हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी के खान मार्केट में रेस्तरां को अग्निशमन विभाग के एनओसी के बिना संचालित करने की अनुमति देते हुए (बशर्ते मेहमानों की संख्या 50 से कम हो), इस बाजार को 'दिल्ली की शान' बताया।
दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में इस बाजार की कई दुकानें देश के विभाजन के बाद पूर्ववर्ती उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) से आए शरणार्थियों को आवंटित की गई थीं।
83 वर्षीय रघुबीर सिंह याद करते हैं, "यह शहर बदल गया विभाजन के बाद।"
1943 में जन्मे और दिल्ली के दक्षिणी छोर पर स्थित तत्कालीन खिड़की गांव में पले-बढ़े सिंह याद करते हैं कि उस समय यह इलाका खेतों से घिरा हुआ था। इसकी सीमाएं सड़कों के बजाय खेतों और खुले मैदानों से तय होती थीं। साल 1947 में भारत के विभाजन की उथल-पुथल अपने साथ एक अचानक और दृश्यमान परिवर्तन लेकर आई। जिन लोगों ने इसे देखा, उनके लिए भारत और पाकिस्तान के बीच खींची गई नई सीमा के पार से शरणार्थियों का आगमन कोई अमूर्त ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि एक दैनिक वास्तविकता थी। परिवार अपने नाम पर बहुत कम सामान लेकर आए थे- बेदखल, दिशाहीन और दूसरों पर निर्भर।
सिंह याद करते हैं, "वे अक्सर अपने बच्चों के लिए थोड़ा दूध मांगने आते थे।" यह उन शिविरों की कठिन परिस्थितियों का प्रतिबिंब है, जो नई सीमाओं के पार से आने वालों के रहने के लिए बनाए गए थे।
फिर भी, अनिश्चितता की इन यादों के साथ उसके बाद जो हुआ, उस पर अविश्वास की भावना भी जुड़ी है। वे शहर के कुछ सबसे समृद्ध और आलीशान इलाकों में बदल चुके मोहल्लों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "अब उनकी कोठियां देखिए।"
जो लोग कभी दिल्ली में खाली हाथ आए थे, वे आज संपत्ति के मालिक, पेशेवर और व्यवसायी बन गए हैं, जो शहर के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में हैं।
इस महीने की शुरुआत में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने शहर के आलीशान खान मार्केट में रेस्तरां को अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) के बिना संचालित करने की अनुमति दी, बशर्ते वे एक समय में 50 से अधिक मेहमानों को न बिठा रहे हों। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने इस बाजार को राष्ट्रीय राजधानी की "शान" और एक "विरासत वाणिज्यिक केंद्र" (heritage commercial hub) के रूप में वर्णित किया।
दिलचस्प बात यह है कि आज विलासिता का प्रतीक माना जाने वाला खान मार्केट, एक छोटे से बाजार के रूप में शुरू हुआ था, जिसमें 154 दुकानें और 74 फ्लैट थे। ये पूर्ववर्ती उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान का हिस्सा बन गया) के शरणार्थियों को आवंटित किए गए थे। इसका नाम उसी क्षेत्र के प्रतिष्ठित नेता खान अब्दुल जब्बार खान के नाम पर रखा गया था।
1947 में, दिल्ली विभाजन से जुड़े सांप्रदायिक दंगों और उसके परिणामस्वरूप होने वाले बड़े पैमाने पर प्रवासन से सबसे बुरी तरह प्रभावित भारतीय शहरों में से एक थी।
इतिहासकार ज्ञानेंद्र पांडे के विवरण के अनुसार, दिल्ली में 20-25 हजार मुसलमान मारे गए थे और 3,30,000 से अधिक मुसलमान नवगठित पाकिस्तान के लिए दिल्ली छोड़ चुके थे। इसका परिणाम यह हुआ कि शहर सिमट गया और घायल हो गया, जिसकी आबादी 5,70,000 घटकर केवल 3,50,000 रह गई। हालांकि, विभाजित पंजाब, सिंध और NWFP से शरणार्थियों के आगमन के साथ, 1951 में जनसंख्या फिर से दस लाख बढ़ गई और 17,44,072 तक पहुंच गई। उन्होंने लिखा कि शहर "मुख्य रूप से एक पंजाबी शहर" बन गया, एक ऐसा प्रतिनिधित्व और अक्सर एक रूढ़ि (stereotype) जो आज भी कायम है। पांडे आगे बताते हैं कि राष्ट्रीय राजधानी में मुसलमानों की जनसंख्या जो 1941 में 33.22 प्रतिशत थी, वह 1951 में घटकर 5.33 प्रतिशत रह गई थी।
जैसे-जैसे नव-स्वतंत्र राष्ट्र एक गणराज्य के रूप में खुद को स्थापित कर रहा था, उसके पास शरणार्थियों को स्थायी रूप से बसाने का भी बहुत बड़ा कार्य था। दिल्ली का विस्तार तब शुरू हुआ, जब नव-स्थापित राहत और पुनर्वास मंत्रालय (Ministry of Relief and Rehabilitation) ने भूमि और आवास आवंटित करना शुरू किया, जिससे शहर की सबसे पहली नियोजित कॉलोनियों का निर्माण हुआ। पटेल नगर, राजेंद्र नगर, मोती नगर, मालवीय नगर और लाजपत नगर जैसे मोहल्ले कुछ ही वर्षों में अस्तित्व में आ गए, जिनका नाम राष्ट्रवादी नेताओं के नाम पर रखा गया था।

दिल्ली के मोहल्लों की एक झलक। फोटो: iStock
वहीं 48 वर्षीय गृहिणी प्रेम कुमार, जो कमला नगर के पास पली-बढ़ीं और अब पंचशील पार्क में रहती हैं, उनके पास उन कॉलोनियों की पहचान करने का एक आसान तरीका है, जो शरणार्थियों को बसाने के लिए शुरू हुई थीं। वे कहती हैं, "इन कॉलोनियों की एक विशिष्ट पहचान प्रत्यय 'नगर' (nagar) है। आप देखिए, ये सभी बाजार भी हैं। यह सब उन पंजाबियों की देन है, जो खाली हाथ शहर आए थे और इन नए मोहल्लों में हर तरह के व्यवसाय किए।"
दिल्ली का अनुभव एक बहुत बड़ी कहानी का केवल एक हिस्सा मात्र था।
पूरे भारत में, शरणार्थियों के पुनर्वास ने नियोजित कॉलोनियों से लेकर अनौपचारिक बस्तियों तक, बहुत ही अलग शहरी स्वरूपों को जन्म दिया। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई शरणार्थी शिविर बनाए गए थे, जिनमें कुरुक्षेत्र शिविर (हरियाणा में) सबसे बड़ा था, जहां पांच लाख से अधिक शरणार्थी ठहरे थे। पंजाब में, अंबाला और लुधियाना जैसे औद्योगिक शहरों ने शरणार्थियों को लघु-स्तरीय विनिर्माण और व्यापार में आत्मसात कर लिया। राजस्थान के जयपुर ने 40,000 से अधिक सिंधी और पंजाबी शरणार्थियों को अपनाया, जिन्हें शुरू में आमेर और दुर्गापुरा शिविरों में बसाया गया था। कोलकाता स्थित 'महानिर्वाण कोलकाता रिसर्च ग्रुप' के 2017 के एक शोध पत्र में उल्लेख किया गया है कि इन समुदायों को बसाने के लिए तीन बाजार- बापू बाजार, इंदिरा बाजार और नेहरू बाजार बनाए गए थे। कोलकाता की कहानी, जो पूर्वी पाकिस्तान (और बाद में 1971 में पाकिस्तान से अलग होने के बाद बांग्लादेश) के साथ अपनी भौगोलिक निकटता के कारण बड़ी संख्या में शरणार्थी प्राप्त करने वाला एक अन्य शहर था, कथित तौर पर अनौपचारिकता और अनिश्चितता से भरी थी।
विशेष रूप से, पुनर्वास ने उन पदानुक्रमों (hierarchies) को खत्म नहीं किया, जिन्हें शरणार्थी अपने साथ लाए थे। बल्कि इसने उन्हें नए स्थानों में फिर से स्थापित और मजबूत कर दिया। शोधकर्ताओं का कहना है कि संसाधनों और राजनीतिक संबंधों वाले समृद्ध उच्च जाति के परिवारों को शहर के केंद्र में प्रमुख स्थान दिए गए, जबकि दलित और गरीब प्रवासियों को हाशिए पर उन कॉलोनियों में धकेल दिया गया, जिनमें बुनियादी सुविधाओं का अभाव था।
उदाहरण के लिए, करोल बाग के पास स्थित रेघरपुरा को लें। यह बस्ती पहली बार औपनिवेशिक काल के दौरान अस्तित्व में आई थी, जब राजस्थान के रेगर समुदाय के चमड़ा शोधकों (leather tanners), जिन्हें नई दिल्ली के निर्माण कार्य में लगाया गया था, को यहां बसाया गया था। इतिहासकार रविंदर कौर अपनी पुस्तक 'सिंस 1947: पार्टीशन नैरेटिव्स अमंग पंजाबी माइग्रेंट्स ऑफ दिल्ली' में दिखाती हैं कि पुनर्वास में जाति के तर्क को कैसे शामिल किया गया था। वह लिखती हैं कि पुनर्वास मंत्रालय ने 15 फरवरी, 1948 को ही विशेष रूप से विस्थापित दलित समुदायों की आवास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक "हरिजन अनुभाग" स्थापित किया था, जिसने रेघरपुरा जैसी कॉलोनियों के लिए धन आवंटित किया था। अगस्त 1948 तक, रेघरपुरा योजना पूर्ण होने के करीब थी, जिसमें दो सहकारी आवास समितियां बनाई गईं और 4,000 रुपये की मामूली शेयर पूंजी जुटाई गई। ये शुरुआत में झोपड़ियां थीं, जिन्हें बाद में मामूली टिन शेड में बदल दिया गया, जो उच्च जाति के पंजाबी हिंदुओं को किए गए भूमि आवंटन से बिल्कुल अलग थे।
दिल्ली की "शरणार्थी कॉलोनियों" की एक लोकप्रिय धारणा यह है कि यहां की आजीविका बाजारों और व्यापार से जुड़ी हुई है। सरकारी आवास के कई अन्य रूपों के विपरीत, विभाजन के बाद बनी ये कॉलोनियां तेजी से तीव्र आर्थिक गतिविधि के केंद्रों में बदल गईं। औपचारिक रोजगार तक सीमित पहुंच के कारण, यहां के निवासियों ने अपने घरों को उत्पादन और वाणिज्य के स्थलों में बदल दिया, जहां अक्सर भूतल (ग्राउंड फ्लोर) का उपयोग दुकानों के रूप में और ऊपरी मंजिलों का रहने के लिए किया जाता था।
मालवीय नगर मार्केट में कपड़ों की दुकान के मालिक 59 वर्षीय प्रदीप पाहवा साझा करते हैं, "हम पंजाबी बहुत उद्यमी (enterprising) होते हैं। जब हम यहां आए थे तो हमारे पास कुछ नहीं था, इसलिए हमें उस किसी भी चीज़ का डर नहीं था, जो दिल्ली के किसी पुराने परिवार को होता। हमारे लिए कोई भी काम बहुत छोटा नहीं था। लाहौर में मेरे परिवार का कपड़ों का व्यवसाय था और हमारी खेती की जमीनें थीं। यहां आने के बाद, हमने जीवित रहने के लिए सब कुछ किया। मेरे माता-पिता ने सड़क के किनारे घर के बने क्रोशिया के उत्पाद बेचे, फिर एक स्टॉल लगाया और उसके बाद मैंने यह स्टोर खरीदा और इसका विस्तार किया। आज आप किसी भी बाजार में चले जाइए, वह एक पंजाबी बाजार ही है।"
आज दिल्ली के अधिकांश बड़े बाजार, जैसे लाजपत नगर, कमला नगर, मालवीय नगर और खान मार्केट, अपनी उत्पत्ति 1950 के दशक में खोजते हैं। खान मार्केट की शुरुआत एक मामूली मोहल्ला बाजार के रूप में हुई थी, जो किराने की दुकानों, किताबों, फोटो स्टूडियो और कपड़ों के साथ रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करता था। मध्य दिल्ली में राजनयिकों और सिविल सेवकों के आवासों के करीब होने के कारण, यह जल्द ही कुलीन वर्ग के बीच लोकप्रिय हो गया और अंततः अपने पुराने स्टोरों को बरकरार रखते हुए कैफे और लक्जरी बुटीक के साथ उस रूप में विकसित हुआ, जैसा वह आज है। साल 2025 की एक रैंकिंग के अनुसार, यह बाजार दुनिया का 24वां सबसे महंगा रिटेल स्पेस (खुदरा स्थान) था।
एक थोड़ा अलग लेकिन समान रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम चित्तरंजन पार्क (CR पार्क) में देखा जा सकता है, जो एक दशक बाद पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों को बसाने के लिए उभरी एक कॉलोनी थी। भारत के विभाजन के बाद, तत्कालीन बंगाल के बुद्धिजीवी और सिविल सेवक पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के बीच विभाजित हो गए थे। जहां पश्चिम बंगाल भारत के भीतर रहा, वहीं पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के कई लोग विभाजन के बाद के वर्षों में दिल्ली सहित भारतीय शहरों में चले गए। पंजाबी शरणार्थियों की लहरों के विपरीत, ये प्रवासी अक्सर शिक्षित पेशेवर थे, जिन्होंने सामूहिक रूप से राजधानी में एक नियोजित आवासीय कॉलोनी की मांग करनी शुरू कर दी थी।
साल 1954 में, उनमें से एक समूह ने जमीन के लिए सरकार पर दबाव बनाने के उद्देश्य से 'ईस्ट पाकिस्तान डिस्प्लेस्ड पर्सन्स एसोसिएशन' का गठन किया। फिर साल 1960 के दशक में जाकर ही यह मांग धरातल पर उतरी, जब शहर के तत्कालीन सुदूर दक्षिणी विस्तार में प्लॉट आवंटित किए गए, जो जहांपनाह जंगल से घिरा हुआ था, जो काफी हद तक निर्जन, चट्टानी और वन क्षेत्र था।
शुरुआत में 'ईस्ट पाकिस्तान डिस्प्लेस्ड पर्सन्स' (EPDP) कॉलोनी के रूप में जानी जाने वाली यह जगह एक विशिष्ट बंगाली एन्क्लेव (बस्ती) के रूप में विकसित हुई, जो साझा भाषा, भोजन और सांस्कृतिक जीवन से आकार लेती गई। यहां 35 वर्षीय अरुणा बनर्जी, जिनके पिता इस कॉलोनी के शुरुआती निवासियों में से एक थे, साझा करती हैं, "यह हमारा मिनी कोलकाता है। विशिष्ट बंगाली मसालों और सब्जियों से लेकर 'लुची' [पूरी] और 'सूजिर पायेश' [सूजी का हलवा] जैसे पसंदीदा व्यंजनों तक, ऐसी चीजें हैं, जो आपको या तो कलकत्ता के बाजार में मिलेंगी या फिर सीआर पार्क के बाजार में।"
दशकों के दौरान, पूर्ववर्ती 'शरणार्थी कॉलोनियों' के दिल्ली के आलीशान इलाकों में तब्दील होने में उनकी भौगोलिक स्थिति (location) ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विभाजन के बाद बनी कई कॉलोनियां, जो शुरू में शहर के बाहरी हिस्सों में थीं, अंततः विस्तार करते हुए शहर के भीतर समाहित हो गईं और व्यावसायिक केंद्र बन गईं।
रंजना सेनगुप्ता, एक संकलन 'सिटी इमप्रोबेबल: एन एंथोलॉजी ऑफ राइटिंग्स ऑन दिल्ली' में लिखती हैं, "लोधी रोड शाही उपनगरीय खुले मैदानों की दक्षिणी सीमा थी और उसके आगे झाड़ियाँ और जंगल थे, जहां सियार हुआ करते थे और काले हिरण घूमते थे।" वहां से शहर दक्षिण की ओर फैला, जिसमें निजामुद्दीन बाहरी इलाके में विकसित होने वाली पहली कॉलोनियों में से एक थी, जिसे कराची से आए कुलीन वर्ग के लिए विकसित किया गया था।

दुर्गा पूजा महोत्सव की झलक। फोटो: iStock
ग्रेटर कैलाश (GK) 1 की 62 वर्षीय निवासी शीतल मारवाह याद करती हैं कि कैसे 1980 के दशक तक यह कॉलोनी जंगलों और खुले खेतों से घिरी हुई थी। वे कहती हैं, "एक नीलगाय या काले हिरण को देखना असामान्य नहीं था। साल 1990 के दशक के बाद से सब कुछ बदल गया। अचानक, हमने खुद को एक महानगर के बीचों-बीच पाया। और आप आज की स्थिति देखिए, यहां चलने तक की जगह नहीं है।" वह बताती हैं कि उनके पिता लाहौर में एक धनी परिवहन व्यवसायी (transport business owner) थे, जो विभाजन के बाद दिल्ली आए थे। इसी तरह उनका परिवार जीके (GK) पहुंचा।
जैसे-जैसे दशकों में शहर का विस्तार दक्षिण और पश्चिम की ओर हुआ, जीके, लाजपत नगर और राजेंद्र नगर जैसे स्थान सड़क नेटवर्क, सार्वजनिक परिवहन और रोजगार केंद्रों से निकटता के कारण बेहतर संपर्क (well-connected) वाले इलाके बन गए। इस स्थानिक लाभ (spatial advantage) का सीधा असर संपत्ति की बढ़ती कीमतों के रूप में सामने आया। कई पूर्ववर्ती शरणार्थी कॉलोनियां, विशेष रूप से दक्षिण दिल्ली की, ऊंची संपत्ति कीमतों, बेहतर बुनियादी ढांचे और आकांक्षात्मक जीवनशैली (aspirational lifestyles) से जुड़ गईं। इसके विपरीत, रियल एस्टेट व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि इस दक्षिण-मध्य धुरी (south-central axis) से दूर की कॉलोनियों ने उसी स्तर के मूल्यवर्धन (valorisation) का अनुभव नहीं किया है, भले ही वे आर्थिक रूप से स्थिर बनी रही हों।
"लाजपत नगर और जंगपुरा इलाके के प्रॉपर्टी डीलर नवराज साहनी कहते हैं, 'यह सब कनेक्टिविटी का खेल है। कई वकील यहां इसलिए रहते हैं क्योंकि अदालतें पास हैं। इसके अलावा भी, सभी अच्छे बाज़ार, स्कूल और अस्पताल इसी इलाके में हैं।' वे आगे कहते हैं, 'यहां प्लॉट बड़े हैं और इन इलाकों के साथ एक खास प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है। लोग वह पता (एड्रेस) चाहते हैं और यही बात मांग और कीमतों को ऊपर बढ़ाती रहती है।'
लाजपत नगर, जीके (GK), मालवीय नगर और सीआर पार्क जैसे दक्षिण दिल्ली के इलाकों में पुराने आवासों की जगह अब नए, बहुमंजिला अपार्टमेंट ले रहे हैं। कई बार कुछ मूल निवासी इन घरों को बेचकर नोएडा, गुड़गांव और फरीदाबाद जैसे इलाकों में बसने के लिए चले जाते हैं।
मसालों के 50 वर्षीय व्यापारी अजय चावला का जन्म मालवीय नगर में हुआ था। वे कहते हैं, 'हमें यह जमीन मिलने से पहले मेरा परिवार कुछ महीनों तक किंग्सवे कैंप [जिसे बाद में गुरु तेग बहादुर नगर के नाम से जाना गया] में रहा था। मेरा जन्म यहीं हुआ था। यह कॉलोनी पहले बहुत शांत और हरी-भरी हुआ करती थी, जहां केवल एक मंजिला पारिवारिक घर होते थे। लेकिन अब जैसे-जैसे परिवार बढ़े हैं और लागत बढ़ी है, हर कोई बिल्डर फ्लोर की ओर बढ़ गया है। आप देख सकते हैं कि अब यहां कितनी भीड़भाड़ हो गई है,' वे अपने मोहल्ले की ओर इशारा करते हुए कहते हैं।
पास ही सीआर पार्क में, एक ब्रोकर काजल दास का दावा है कि पिछले पांच वर्षों में उन्होंने लगभग 60 घरों को गिरते हुए देखा है ताकि नए अपार्टमेंट के लिए रास्ता बनाया जा सके। वे कहते हैं, 'इस मोहल्ले में तीन बेडरूम वाले अपार्टमेंट की कीमत अब 3.5 से 6 करोड़ रुपये के बीच है,' साथ ही उन्होंने जोड़ा, 'पिछले पांच-दस वर्षों में यहां संपत्ति की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं।'
अक्सर ये निर्माण क्षेत्र की जनसांख्यिकी और प्रत्येक कॉलोनी की विशिष्टता को बदल देते हैं और उनकी जगह एक समान, शहरी चरित्र स्थापित कर देते हैं।
बनर्जी कहती हैं, 'बचपन में यह जगह लगभग पूरी तरह से बंगाली थी। आप हर किसी को जानते थे और संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी थीं। अब यह बहुत अधिक 'कॉस्मोपॉलिटन' (मिश्रित) हो गया है, जहां देशभर के पेशेवर रहने आ रहे हैं और कई पुराने परिवारों के बच्चे विदेश में बस गए हैं। अब यहां भीड़ भी ज्यादा है और हरियाली कम। शायद कुछ वर्षों में हमारी कॉलोनी दिल्ली की किसी भी अन्य कॉलोनी जैसी दिखने लगेगी। लेकिन दुर्गा पूजा के दौरान, अभी भी पुराने दिनों जैसा महसूस होता है। समुदाय की वही भावना वापस आ जाती है, भले ही कुछ ही दिनों के लिए सही।'
मध्य क्षेत्र के राजेंद्र नगर की भी ऐसी ही कहानी है। कभी शांत गलियों और 1950 के दशक में बने 'आर्ट डेको' शैली के घरों वाला यह मोहल्ला अब एक आलीशान पड़ोस और नौकरशाहों तथा लुटियंस दिल्ली [ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस द्वारा निर्मित केंद्रीय नई दिल्ली क्षेत्र] में काम करने वाले अन्य लोगों के लिए एक पसंदीदा स्थान बन गया है।
52 वर्षीय उर्वशी छाबड़ा एक पुरानी निवासी हैं। उनका अपना परिवार लाहौर से आया था और उत्तरी दिल्ली के कमला नगर में बस गया था। शादी के बाद वह राजेंद्र नगर आ गईं। उनके दो बेटे अब गुड़गांव में रहते हैं और यह दंपत्ति अपने पुराने मोहल्ले में ही रहना जारी रखे हुए है। वे कहती हैं, 'मुझे नहीं लगता कि अब मैं कहीं और घर जैसा महसूस कर पाऊंगी।'
हालांकि, इस क्षेत्र में घर किराए पर लेने वालों के लिए, यह बस तब तक की बात है, जब तक वे किसी ऐसी जगह न चले जाएं, जिसे वे अपना कह सकें।
पेशे से वकील दीपाली सिंह कहती हैं, 'मैं लगभग तीन साल पहले यहां (न्यू राजेंद्र नगर) आई थी और सुविधाओं में कमी के बावजूद किराया लगातार बढ़ा है। टूटी सड़कें, मानसून में जलभराव, पार्किंग की कमी और बिजली कटौती जैसी समस्याएं यहां हैं।'
जैसा कि कोई भी बिल्डर और प्रॉपर्टी डीलर दावा करेगा, जो चीज़ इसे अभी भी "पॉश" (शानदार) बनाती है, वह है इसकी "लोकेशन"।
लेकिन सिंह आगे कहती हैं: '"पॉश" वास्तव में केवल एक लेबल है। इसका मतलब यह नहीं है कि समस्याएं खत्म हो गई हैं बल्कि इसका मतलब यह है कि आप उन समस्याओं को मैनेज करने के लिए अधिक भुगतान कर रहे हैं।'
ऐसी ही निराशा साशा (केवल पहले नाम से पहचानी गई) की बातों में भी झलकती है, जब वह खान मार्केट में टहलती हैं। 'जहां साइकिलों की जगह लग्जरी कारों ने ले ली है, वही अनुभव बदतर हो गया है। मैं यहां केवल कुछ पुराने समय की दुकानों के लिए आती हूं, खासकर बाहरीसन्स (Baharisons) जैसी किताबों की दुकानों के लिए। अन्यथा बाजार ने अपना आकर्षण खो दिया है। हर दिन इसे खोद दिया जाता है, अब आप पैदल नहीं चल सकते और सारा स्थान कारों ने घेर लिया है,' वह शिकायत करती हैं।"
और इस तरह, जैसे-जैसे दिल्ली का विकास जारी है, एक पैटर्न उभर कर सामने आता है: केंद्रीय क्षेत्रों के भीतर धन और आकांक्षाओं का एकत्रीकरण, भले ही भौतिक विस्तार बाहर की ओर जारी है, जहां कामकाजी वर्ग, पुनर्वास कॉलोनियां और हाशिए पर रहने वाले समूह बसे हुए हैं। वे कॉलोनियां जो कभी गतिशीलता, खुलेपन और विस्तार का प्रतीक थीं, अब संतृप्ति (saturation) के लक्षण दिखा रही हैं। वे कोठियां जो कभी सफलता की पहचान के रूप में खड़ी थीं, अब उन्हें विभाजित कर दिया गया है, पुनर्गठित किया गया है और ऊर्ध्वाधर इकाइयों (vertical units) में ढेर कर दिया गया है। वे मोहल्ले जो कभी शहर के छोर पर स्थित थे, अब मजबूती से केंद्र में हैं, घने, महंगे और तेजी से जर्जर होते हुए।

