समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश सरकार ने डीआरपी पॉलिसी में बदलाव किया है।
- अब मेडिकल कॉलेज के डीन की कमेटी पोस्टिंग तय करेगी।
- पीजी डॉक्टरों को तीन महीने के लिए जिला अस्पतालों में भेजा जाएगा।
- कुछ मामलों में पोस्टिंग 276 किलोमीटर दूर तक हो सकती है।
- डॉक्टरों को अब आवास भत्ता नहीं मिलेगा।
एमपी में जिला रेजीडेंसी के नियम बदले
नई पॉलिसी के तहत हर मेडिकल कॉलेज में एक कमेटी बनेगी। इसकी अध्यक्षता कॉलेज के डीन करेंगे। यही कमेटी तय करेगी कि कौन सा पीजी डॉक्टर किस जिला अस्पताल में जाएगा।
बता दें कि अब तक यह व्यवस्था राज्य स्तर से संचालित होती थी। इससे स्थानीय जरूरतों का ध्यान रखना मुश्किल होता था। नई व्यवस्था में मेडिकल कॉलेज सीधे तौर पर फैसला लेंगे।
किन जिलों को मिलेगी प्राथमिकता
पोस्टिंग का आधार भी बदल दिया गया है। अब उन जिला अस्पतालों को प्राथमिकता मिलेगी, जहां से मेडिकल कॉलेजों में सबसे ज्यादा मरीज रेफर होते हैं। यानी जिस अस्पताल का लोड ज्यादा है, वहां डॉक्टर पहले भेजे जाएंगे।
कुछ कॉलेजों से 276KM दूर पोस्टिंग
गांधी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों को भोपाल, विदिशा, रायसेन और सीहोर जैसे जिलों में भेजा जाएगा। वहीं एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की पोस्टिंग इंदौर, धार और झाबुआ में होगी।
पॉलिसी में हर मेडिकल कॉलेज के आसपास के इलाकों की मैपिंग की गई है। कुछ मेडिकल कॉलेजों से यह दूरी 276 किलोमीटर तक जा सकती है। यानी डॉक्टरों को अपने कॉलेज से काफी दूर सेवाएं देनी होंगी।
महिला और दिव्यांग डॉक्टरों को राहत
सरकार ने महिला और दिव्यांग डॉक्टरों के लिए थोड़ी राहत रखी है। कोशिश की जाएगी कि इन्हें मेडिकल कॉलेज के आसपास के जिलों में ही पोस्टिंग मिले। इससे इन्हें दूर जाने की मजबूरी कम होगी।
आवास भत्ता अब पूरी तरह बंद
नई पॉलिसी में एक बड़ा झटका आर्थिक मोर्चे पर भी है। डीआरपी अवधि के दौरान अब डॉक्टरों को आवास भत्ता नहीं मिलेगा।
जिला प्रशासन की भूमिका सीमित रहेगी। वह सिर्फ सुरक्षित आवासों की एक सूची डॉक्टरों को उपलब्ध कराएगा। किराया और बाकी खर्च डॉक्टरों को खुद वहन करना होगा।
मेंटर-रेजिडेंट अनुपात भी तय
पॉलिसी में जिला अस्पतालों के लिए एक और नियम जोड़ा गया है। हर मेंटर के साथ सामान्यत: तीन रेजिडेंट डॉक्टर रहेंगे। यानी मेंटर और रेजिडेंट का अनुपात 1:3 रहेगा। इससे ट्रेनिंग की गुणवत्ता बनाए रखने की कोशिश की गई है।
महिला और आरक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व जरूरी
हर मेडिकल कॉलेज में बनने वाली डीन कमेटी में सिर्फ अधिकारी नहीं होंगे। इसमें एक महिला सदस्य का होना अनिवार्य किया गया है। साथ ही एक आरक्षित वर्ग के प्रतिनिधि को भी शामिल करना होगा।
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