छत्तीसगढ़ में वर्षों तक नक्सलवाद की आग में झुलसते रहे बस्तर में अब हालात बदल रहे हैं। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई के बाद जिन गांवों से लोग कभी जान बचाकर भागे थे, अब वहीं लौटकर फिर से खेती-किसानी और सामान्य जीवन शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसी बीच वन विभाग की कार्रवाई ने नया विवाद खड़ा कर दिया है।
पुलिस मुख्यालय ने खुद वन विभाग को पत्र लिखकर चेताया है कि विभाग की कार्यशैली नक्सल प्रभावित इलाकों में नया असंतोष पैदा कर रही है और कभी भी कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना हो सकती है। चेतावनी इतनी गंभीर है कि प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) को तत्काल सभी संबंधित अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट तलब करनी पड़ी है।
पुलिस मुख्यालय की रिपोर्ट ने बढ़ाई सरकार की चिंता
एडीजी नक्सल विवेकानद ने 24 जून को लिखे पत्र में साफ कहा है कि बीजापुर और आसपास के इलाकों में नक्सलवाद कमजोर पड़ने के बाद बड़ी संख्या में विस्थापित आदिवासी परिवार अपने गांवों में लौट रहे हैं। वर्षों बाद उन्हें उम्मीद जगी है कि अब वे अपनी जमीन पर खेती करेंगे और सामान्य जीवन जी सकेंगे, लेकिन वन विभाग द्वारा वन भूमि पर अतिक्रमण का हवाला देकर खेतों, झोपड़ियों और अन्य निर्माणों पर कार्रवाई की जा रही है। इससे ग्रामीणों में नाराजगी तेजी से बढ़ रही है। पुलिस ने स्पष्ट शब्दों में आगाह किया है कि यदि इस स्थिति को समय रहते नहीं संभाला गया तो यह असंतोष भविष्य में गंभीर कानून-व्यवस्था की समस्या का रूप ले सकता है। जिन इलाकों में बड़ी मुश्किल से शांति लौट रही है, वहां सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी हालात को फिर बिगाड़ सकती है।
जंगल बचाने की कार्रवाई या लौटते ग्रामीणों पर सख्ती
वन विभाग का तर्क है कि आरक्षित वन क्षेत्र में अतिक्रमण किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता, लेकिन दूसरी ओर सवाल यह भी उठ रहा है कि जिन परिवारों ने वर्षों तक नक्सली हिंसा झेली, गांव छोड़े और अब शांति लौटने पर वापस आए हैं, उनके पुनर्वास का रास्ता आखिर कौन तय करेगा? स्थानीय स्तर पर यह धारणा बन रही है कि सुरक्षा बलों ने जिन इलाकों को नक्सलवाद से मुक्त कराया, वहां लौटने वाले लोगों को अब दूसरे सरकारी विभागों की कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह है कि पुलिस मुख्यालय ने अपने पत्र में केवल प्रशासनिक पहलू नहीं, बल्कि सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी प्रमुखता से उठाया है।
पीसीसीएफ ने मांगी पूरी रिपोर्ट
पुलिस मुख्यालय की गंभीर आपत्ति के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने 1 जुलाई 2026 को मुख्य वन संरक्षक, जगदलपुर को पत्र जारी कर पूरे मामले में तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है। निर्देश दिया गया है कि वन विभाग द्वारा की गई कार्रवाई, उससे उत्पन्न परिस्थितियों और वर्तमान स्थिति की पूरी जानकारी सात दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जाए। माना जा रहा है कि रिपोर्ट मिलने के बाद राज्य स्तर पर पूरे मामले की समीक्षा की जाएगी और आगे की रणनीति तय होगी। यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि सरकार भी इस मामले को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। पुलिस और वन विभाग के बीच हुए इस आधिकारिक पत्राचार ने प्रशासनिक समन्वय पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
पुनर्वास मॉडल पर होंगे सवालिया निशान
बस्तर में सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि नक्सलवाद अपने अंतिम दौर में है और अब विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पुनर्वास पर पूरा ध्यान दिया जाएगा। लेकिन यदि गांव लौट रहे आदिवासियों और वन विभाग के बीच टकराव बढ़ता है तो यह सरकार के पुनर्वास मॉडल पर भी सवाल खड़े करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल संरक्षण और आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना अब सबसे बड़ी चुनौती है। यदि इस मुद्दे पर संवेदनशील और समन्वित निर्णय नहीं लिए गए तो वर्षों की मेहनत से बनी शांति पर फिर से संकट के बादल मंडरा सकते हैं। अब सबकी निगाहें उस रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो सात दिनों के भीतर सरकार के सामने आएगी। यह रिपोर्ट केवल वन विभाग की कार्रवाई का ब्यौरा नहीं होगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि नक्सलवाद के बाद बस्तर की नई तस्वीर विकास की बनेगी या सरकारी विभागों के टकराव की।
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