केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग कर राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है। राहुल गांधी का आरोप है कि 20 जुलाई को संसद मार्च कर रहे छात्र-युवा प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई की राजनीतिक जिम्मेदारी गृह मंत्री की है।
यह मांग सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे का सवाल नहीं है, बल्कि यह इस बात की परीक्षा भी है कि क्या सत्ता के सबसे प्रभावशाली नेताओं से भी उसी तरह जवाबदेही तय की जा सकती है, जैसी धर्मेंद्र प्रधान के मामले में हुई।
लोकसभा से प्रेस कॉन्फ्रेंस तक राहुल का हमला
29 जुलाई को लोकसभा में अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश गृह मंत्री अमित शाह ने दिया था। हालांकि, लगातार हंगामे और व्यवधान के कारण वे अपने तर्क को सदन में पूरा नहीं रख सके। बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने विस्तार से कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई की जिम्मेदारी सीधे गृह मंत्रालय पर आती है और इसलिए अमित शाह को नैतिक आधार पर इस्तीफा देना चाहिए।
मोदी सरकार में अमित शाह की भूमिका
भारतीय राजनीति में अमित शाह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी और रणनीतिकार के रूप में देखा जाता है। गुजरात की राजनीति से लेकर केंद्र की सत्ता तक दोनों नेताओं का राजनीतिक सफर साथ-साथ आगे बढ़ा है।लेख के अनुसार, मोदी सरकार में अमित शाह केवल गृह मंत्री नहीं, बल्कि सरकार और संगठन दोनों के सबसे प्रभावशाली निर्णयकर्ताओं में रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ और केंद्र सरकार की प्रशासनिक मशीनरी पर उनका प्रभाव लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है।
अमित शाह की तुलना उस नेता से की गई है जो राजनीतिक फैसलों को जमीन पर लागू कराने में माहिर माने जाते हैं। लेखक का तर्क है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार का चेहरा हैं तो अमित शाह उसकी कार्यान्वयन शक्ति हैं।
उनके नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर से लेकर पश्चिम बंगाल, बिहार, हरियाणा और महाराष्ट्र तक कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रम हुए। लेखक का दावा है कि गृह मंत्रालय के पास कानून-व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था पर व्यापक नियंत्रण होने के कारण राजनीतिक जिम्मेदारी भी वहीं तय होती है।
20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई पर सवाल
राहुल गांधी का मुख्य आरोप 20 जुलाई को दिल्ली में छात्र-युवा प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर है। प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार और पेपर लीक के खिलाफ संसद मार्च निकाला था।लेख में कहा गया है कि शुरुआत में पुलिस ने पेलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया, लेकिन बाद में यह दावा टिक नहीं पाया। सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के दौरान कहा कि नियमों के तहत पेलेट गन का उपयोग संभव है, हालांकि दिल्ली में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने जीवित गोलियां चलाने का आरोप लगाया। एक छात्रा ने दावा किया कि गोली उसके कान को छूते हुए निकल गई थी। हालांकि इन दावों पर आधिकारिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।
गृह मंत्री की जिम्मेदारी क्यों?
दिल्ली पुलिस आयुक्त सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करते हैं। 20 जुलाई की कार्रवाई से ठीक पहले दिल्ली पुलिस प्रशासन में बड़े स्तर पर बदलाव किए गए थे और नए पुलिस आयुक्त की नियुक्ति हुई थी। इसी आधार पर तर्क है कि यदि पुलिस की कार्रवाई योजनाबद्ध थी तो उसकी अंतिम राजनीतिक जिम्मेदारी गृह मंत्री पर ही आती है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा बना नई मिसाल
सार्वजनिक आंदोलन के दबाव में धर्मेंद्र प्रधान का केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर होना बीजेपी सरकार के लिए एक असामान्य घटना रही। लेखक का कहना है कि बीजेपी और आरएसएस की राजनीतिक संस्कृति में मंत्रियों का सार्वजनिक दबाव में इस्तीफा देना सामान्य परंपरा नहीं रही है। 2015 में वरिष्ठ बीजेपी नेता राजनाथ सिंह भी कह चुके थे कि बीजेपी सरकार के मंत्री कांग्रेस की तरह इस्तीफा नहीं देते।हालांकि इस्तीफे के बाद भी धर्मेंद्र प्रधान को बीजेपी सांसदों ने सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनकी खुलकर प्रशंसा की। इससे यह संदेश गया कि पार्टी ने उनके इस्तीफे को राजनीतिक हार के रूप में स्वीकार नहीं किया।
सीजेपी और आंदोलन की आगे की चुनौती
छात्र-युवा आंदोलन ने सरकार को शिक्षा मंत्री बदलने के लिए मजबूर जरूर किया, लेकिन इससे आंदोलन की राह आसान नहीं होगी। यदि सीजेपी और उसके समर्थक फिर से आंदोलन शुरू करते हैं तो उन्हें पहले से अधिक राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि सत्ता प्रतिष्ठान अपने मंत्रियों के इस्तीफे की मांग को अपनी राजनीतिक छवि के लिए चुनौती मानता है।
नई राजनीतिक बहस की शुरुआत
राहुल गांधी द्वारा अब अमित शाह के इस्तीफे की मांग किए जाने से राजनीतिक संघर्ष एक नए चरण में पहुंच गया है। यदि विपक्ष इस मुद्दे को लगातार उठाता है तो सरकार पर जवाबदेही का दबाव बढ़ सकता है।हालांकि यह भी स्पष्ट है कि अमित शाह जैसे प्रभावशाली नेता का इस्तीफा मांगना भारतीय राजनीति में बेहद असाधारण मांग मानी जाती है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह राजनीतिक टकराव केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या जवाबदेही की बहस को नई दिशा देता है।
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