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क्या बदल रहा है अमेरिका का चरित्र? शक्ति बनाम लोकतंत्र की बहस तेज

क्या बदल रहा है अमेरिका का चरित्र? शक्ति बनाम लोकतंत्र की बहस तेज

डोनाल्ड ट्रंप की आलोचनाओं, तंज और उपहास के बीच एक बड़ी और कहीं अधिक खतरनाक सच्चाई अक्सर नजरअंदाज हो जाती है-वह यह कि जिस देश का वह नेतृत्व कर रहे हैं, यानी संयुक्त राज्य अमेरिका, अपने मूल में संभवतः एक सैन्य राज्य है, जो लोकतंत्र के मुखौटे के पीछे छिपा हुआ है।

ईरान पर ट्रंप के लापरवाह और विवादित मिसाइल हमलों ने अनजाने में अमेरिका के इसी छिपे हुए चरित्र को उजागर कर दिया है-एक ऐसा देश जो दुनिया को अपने अधीन करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

पिछले दो वर्षों में दो बार ईरान पर सैन्य हमला करके अमेरिका ने अपने कदमों को सही ठहराने के लिए तर्क, कारण और बहाने लगभग खत्म कर दिए हैं। ट्रंप के हालिया 15 बिंदुओं वाले संदेश से यह संकेत मिलता है कि वह ईरान की संप्रभुता से कम पर संतुष्ट नहीं होंगे। पहले लक्ष्य ईरान के परमाणु ढांचे को नष्ट करना था, फिर बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और शासन परिवर्तन की बात आई, और अब होर्मुज जलडमरूमध्य को "मुक्त" करने की मांग सामने आई-जबकि हमले शुरू होने के समय यह मार्ग पहले से खुला था।

अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का इतिहास

ट्रंप की आलोचना करना आसान है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। उनसे पहले भी अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने कई बार संदिग्ध कारणों से सैन्य अभियान चलाए। जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इराक पर हमले के लिए सद्दाम हुसैन के अल-कायदा से संबंध और "विनाश के हथियारों" का दावा किया था। वहीं बराक ओबामा के कार्यकाल में यमन, पाकिस्तान और सोमालिया में सैकड़ों ड्रोन हमले हुए, जिनमें बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए।

अमेरिका ने समय के साथ तथ्यों को प्रस्तुत करने और छिपाने की कला में महारत हासिल कर ली है। ओबामा प्रशासन ने पारदर्शिता की बात की, लेकिन "नागरिक" की परिभाषा बदलकर कई निर्दोष लोगों की मौत को छिपा लिया गया।

दोहरा चेहरा और सैन्य ताकत

अमेरिका का चरित्र लंबे समय तक दोहरा रहा-बाहर सैन्य ताकत का प्रदर्शन और भीतर लोकतंत्र का दावा। "अमेरिकन ड्रीम" के आकर्षण के कारण दुनिया भर से लोग वहां जाते रहे, लेकिन इसके पीछे सैन्य-औद्योगिक तंत्र का गहरा प्रभाव रहा है।हाल के वर्षों में अमेरिका का सैन्य खर्च लगभग 997 अरब डॉलर तक पहुंच गया और यह 1.5 ट्रिलियन डॉलर तक जाने का अनुमान है। चीन जैसे अन्य देशों की तुलना में यह कहीं अधिक है। अमेरिका की वैश्विक ताकत काफी हद तक उसकी सैन्य क्षमता और गुप्त अभियानों पर आधारित रही है।

सैन्य उद्योग और राजनीति

इतना बड़ा सैन्य तंत्र बनाए रखने के लिए हथियारों का उपयोग भी जरूरी हो जाता है। सैन्य ठेकेदारों ने पिछले दो दशकों में राजनीतिक उम्मीदवारों पर भारी धन खर्च किया है। 2023 में ही इस उद्योग ने लॉबिंग पर 139 मिलियन डॉलर से अधिक खर्च किए।यह उद्योग उन नेताओं से अपेक्षा करता है कि वे ऐसे हालात पैदा करें, जिनसे हथियारों की मांग बनी रहे। यही कारण है कि ओबामा जैसे अपेक्षाकृत उदार नेता भी आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर सैन्य कार्रवाई करने को मजबूर हुए।

बाइडेन, नाटो और यूक्रेन युद्ध

जो बाइडेन ने भी अलग रास्ता नहीं अपनाया। उन्होंने यूक्रेन को नाटो में शामिल होने के लिए प्रेरित किया, जिससे रूस के साथ तनाव बढ़ा और अंततः युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में अमेरिका ने यूक्रेन को लगभग 70 अरब डॉलर के हथियार दिए, जिससे अमेरिकी रक्षा उद्योग को भारी लाभ हुआ।

ट्रंप और शांति का वादा

ट्रंप ने खुद को "शांतिदूत" के रूप में पेश करने की कोशिश की और रूस-यूक्रेन युद्ध को एक दिन में खत्म करने का दावा किया। लेकिन यह वादा पूरी तरह खोखला साबित हुआ।2017 में सत्ता संभालने के बाद ट्रंप ने ओबामा द्वारा लागू जवाबदेही के नियमों को हटा दिया। उनके कार्यकाल में ड्रोन हमलों की संख्या और बढ़ गई, भले ही आतंकवादी घटनाएं कम हो रही थीं।

दूसरे कार्यकाल में सत्तावादी झुकाव

दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने अमेरिका की लोकतांत्रिक छवि को और कमजोर किया। उन्होंने बड़ी संख्या में कार्यकारी आदेश जारी किए और आव्रजन एजेंसियों को अधिक शक्तियां दीं। सड़कों पर आम लोगों को रोककर उनकी जांच की गई और विरोध करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हुई।फरवरी 2026 तक, सैकड़ों अमेरिकी नागरिकों पर आव्रजन एजेंसियों से सवाल पूछने के लिए मामले दर्ज किए गए और कई लोगों की मौत भी हुई।

बेरोजगारी और ईरान पर आक्रामकता

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में लगभग 3 लाख सरकारी कर्मचारियों की नौकरियां चली गईं। इसी दौरान अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर मिसाइल हमले शुरू किए, जिससे सैन्य उद्योग को लंबे समय तक फायदा होने की संभावना है।

ईरान इस समय अमेरिकी सैन्य शक्ति का सामना कर रहा है, लेकिन यह केवल एक देश की कहानी नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था की कहानी है, जहां सैन्य ताकत और राजनीतिक हित अक्सर लोकतंत्र और न्याय पर भारी पड़ते हैं।यदि ट्रंप के पिछले रिकॉर्ड को देखें, तो यह आशंका बनी रहती है कि ईरान के बाद अमेरिका किसी और क्षेत्र में भी टकराव तलाश सकता है। ऐसे में सवाल सिर्फ एक युद्ध का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो युद्ध को जन्म देती है।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

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