News in Short
- एमपी में बाघों की संख्या 308 से बढ़कर 785 है, जबकि रिजर्व क्षेत्रों में 1000 बाघों का अनुमान।
- देश में 65% हुई बाघों में वृद्धि जबकि मध्य प्रदेश में बाघों में इजाफे का आंकड़ा 155% से ऊपर।
- 2020-25 में टेरेटरी फाइट और दूसरे हमलों की संख्या में 87% तक हुई बढ़ोत्तरी, 415 मारे गए।
- बाघ को सालभर में 350 से जयादा शिकार, बाघों का बढ़ता कुनबा पशुधन को बना रहा भोजन।
- रिकॉर्ड वृद्धि से खड़े हुए संकट पर सरकार ने WII से मांगी जंगलों की क्षमता की जानकारी।
News in Detail
टाइगर स्टेट का तमगा हासिल करने के बाद मध्यप्रदेश एक नई चुनौती से जूझ रहा है। क्या यहां बाघ बहुत ज्यादा हो गए हैं? पिछले एक दशक में राष्ट्रीय औसत से तेज रिकवरी के चलते एमपी में बाघों की संख्या 1000 के आंकड़े की ओर बढ़ रही है।
2014 में 308 से 2022 में बाघों की संख्या 785 तक पहुंच गई है। यह वृद्धि 155% से ज्यादा है। अब टाइगर रिजर्व और वन क्षेत्रों में बाघों के बीच टेरेटरी फाइट और मानव संघर्ष के हालत बन रहे हैं। लोगों पर हमले और पशु धन के नुकसान को देखते हुए सरकार भी चिंता में है।
बाघ बढ़े, तो संघर्ष भी बढ़ा
2004 में सरिस्का से बाघ खत्म होने के बाद हुए सुधारों से देशभर में बाघ बढ़े हैं। 2014 से 2022 के बीच भारत में बाघ 65% बढ़कर 2,226 से 3,682 हुए। इसी अवधि में मध्य प्रदेश में 155% का उछाल आया और संख्या 308 से 785 पहुंची।
अधिकारियों के मुताबिक यह ट्रेंड अब भी जारी है। लेकिन ज्यादा बाघ का मतलब ज्यादा संघर्ष भी है। देश में बाघों के हमलों में 2014-2019 के बीच मौत का आंकड़ा 224 था जो 2020-2025 में बढ़कर 418 हो गईं है।
जंगल में शिकार कम इसलिए पशुधन पर हमले
मध्य प्रदेश में देश में सर्वाधिक 9 टाइगर रिजर्व हैं। बीते कुछ सालों में कुनबे में हुए इजाफे के बाद रिजर्व क्षेत्रों में शिकार का संकट भी गहराया गया है। शिकार के लिए पर्याप्त जानवर नहीं मिल रहे।
ऐसे में बाघ जंगल से सटे गांवों के आसपास पशुधन को शिकार बना रहे हैं। बांधवगढ़ में साल 2025 में बाघों द्वारा पशुधन के शिकार के 47% मामले सामने आए थे। वन्यप्राणी विशेषज्ञ पशुधन के आसान शिकार के चलते बाघों के जंगल से बाहर आने को उनके लिए खतरा मान रहे हैं।
सरकार ने पूछा- जंगल कितने बाघों के लिए पर्याप्त
मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या बढ़ने से खड़े हो रहे संकट को देखते हुए सरकार नई प्लानिंग में जुट गई है। सरकार ने वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) से स्थिति के आंकलन के लिए संपर्क किया है।
साथ ही यह भी पूछा है एमपी के जंगल कितने बाघों को संभाल सकते हैं। चार वर्षीय आकलन रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या 3,682 हो गई है। इसी अवधि में, मध्य प्रदेश ने 155% की छलांग लगाई है। अब मध्य प्रदेश में बाघों की दर्ज संख्या 785 से ज्यादा है। मध्य प्रदेश वन विभाग के अनुसार यह ट्रेंड लगातार बना हुआ है। ज्यादा बाघों का मतलब ज्यादा संघर्ष भी है।
कैरिंग कैपेसिटी से ज्यादा टाइगर
वन्य प्राणी विशेषज्ञों के अनुसार एक वयस्क बाघ के लिए 50 से 100 वर्ग किलोमीटर का जंगल जरूरी है। इसमें विचरण कर वे अपनी टेरेटरी बनाते हैं। मध्य प्रदेश के टाइगर रिजर्व में बफर जोन का कुल क्षेत्रफल 11 हजार वर्ग किलोमीटर के करीब है। जबकि बाघों की संख्या 785 से कहीं ज्यादा है।
इस लिहाज से इतने बाघों के लिए 39 हजार 250 से 78 हजार 500 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र चाहिए। इनमें से एक तिहाई बाघों को अवयस्क मान लें तो भी 26,150 से 52,300 वर्ग किलोमीटर जंगल की जरूरत है। मध्य प्रदेश के टाइगर रिजर्व का क्षेत्रफल बाघों की संख्या के मुकाबले आधे से भी कम है।
रिजर्व क्षेत्रों में कॉरीडोर कनेक्टिविटी जरूरी
वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट डॉ धर्मेंद्र खांडल बताते हैं, “ट्रांसलोकेशन या असिस्टेड डिस्पर्सल जहां प्राकृतिक कॉरिडोर नहीं हैं और वन कनेक्टिविटी टूटी हुई है। राज्य में घने जंगलों की संख्या भी कम है।
छिछले जंगल बाघों के आवास के लिहाज से अच्छे नहीं होते। इनमें आवास की समस्या के साथ ही शिकार की संख्या भी कम होती हे। इसी वजह से बाघ एक क्षेत्र छोड़कर दूसरे जंगल की ओर पलायन करते हैं। WII के निदेशक डॉ गोबिंद सागर भारद्वाज कहते हैं कि हैबिटेट रिस्टोरेशन ही रास्ता है।
पर्याप्त शिकार रोक सकते हैं पलायन
प्रोजेक्ट टाइगर और NTCA के पूर्व प्रमुख डॉ राजेश गोपाल के अनुसार, बाघों की आबादी शिकार वाले जानवरों की उपलब्धता पर निर्भर करती है। अन्य कारक जैसे पानी की उपलब्धता और शिकार न होना भी महत्वपूर्ण हैं। सबसे सरल गणना में शिकार प्रजातियों का कुल सालाना बायोमास, एक बाघ की सालाना भोजन जरूरत से विभाजित किया जाता है। सामान्य अनुमान के अनुसार, एक बाघ के लिए 350 खुर वाले जानवरों का शिकार आवश्यक है।
प्रमुख टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या
| टाइगर रिजर्व | बाघों की संख्या |
|---|---|
| बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व | 170 - 202 |
| कान्हा टाइगर रिजर्व | 155 - 180 |
| संजय टाइगर रिजर्व | 50 - 60 |
| सतपुड़ा टाइगर रिजर्व | 120 - 172 |
| पन्ना टाइगर रिजर्व | 100 - 110 |
| पेंच टाइगर रिजर्व | 70 - 90 |
| वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व | 19 - 25 |
| माधव टाइगर रिजर्व | 8 - 10 |
| डॉ. विष्णु वाकणकर (रातापानी) | 121 - 151 |
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