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सिद्धारमैया के बाद अब कर्नाटक में शिवकुमार युग? क्या 2028 में दिला पाएंगे जीत

सिद्धारमैया के बाद अब कर्नाटक में शिवकुमार युग? क्या 2028 में दिला पाएंगे जीत

र्नाटक की राजनीति में लंबे समय से चल रही सत्ता की खींचतान आखिरकार अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनने का सपना अब पूरा हो गया है। महीनों की अटकलों, अंदरूनी लॉबिंग और कांग्रेस के भीतर जारी तनातनी के बाद वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है, जिससे अब उनके डिप्टी डीके शिवकुमार के लिए रास्ता साफ हो गया है।राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने शुक्रवार (29 मई) को सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया और उनके नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को भंग कर दिया।

कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चल रही थी सत्ता की लड़ाई

यह नेतृत्व परिवर्तन कर्नाटक की राजनीति के सबसे चर्चित सत्ता संघर्षों में से एक माना जा रहा है। 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की शानदार जीत के बाद से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच शक्ति संतुलन की चर्चा लगातार होती रही थी।गुरुवार को सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार और वरिष्ठ मंत्री जी परमेश्वर ने संयुक्त रूप से इस नेतृत्व परिवर्तन की घोषणा की।

पहले से तय था फॉर्मूला?

'टॉकिंग सेंस विद श्रीनि' कार्यक्रम में द फेडरल के एडिटर-इन-चीफ एस श्रीनिवासन ने कहा कि यह व्यवस्था संभवतः 2023 में कांग्रेस की जीत के तुरंत बाद ही तय कर ली गई थी।

उन्होंने कहा,

"जब 2023 में कांग्रेस की जीत के बाद विधानसभा का गठन हुआ था, तभी शायद यह तय कर लिया गया था कि ढाई साल बाद नेतृत्व परिवर्तन होगा।"

शिवकुमार को मिला वफादारी का इनाम

एस श्रीनिवासन के मुताबिक डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना सिर्फ राजनीतिक रणनीति नहीं बल्कि उनकी वफादारी और संगठनात्मक क्षमता का इनाम भी है।जहां सिद्धारमैया कांग्रेस के चुनावी चेहरे बने और उन्होंने अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलितों के AHINDA सामाजिक समीकरण को मजबूत किया, वहीं डीके शिवकुमार ने संगठनात्मक रणनीतिकार और संकटमोचक की भूमिका निभाई।

कांग्रेस के संकटमोचक रहे हैं शिवकुमार

डीके शिवकुमार को लंबे समय से कांग्रेस का "ट्रबलशूटर" माना जाता रहा है। चाहे विश्वास मत के दौरान विधायकों को एकजुट रखना हो या विपक्षी दलों द्वारा विधायकों की खरीद-फरोख्त की कोशिशों से निपटना, शिवकुमार ने कई बार पार्टी के संकटमोचक की भूमिका निभाई है।

एस श्रीनिवासन ने कहा कि राजनीतिक संकटों के दौरान उनकी प्रभावी भूमिका के कारण कांग्रेस आलाकमान का उन पर भरोसा लगातार बढ़ा, भले ही उन्हें केंद्रीय एजेंसियों की जांच और छापों का सामना करना पड़ा हो।

कांग्रेस ने उठाया बड़ा राजनीतिक जोखिम?

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने सिद्धारमैया को कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाकर एक राजनीतिक जोखिम भी लिया है।उन्होंने कहा,"अगर कांग्रेस सिर्फ राजनीतिक दृष्टि से सोचती, तो शायद सिद्धारमैया को ही जारी रखना बेहतर होता।"उनके मुताबिक सिद्धारमैया अभी भी पिछड़े वर्गों को कांग्रेस के साथ जोड़ने की रणनीति के केंद्र में बने हुए थे।

शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती

अब डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कर्नाटक की जटिल जातीय राजनीति को संतुलित करने और कांग्रेस के भीतर स्थिरता बनाए रखने की होगी।माना जा रहा है कि कांग्रेस के कई विधायक अब भी सिद्धारमैया के प्रति निष्ठावान हैं। ऐसे में शिवकुमार के लिए बीजेपी से मुकाबले से ज्यादा मुश्किल अपनी ही पार्टी को एकजुट रखना होगा।एस श्रीनिवासन ने कहा, "बीजेपी से लड़ने से ज्यादा बड़ी चुनौती कांग्रेस को अंदर से संभालना होगी।"

2028 चुनाव से पहले समीकरण साधने की कोशिश

अगले विधानसभा चुनाव में अब दो साल से भी कम समय बचा है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व चाहता है कि उत्तराधिकार की लड़ाई को समय रहते सुलझाकर सामाजिक और राजनीतिक समीकरण मजबूत कर लिए जाएं।अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि क्या डीके शिवकुमार कांग्रेस को एकजुट रखते हुए पार्टी के जनाधार को और व्यापक बना पाएंगे। यही तय करेगा कि कर्नाटक में कांग्रेस का भविष्य किस दिशा में जाएगा।

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