Raipur: सरकार की तरफ से बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ की बातें बहुत होती हैं,लेकिन माता पिता इसको लेकर गंभीर नहीं हैं। एसआरएस की ताजा रिपोर्ट के हिसाब से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बेटियों के जन्म को लेकर कोई उपलब्धि नहीं है।
पिछले पांच साल में 1000 बेटों पर बेटियों की संख्या देखें तो एमपी में स्थिति जस की तस है। राजस्थान में करीब आधा फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। छत्तीसगढ़ में भी महज 2 फीसदी का इजाफा हुआ है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से भी पीछे है। सवाल यही है कि बेटियों को नहीं बचाओगे तो फिर बहुएं कहां से लाओगे।
ये तीनों राज्यों की स्थिति
एसआरएस की रिपोर्ट कहती है कि साल 2018-20 में मध्यप्रदेश में एक हजार लड़कों पर 919 लड़कियां थीं। साल 2022-24 में यह संख्या जस की तस 919 ही है। यानी एमपी में लड़कियों की संख्या में जीरो इजाफा हुआ है। राजस्थान में साल 2018-20 में 911 बेटियां थीं जो साल 2022-24 में बढ़कर 917 हो गईं।
यह बढ़ोत्तरी महज 0.6 फीसदी यानी करीब आधा फीसदी है। छत्तीसगढ़ में 2018-20 में एक हजार लड़कों पर 958 लड़कियां थीं। साल 2022-24 में बढ़कर 978 हो गईं। यह इजाफा भी महज 2 फीसदी है। राष्ट्रीय औसत में एक हजार लड़कों पर 918 लड़कियां हैं। जो कि एमपी और राजस्थान से ज्यादा हैं।
इन राज्यों में संस्थागत प्रसव बढ़े
वर्ष 2019 से 2024 के बीच मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मेडिकल अटेंशन के साथ होने वाले प्रसव में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2019 में कुल 83.5 प्रतिशत प्रसव मेडिकल अटेंशन के साथ हुए थे, जो 2024 में बढ़कर 98.5 प्रतिशत पहुंच गए।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 79.5 प्रतिशत से बढ़कर 98.2 प्रतिशत हो गया, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 98.1 प्रतिशत से बढ़कर 97.5 प्रतिशत के आसपास बना रहा। छत्तीसगढ़ में भी संस्थागत प्रसव में सुधार दर्ज किया गया। वर्ष 2019 में राज्य में 77.3 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों में हुए थे, जो 2024 में बढ़कर 97.1 प्रतिशत हो गए।
ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 74.2 प्रतिशत से बढ़कर 96.8 प्रतिशत पहुंचा, जबकि शहरी क्षेत्रों में 90.3 प्रतिशत से बढ़कर 98.3 प्रतिशत तक पहुंच गया। राजस्थान ने भी इस मामले में प्रगति की है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में अस्पतालों में प्रसव कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत लगातार बढ़ा है।यह आंकड़ा 88.7 से 99.5 फीसदी पर पहुंच गया।
मेडिकल सुविधा में बहुत पिछड़े
देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बढ़ने के बावजूद मौत से पहले मेडिकल अटेंशन मिलने के मामले में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ अभी भी कई राज्यों से पीछे हैं। वर्ष 2019 से 2024 के बीच इन राज्यों में सुधार जरूर दर्ज किया गया, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।
मध्यप्रदेश में वर्ष 2019 में कुल 57 प्रतिशत लोगों को मृत्यु से पहले मेडिकल अटेंशन मिला था, जो 2024 में घटकर 49.3 प्रतिशत दर्ज हुआ। ग्रामीण मध्यप्रदेश में 2024 में यह आंकड़ा 48.5 प्रतिशत रहा। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2019 में 40.9 प्रतिशत लोगों को मृत्यु से पहले मेडिकल अटेंशन मिला था
जो 2024 में घटकर 32.9 प्रतिशत दर्ज किया गया। राजस्थान में वर्ष 2019 में कुल 49.6 प्रतिशत लोगों को मौत से पहले मेडिकल सहायता मिली थी, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 39.3 प्रतिशत दर्ज किया गया। ग्रामीण राजस्थान में यह प्रतिशत 47.8 से घटकर 36.2 तक पहुंच गया।
निष्कर्ष
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी, आपातकालीन सेवाओं का अभाव और अस्पतालों तक पहुंच में कठिनाई बड़ी चुनौती है। उन्होंने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने, एम्बुलेंस नेटवर्क बढ़ाने और गंभीर मरीजों के लिए रेफरल सिस्टम सुधारने की जरूरत बताई है। जब तक इन पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक हालात सुधरने वाले नहीं हैं।
FAQ
Q. पिछले पांच साल में बेटियों की संख्या में क्या बदलाव हुआ? A. मध्यप्रदेश में बेटियों की संख्या जस की तस रही, राजस्थान में लगभग आधा प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में लगभग 2 प्रतिशत बढ़ी। यह राष्ट्रीय औसत से अभी भी कम है। Q. क्या बेटी बचाओ योजना इन राज्यों में असर दिखा रही है? A. रिपोर्ट बताती है कि एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में यह योजना केवल नारा बनकर रह गई है। बेटियों की संख्या में सुधार न के बराबर है। Q. स्वास्थ्य और प्रसव की स्थिति कैसी है? A. संस्थागत प्रसव बढ़े हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में मौत से पहले मेडिकल सहायता की पहुंच अभी भी कमजोर है। एमपी में 48.5%, छत्तीसगढ़ में 32.9% और राजस्थान में 36.2% लोग ही समय पर मेडिकल सहायता पा रहे हैं।
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