चंदन कुमार की कहानी उन युवाओं के लिए एक सशक्त प्रेरणा है, जो साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर बड़े सपने देखते हैं। बिहार के नालंदा जिले के बिहार शरीफ में 17 जनवरी 1985 को जन्मे चंदन कुमार का जीवन शुरू से ही संघर्ष और संस्कारों के बीच ढला।
उनके पिता एस.एस. प्रसाद बिहार पुलिस में सब-इंस्पेक्टर थे, जिनकी नौकरी बेहद व्यस्त और चुनौतीपूर्ण थी, जबकि उनकी माता किरण देवी गृहिणी होते हुए भी परिवार की असली ताकत थीं। घर में शिक्षा को ही सफलता की कुंजी माना जाता था, और यही सोच चंदन कुमार के व्यक्तित्व की सबसे मजबूत नींव बनी।
बचपन में चंदन कुमार पढ़ाई में बहुत तेज नहीं थे, बल्कि शरारती स्वभाव के कारण उन्हें अनुशासन में लाने के लिए माता-पिता ने रांची के हॉस्टल भेज दिया। यहीं से उनके जीवन ने नया मोड़ लिया। बिशॉप वेस्टकॉट बॉयज़ स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्होंने न केवल अनुशासन सीखा, बल्कि खुद को बदलना भी शुरू किया।
धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और मेहनत के दम पर उन्होंने 10वीं कक्षा में 90 प्रतिशत अंक हासिल कर सबको चौंका दिया। इसके बाद उन्होंने रांची के डीएवी श्यामली स्कूल से फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स के साथ 12वीं पूरी की और इंजीनियर बनने का सपना देखा।
लगन और अनुशासन
हालांकि IIT का सपना पहली बार में पूरा नहीं हुआ। जेईई परीक्षा में असफलता उनके सामने एक बड़ी चुनौती बनकर आई, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय इसे अपनी ताकत बना लिया। एक साल का ड्रॉप लेकर उन्होंने दिल्ली में कड़ी मेहनत की और अगले ही प्रयास में IIT रुड़की में प्रवेश हासिल कर लिया।
यहां उन्होंने प्रोडक्शन एंड इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। पढ़ाई पूरी होने से पहले ही उन्हें एक प्राइवेट बैंक में नौकरी मिल गई, जहां उन्होंने लगभग एक साल तक काम किया। इस नौकरी ने उन्हें न केवल व्यावसायिक अनुभव दिया, बल्कि आगे की तैयारी के लिए आत्मनिर्भर भी बनाया।
हिम्मत नहीं हारी
लेकिन उनके भीतर कुछ बड़ा करने की चाह थी। उनके मामा, जो इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट सर्विस के अधिकारी थे, उनसे प्रेरित होकर चंदन कुमार का झुकाव सिविल सेवा की ओर बढ़ा। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह यूपीएससी की तैयारी में जुट गए। पहला प्रयास उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा- वे प्रारंभिक परीक्षा तो पास कर गए, लेकिन मुख्य परीक्षा में रुक गए।
इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पूरी ताकत के साथ दोबारा प्रयास किया। दूसरे प्रयास में उन्होंने 195वीं रैंक हासिल कर यह साबित कर दिया कि दृढ़ संकल्प और मेहनत के सामने असफलता टिक नहीं सकती।
अलग पहचान बनाई
2011 बैच के आईएएस अधिकारी के रूप में उन्होंने छत्तीसगढ़ कैडर ज्वाइन किया और अपने काम से जल्दी ही अलग पहचान बना ली। बिलासपुर में सहायक कलेक्टर के रूप में शुरुआत करने के बाद बस्तर में एसडीएम रहते हुए उन्होंने हजारों लंबित जाति प्रमाण पत्र बनवाए और राजस्व मामलों का तेजी से निराकरण किया।
इसके बाद कांकेर और राजनांदगांव में जिला पंचायत सीईओ के रूप में उन्होंने ग्रामीण विकास और स्वच्छता के क्षेत्र में कई प्रभावी पहल कीं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांवों को ओडीएफ बनाना और बिहान योजना को मजबूती देना उनके कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा।
जनता का भरोसा जीता
सुकमा में कलेक्टर के रूप में उनकी पहली पोस्टिंग ने उन्हें एक अलग पहचान दी। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जहां प्रशासन की पहुंच सीमित थी, वहां उन्होंने जगरगुंडा, किस्टाराम और भेज्जी जैसे इलाकों में बंद पड़े स्कूलों और अस्पतालों को फिर से शुरू करवाया।
यह केवल विकास का काम नहीं था, बल्कि इससे स्थानीय लोगों का भरोसा भी प्रशासन पर मजबूत हुआ और नक्सलवाद के खिलाफ एक सकारात्मक माहौल बना। इसके बाद कांकेर में कलेक्टर रहते हुए उन्होंने कोविड की दूसरी लहर के दौरान स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को इतने बेहतर तरीके से संभाला कि मरीजों को जिले से बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ी।
उनके कार्यकाल में मेडिकल कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थानों की शुरुआत हुई, साथ ही शहर के बुनियादी ढांचे में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ। जगदलपुर में उन्होंने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का ऐसा मॉडल लागू किया, जिसे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में एक नई पहल के रूप में देखा गया।
प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ उनकी कार्यशैली की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि वे हर चुनौती को जमीन पर जाकर समझते और उसका समाधान निकालते हैं। यही कारण है कि वे विशेष सचिव स्वास्थ्य और विशेष सचिव सामान्य प्रशासन विभाग के पद पर भी रहे हैं।
इन दिनों आईएएस चंदन कुमार (IAS Chandan Kumar) एनआरडीए के सीईओ हैं और एक परिणाम देने वाले अफसर के रूप में पहचाने जाते हैं। चंदन कुमार की यात्रा यह दिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों तो साधारण शुरुआत भी असाधारण मुकाम तक पहुंचा सकती है।
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