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CBSE का पेरेंटिंग कैलेंडर: बच्चों की सोशल मीडिया और गेमिंग की लत छुड़ाने में मिलेगी मदद

CBSE का पेरेंटिंग कैलेंडर: बच्चों की सोशल मीडिया और गेमिंग की लत छुड़ाने में मिलेगी मदद

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने शिक्षा की पारंपरिक परिभाषा को बदलते हुए एक नया कदम उठाया है। शैक्षिक सत्र 2026-27 के लिए बोर्ड ने अपना नया पेरेंटिंग कैलेंडर लॉन्च किया है।

इस पहल का मुख्य उद्देश्य यह है कि माता-पिता सिर्फ पीटीएम के औपचारिक दर्शक ना बनें, बल्कि बच्चे के विकास में एक सक्रिय भागीदार बनें।

यह नई शिक्षा नीति का हिस्सा है, जिसमें पढ़ाई का मतलब सिर्फ रटना और अंक लाना नहीं, बल्कि बच्चे का मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास भी शामिल है।

बदलते व्यवहार को पहचानना सिखाएंगे स्कूल

अक्सर माता-पिता बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों को समझ नहीं पाते हैं। इस नए कैलेंडर के माध्यम से स्कूल अब माता-पिता को खास ट्रेनिंग देंगे। इसमें बच्चों के तनाव, एंजायटी और नशे के खिलाफ जागरूकता के लिए विशेष अध्याय जोड़े गए हैं।

इसका सबसे बड़ा फोकस बच्चों को सोशल मीडिया, गेमिंग एडिक्शन और स्क्रीन टाइम मैनेजमेंट के जाल से बाहर निकालना है।

4R का सिद्धांत, रिश्तों को मिलेगी नई गहराई

यह नया कैलेंडर 4R के सिद्धांत पर आधारित है, जो माता-पिता और बच्चों के बीच के रिश्ते को मजबूत बनाने का काम करेगा।

  • रिफ्लेक्शन: अपनी परवरिश के तरीकों पर विचार करना।
  • रीइन्फोर्समेंट: बच्चे के सकारात्मक व्यवहार को बढ़ावा देना।
  • रिलेशनशिप: पेरेंट्स और बच्चे के बीच भरोसे का रिश्ता मजबूत करना।
  • रिजॉइसिंग: बच्चे की छोटी-छोटी उपलब्धियों और साथ बिताए पलों का जश्न मनाना।

डिजिटल लत और अकेलेपन पर प्रहार

बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार आज के समय में स्क्रीन एडिक्शन और करियर का दबाव बच्चों को अकेला कर रहा है। ऐसे में स्कूल, टीचर और पेरेंट्स के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी है।

इस कैलेंडर के जरिए स्कूलों में सिर्फ पीटीएम नहीं होगी, बल्कि व्यवस्थित संवाद होगा। जरूरत पड़ने पर तुरंत मीटिंग बुलाई जाएगी ताकि समस्या गंभीर होने से पहले ही उसे सुलझाया जा सके।

इसके अलावा स्कूलों में ओपन हाउस और विशेष प्रोजेक्ट्स जैसे इवेंट्स आयोजित किए जाएंगे। इससे माता-पिता और बच्चों के बीच ऑफलाइन जुड़ाव बढ़ सकेगा।

इसका समाज पर असर

  • समाज में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जो समस्याएं हैं वे खत्म होंगी।
  • परिवारों में बढ़ते डिजिटल गैप को कम करने में मदद मिलेगी। इससे पारिवारिक रिश्ते बेहतर होंगे।
  • जब पेरेंट्स और टीचर्स मिलकर काम करेंगे, तो छात्र केवल किताबी कीड़ा न बनकर एक संतुलित व्यक्तित्व के रूप में उभरेंगे।
  • कम उम्र में नशे या गलत आदतों की पहचान होने से बच्चों को बिगड़ने से बचाया जा सकेगा।

FAQ
Q. सीबीएसई पेरेंटिंग कैलेंडर का मुख्य उद्देश्य क्या है? A. इसका मुख्य उद्देश्य माता-पिता को केवल फीस देने वाले या पीटीएम में शामिल होने वाले दर्शक के बजाय बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास में एक सक्रिय भागीदार बनाना है। यह उन्हें बच्चों के व्यवहार और डिजिटल आदतों को समझने में मदद करेगा। Q. क्या सीबीएसई का पेरेंटिंग कैलेंडर सभी कक्षाओं के लिए एक जैसा है? A. नहीं, सीबीएसई ने इसे उम्र के हिसाब से बांटा है। बाल वाटिका के लिए फोकस आदतों पर है, मिडिल क्लास के लिए डिजिटल व्यवहार पर और सीनियर क्लास के लिए करियर व परीक्षा के तनाव को मैनेज करने पर विशेष ध्यान दिया गया है।

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