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आईएएस डॉ. सौरभ संजय सोनवणे: प्रशासन में किताबी ज्ञान नहीं, ऑन-द-स्पॉट निर्णय क्षमता आती है काम

आईएएस डॉ. सौरभ संजय सोनवणे: प्रशासन में किताबी ज्ञान नहीं, ऑन-द-स्पॉट निर्णय क्षमता आती है काम

छोटे शहरों और सीमित संसाधनों से निकलकर बड़े सपनों को साकर करना किसी कहानी जैसा लगता है। लेकिन, कुछ लोग इसे हकीकत में बदल देते हैं और ये ही लोग बदलाव की मिसाल बनते हैं। ऐसी ही एक प्रेरक यात्रा महाराष्ट्र के आईएएस डॉ. सौरभ संजय सोनवणे की है, जिन्होंने जलगांव जिले के पास एक छोटे से गांव से निकलकर पहले मेडिकल की कठिन पढ़ाई और फिर प्रशासनिक सेवा तक का सफर तय किया।

फैमिली बैकग्राउंड

आईएएस डॉ. सौरभ संजय सोनवणे का बचपन जलगांव से लगभग 50 किलोमीटर दूर एक गांव में बीता। उनके पिता प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मेडिकल ऑफिसर के रूप में पदस्थ थे और माता एक शिक्षिका थीं। गांव के सरकारी स्कूल से प्राथमिक शिक्षा लेने के बाद वे आठवीं कक्षा से जलगांव लौटे और वहीं से बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी की।

पिता की सरकारी सेवा ने उन्हें बचपन से ही सिस्टम को करीब से देखने का अवसर दिया। वहीं माता ने पढ़ाई के लिए खुला और पॉजिटिव माहौल दिया। जहां सवाल पूछना, सोच विकसित करना और समस्याओं के समाधान खोजना सिखाया गया।

एनसीसी ने गढ़ा व्यक्तित्व

स्कूली जीवन में एनसीसी ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से आकार दिया। आठवीं से बारहवीं तक एनसीसी से जुड़े रहने के दौरान 2007 में उन्हें रिपब्लिक डे परेड में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। राजपथ, दिल्ली तक का यह सफर अनुशासन, धैर्य और देशभक्ति का वास्तविक अर्थ सिखाने वाला अनुभव बना। कम उम्र में मिले इस एक्सपोजर ने उन्हें मानसिक रूप से मजबूत और संतुलित बनाया।

भाषा नहीं, ज्ञान और मेहनत है जरूरी

मेडिकल की पढ़ाई के लिए मुंबई जाना आईएएस सौरभ संजय जीवन का बड़ा मोड़ था। हर छोटे शहर से आए छात्र की तरह शुरुआत में अंग्रेजी भाषा को लेकर उनके अंदर झिझक रही। लेकिन समय के साथ उन्हें यह स्पष्ट हुआ कि असली पहचान भाषा से नहीं, बल्कि ज्ञान, मेहनत और आत्मविश्वास से बनती है। यही सोच आगे चलकर उनके करियर की मजबूत नींव बनी।

प्रशासनिक सेवा की ओर बचपन से था रुझान

डॉ. सौरभ बताते हैं कि उनके दादा राजस्व विभाग में डिप्टी कलेक्टर रहे, नाना पुलिस विभाग में। इसलिए बचपन से ही उनके मन में सरकारी अफसर बनने की इच्छा थी। मेडिकल कॉलेज के दौरान जब उन्होंने अपने सीनियर्स को UPSC में चयनित होते देखा, तब उन्हें एहसास हुआ कि यूपीएससी कोई असंभव लक्ष्य नहीं है। इसी सोच के साथ उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिविल सेवा की तैयारी का निर्णय लिया।

बिना कोचिंग के पाई सफलता

डॉ सौरभ ने दिल्ली जाने के बजाय पुणे में रहकर सेल्फ-स्टडी को प्राथमिकता दी। मेडिकल साइंस को ऑप्शनल विषय बनाकर उन्होंने सीमित संसाधनों में तैयारी की। शुरुआती प्रयासों में भले ही लक्ष्य से थोड़ा चूक हुई, लेकिन हर प्रयास ने उन्हें अनुभव, आत्मविश्लेषण और सुधार का अवसर दिया। तीसरे प्रयास में अपनी गलतियों को पहचानकर उन्होंने सफलता हासिल की।

सही स्ट्रेटेजी जरूरी

डॉ. सौरभ कहते हैं कि यूपीएससी की परीक्षा पास करने के लिए सबसे जरूरी है सही स्ट्रेटेजी बनाना। तैयारी की पहले ही अच्छे से सोच लें कि कौन सा वैकल्पिक विषय सही रहेगा। अपने स्ट्रॉंग और वीक प्वाइंट्स देखें। उसके हिसाब से ही पढ़ाई का पैटर्न तय करें।

पद से ऊपर व्यक्तित्व

IAS Dr Saurabh का मानना है कि पद और प्रतिष्ठा अस्थायी होती है, लेकिन व्यक्ति का चरित्र और व्यवहार स्थायी पहचान बनाता है। उनके लिए प्रशासनिक पद सेवा का माध्यम है, न कि अहंकार का। वे कहते हैं कि पद का बोझ रिश्तों और व्यवहार पर नहीं पड़ने देना चाहिए, क्योंकि अंत में परिवार, मित्र और मानवीय संबंध ही जीवन की असली पूंजी होते हैं। वो कहते हैं आज भी में एक बार में पुराने दोस्तों का फोन उठा लेता हूं।

योग और खेल के हैं शौकीन

योग और खेल उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा हैं। उनका मानना है कि लंबी प्रशासनिक सेवा के लिए मानसिक संतुलन और आत्मिक शांति बेहद जरूरी है। यही संतुलन उन्हें दबाव में भी स्थिर बनाए रखता है। आज भी वो सुबह क्रिकेट या बैडमिंटन जरूर खेलते हैं।

तुरंत निर्णय लेना सबसे जरूरी

IAS Dr Saurabh कहते हैं अच्छे आईएएस की सबसे बड़ी पहचान तुरंत निर्णय लेने की क्षमता है। कई बार रिस्क लेकर बोल्ड निर्णय लेने पढ़ते हैं। उस समय आप कैरियर का नहीं सोच सकते।

करियर एक नजर

नाम: डॉ सौरभ सोनवणे

जन्म: 30-1-1991

जन्मस्थान: जलगांव

एजुकेशन: एमबीबीएस

बैच: 2017

कैडर: मध्य प्रदेश

पदस्थापना

डॉ. सौरभ संजय इस समय रीवा नगर निगम आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं। इसके पहले वो रीवा पंचायत सीईओ, नरसिंहपुर पंचायत सीईओ और खंडवा में एडिशनल कलेक्टर भी रह चुके हैं।

डॉ. सौरभ कहते हैं कि वो कम जरूरतों में, अपने सिद्धांतों से समझौता किए बिना, पूरी ईमानदारी के साथ सेवा करना चाहते हैं। वे मानते हैं कि मेडिकल की पढ़ाई और प्रशासनिक सेवा, दोनों ही मानवता की सेवा के अलग-अलग माध्यम हैं, और इसी भावना को जीवित रखना उनके जीवन का मूल उद्देश्य है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि संकल्प, निरंतर मेहनत और सही दिशा हो, तो कोई भी सपना असंभव नहीं होता।

(प्रोफाइल 286- 2 मार्च 2026 तक अपडेट)

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