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दतिया में उपचुनाव से पहले सामाजिक इंजीनियरिंग, वोट नहीं जातीय समीकरण बन रहे सबसे बड़ा हथियार

दतिया में उपचुनाव से पहले सामाजिक इंजीनियरिंग, वोट नहीं जातीय समीकरण बन रहे सबसे बड़ा हथियार

तिया विधानसभा में प्रस्तावित उपचुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से मोर्चेबंदी शुरू कर दी है, लेकिन इस बार लड़ाई केवल प्रत्याशियों की नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों की दिखाई दे रही है।

भाजपा जहां अलग-अलग समाजों को जोड़कर अपना आधार मजबूत करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस टिकट और संगठन के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रही है।

दूसरी ओर आजाद समाज पार्टी भी नए समीकरण गढ़कर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में दतिया का उपचुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं बल्कि सामाजिक प्रभाव और राजनीतिक पकड़ की परीक्षा बनता नजर आ रहा है।

दतिया में चुनावी जंग का केंद्र बना सामाजिक समीकरण

दतिया उपचुनाव की औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां बता रही हैं कि चुनावी तैयारी पूरी रफ्तार पर है। इस बार सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि लगभग सभी दल सामाजिक आधार को मजबूत करने पर फोकस कर रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव जीतने की कुंजी केवल पार्टी संगठन नहीं बल्कि विभिन्न समाजों के बीच प्रभाव बढ़ाने में छिपी है। यही वजह है कि मैदान में उतरने से पहले सभी दल अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने में जुट गए हैं।

भाजपा का फोकस: समाजों को जोड़कर बढ़ाना जनाधार

पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा पिछले कुछ समय से लगातार क्षेत्र में सक्रिय हैं। भाजपा की रणनीति साफ दिखाई दे रही है कि चुनावी बिगुल बजने से पहले विभिन्न समाजों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई जाए।

मई महीने में कई कार्यक्रमों के जरिए यादव, पाल, क्षत्रिय समेत विभिन्न वर्गों के लोगों को पार्टी से जोड़ने की कोशिश की गई। भाजपा इसे अपनी नीतियों और विकास कार्यों पर जनता के भरोसे का संकेत बता रही है।

पार्टी के लिए यह अभियान केवल सदस्यता तक सीमित नहीं है बल्कि उपचुनाव से पहले सामाजिक आधार को मजबूत करने का प्रयास भी माना जा रहा है।

कांग्रेस के सामने घर संभालने की चुनौती

दूसरी तरफ कांग्रेस संगठन को सक्रिय करने में जुटी हुई है। ब्लॉक, मंडल और बूथ स्तर पर बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। हालांकि पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती संगठन नहीं बल्कि टिकट चयन को लेकर दिखाई दे रही है। कई नेता संभावित उम्मीदवार के तौर पर खुद को मजबूत दावेदार मान रहे हैं।

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि टिकट को लेकर बढ़ती दावेदारी चुनावी तैयारी के साथ-साथ कांग्रेस नेतृत्व के लिए संतुलन बनाने की परीक्षा भी बन सकती है।

टिकट की दौड़ ने बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किलें

कांग्रेस में पूर्व विधायक राजेंद्र भारती अपने बेटे के लिए टिकट की पैरवी कर रहे हैं। वहीं अवधेश नायक समेत कई नेता भी दावेदारी पेश कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक आधा दर्जन से ज्यादा नेता टिकट की दौड़ में सक्रिय हैं। भोपाल से लेकर दिल्ली तक संपर्क और लॉबिंग का दौर भी तेज हो चुका है। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि टिकट किसे मिले और बाकी दावेदारों को कैसे साधा जाए।

भाजपा में तस्वीर ज्यादा साफ, एक चेहरे पर टिकी नजर

भाजपा खेमे में फिलहाल स्थिति अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई दे रही है। राजनीतिक चर्चाओं में डॉ. नरोत्तम मिश्रा का नाम सबसे आगे माना जा रहा है। क्षेत्र में उनकी सक्रियता और संगठन पर पकड़ को देखते हुए पार्टी के भीतर फिलहाल किसी दूसरे चेहरे की चर्चा कम दिखाई देती है। यही कारण है कि भाजपा की तैयारी प्रत्याशी चयन से ज्यादा चुनावी जमीन मजबूत करने पर केंद्रित नजर आ रही है।

तीसरे मोर्चे की दस्तक, समीकरण बदलने की कोशिश

आजाद समाज पार्टी भी दतिया में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में जुटी है। पार्टी नेता दामोदर यादव लगातार जनसंपर्क अभियान, किसान सम्मेलन और कार्यकर्ता बैठकों के जरिए सक्रिय हैं।

पार्टी का दावा है कि अन्य दलों के कई कार्यकर्ता उसके संपर्क में हैं। उदगवां, सेवढ़ा, भांडेर और इंदरगढ़ जैसे क्षेत्रों में आयोजित कार्यक्रमों के जरिए संगठन विस्तार का प्रयास किया जा रहा है।

हालांकि मुकाबले का केंद्र भाजपा और कांग्रेस ही मानी जा रही हैं, लेकिन तीसरे मोर्चे की सक्रियता कुछ क्षेत्रों में वोटों के बंटवारे का कारण बन सकती है।

समझिए दतिया उपचुनाव की 5 बड़ी बातें

  • उपचुनाव से पहले सभी दल सामाजिक आधार मजबूत करने में जुटे हैं।
  • भाजपा का फोकस विभिन्न समाजों को जोड़कर चुनावी बढ़त बनाने पर है।
  • कांग्रेस संगठन मजबूत कर रही है, लेकिन टिकट चयन बड़ी चुनौती बन सकता है।
  • भाजपा में संभावित उम्मीदवार को लेकर तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट मानी जा रही है।
  • आजाद समाज पार्टी की सक्रियता चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

दतिया का प्रस्तावित उपचुनाव अब केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं रह गया है। असली लड़ाई सामाजिक प्रभाव, संगठनात्मक ताकत और उम्मीदवार चयन की रणनीति के बीच दिखाई दे रही है। चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले ही मैदान सज चुका है और आने वाले महीनों में दतिया प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक प्रयोगशालाओं में से एक बन सकता है।

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