकार' के दावे को सिरे से खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी पत्नी अपने पति पर लगे व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) और होटल की बुकिंग जैसे अहम साक्ष्य जुटाने के लिए न्यायपालिका का सहयोग ले सकती है। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने अलग रह रहे पति की उस विशेष अपील को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के मई 2023 के आदेश को चुनौती दी गई थी। पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि उन्हें उच्च न्यायालय के पूर्व आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई विधिक आधार नजर नहीं आता।

वैवाहिक विवादों में निजता का अधिकार असीमित नहीं

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने मूल फैसले में रेखांकित किया था कि देश का कानून विवाह-बाह्य संबंधों को तलाक का एक पूरी तरह वैध और वैधानिक आधार मानता है। ऐसी स्थिति में, यदि किसी विवाहित पुरुष पर अपनी पत्नी के अलावा किसी अन्य महिला के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने का आरोप है, तो वह केवल 'निजता के अधिकार' की आड़ लेकर कानूनी जवाबदेही से बच नहीं सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए साफ किया कि यद्यपि निजता का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है, परंतु यह पूर्ण अथवा असीमित नहीं है; सामाजिक न्याय और जनहित के मामलों में इस पर उचित कानूनी और तार्किक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 14 और साक्ष्यों की स्वीकार्यता

यह पूरा कानूनी विवाद तब शुरू हुआ था जब एक पीड़ित पत्नी ने अपने आरोपों की पुष्टि के लिए फैमिली कोर्ट से गुहार लगाई थी। इसके बाद कुटुंब न्यायालय ने एक निजी होटल को निर्देश दिया था कि वह एक विशेष अवधि के दौरान कमरे की बुकिंग, किए गए भुगतान और वहां रुकने वाले अतिथियों के पहचान पत्रों (आईडी प्रूफ) का पूरा रिकॉर्ड सीलबंद लिफाफे में अदालत के सामने पेश करे। उच्च न्यायालय ने इस प्रक्रिया को फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 14 के बिल्कुल अनुकूल पाया। यह विशेष धारा कुटुंब न्यायालयों को व्यापक विवेकाधिकार देती है कि वे विवादों के त्वरित और प्रभावी समाधान के लिए किसी भी रिपोर्ट, दस्तावेज या बयान को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, भले ही वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के सामान्य तकनीकी नियमों के तहत सीधे तौर पर प्रासंगिक न माना जा रहा हो।

होटल बुकिंग और कॉल डिटेल से व्यभिचार की पुष्टि

अदालत ने अपने आदेश में माना कि विवाह-बाह्य संबंधों या व्यभिचार के सीधे और प्रत्यक्ष सबूत मिलना अमूमन बहुत कठिन होता है। ऐसे में होटल के एंट्री रजिस्टर, भुगतान के विवरण और पहचान पत्र यह स्पष्ट करने में बेहद मददगार साबित हो सकते हैं कि आरोपी व्यक्ति अपनी पत्नी के सिवा किसी दूसरी महिला के साथ एकांत में ठहरा था या नहीं। इसके साथ ही, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) के विश्लेषण से दोनों के बीच बातचीत की समय-अवधि और बारंबारता का पता लगाया जा सकता है, जिससे यह साफ हो सके कि क्या उनके संबंध सामान्य कामकाजी सहकर्मियों से इतर थे। पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जब पति पर दूसरी महिला से एक बेटी होने तक का आरोप हो, तब अदालतें केवल निजता के नाम पर ऐसे व्यक्ति को वैधानिक संरक्षण देकर पत्नी के कानूनी अधिकारों का हनन नहीं होने दे सकतीं।

वैवाहिक विवादों में निजता का अधिकार असीमित नहीं

होटल बुकिंग और कॉल डिटेल से व्यभिचार की पुष्टि

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