समझें पूरा मामला...
दिल्ली एनसीआर में मरीजों के बीच भ्रम की समस्या को लेकर एक नया सर्वे जारी हुआ है।
हर 10 में से लगभग 8 मरीज डॉक्टर को दिखाने के बाद इंटरनेट सर्च करते हैं।
मरीजों का कहना है कि वे परामर्श के बाद अपनी बीमारी को समझ नहीं पाते हैं।
करीब 73.8% मरीजों ने माना कि डॉक्टर के पास बातचीत के लिए समय बहुत कम था।
सर्वे में अस्पतालों के अंदर सही मार्गदर्शन देने वाले सिस्टम की भारी कमी दिखी है।
देश के हेल्थकेयर सिस्टम में बढ़ रहा है मरीजों का भ्रम
देश दुनिया न्यूज.आज के समय में जब हम बीमार होते हैं तो सीधा डॉक्टर के पास जाते हैं। लेकिन क्या हम डॉक्टर की बातें पूरी तरह समझ पाते हैं? दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों यानी एनसीआर (NCR) से एक चौंकाने वाली खबर आई है।
एक नए हेल्थकेयर सर्वे (healthcare) के अनुसार देश में मरीजों के बीच भ्रम का संकट बढ़ रहा है। लगभग 80 प्रतिशत मरीज डॉक्टर से मिलने के बाद इंटरनेट की शरण ले रहे हैं। वे अपनी बीमारी और दवाओं को समझने के लिए गूगल या सोशल मीडिया खंगालते हैं।
क्या कहता है IPNCI सर्वे?
इस खास स्टडी का नाम 'इंडिया पेशेंट नेविगेशन एंड कन्फ्यूजन इंडेक्स' (IPNCI) रखा गया है। यह सर्वे साल 2026 में दिल्ली-एनसीआर के करीब 1 हजार लोगों के बीच किया गया है।
इसमें दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद और फरीदाबाद के नागरिकों को शामिल किया गया था। इस सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि अस्पताल से निकलने के बाद मरीज खुद को बहुत अकेला महसूस करते हैं। उन्हें आगे के इलाज का रास्ता समझ नहीं आता है।
मरीजों को क्यों महसूस होती है जल्दबाजी?
सर्वे में शामिल लगभग 73.8% मरीजों ने एक बहुत ही जरूरी बात कही है। उनका कहना है कि डॉक्टर से परामर्श के दौरान उन्हें बहुत जल्दबाजी महसूस होती है।
डॉक्टरों के पास मरीजों की बढ़ती संख्या के कारण बातचीत का समय बहुत कम होता है। इस कम समय में मरीज अपनी बीमारी और इलाज का तरीका ठीक से समझ नहीं पाते हैं। इसी वजह से लगभग 78.5% मरीज बाद में स्पष्टता के लिए इंटरनेट पर सर्च करते हैं।
हेल्प डेस्क की भारी कमी
मरीजों के भ्रमित होने की एक बड़ी वजह अस्पतालों का खराब मैनेजमेंट भी है। लगभग 70% लोगों ने कहा कि उन्हें अगले कदम के बारे में सही गाइडेंस नहीं मिली।
उन्हें नहीं पता होता कि दवाइयां कहाँ मिलेंगी या टेस्ट कहाँ पर कराने हैं। सर्वे के अनुसार 72% से ज्यादा अस्पतालों में कोई हेल्प डेस्क या हेल्पलाइन नंबर नहीं है। मरीजों को एक विभाग से दूसरे विभाग में जाने के लिए खुद ही भटकना पड़ता है।
बड़े अस्पतालों में बढ़ती भीड़
इस भ्रम और सही गाइडेंस न होने का असर मरीजों की जेब पर भी पड़ रहा है। लोग छोटे और प्राथमिक अस्पतालों में जाने के बजाय सीधे बड़े प्राइवेट अस्पतालों में पहुँच रहे हैं।
इससे बड़े अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है और इलाज का खर्च भी बहुत ज्यादा हो रहा है। इसके विपरीत सरकारी अस्पतालों में इलाज बहुत सस्ता या मुफ्त है। इसके बावजूद केवल 21.4% लोग ही सरकारी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं।
वरिष्ठ नागरिकों को सबसे ज्यादा परेशानी
इस सर्वे में उम्र के हिसाब से भी कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार 56 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है।बुजुर्ग मरीजों को अस्पतालों के भीतर अकेले नेविगेट करने या रास्ता ढूंढने में भारी दिक्कत आती है। तकनीक और डिजिटल पर्चों को समझने में भी वे अक्सर खुद को असहज पाते हैं। उनके लिए अस्पतालों में अलग से समन्वयक यानी गाइड होने चाहिए।
बेहतर रेफरल सिस्टम की है सख्त जरूरत
इस संकट को दूर करने के लिए मेडिकल एक्सपर्ट्स ने कुछ बड़े सुझाव दिए हैं। उनका कहना है कि डॉक्टरों और मरीजों के बीच संवाद को बेहतर बनाना होगा।
अस्पतालों में डिजिटल टूल्स और हेल्प डेस्क को अनिवार्य किया जाना चाहिए। एक सही रेफरल सिस्टम होने से मरीजों का भ्रम भी दूर होगा और उनका पैसा भी बचेगा। अस्पतालों को केवल इलाज ही नहीं बल्कि मरीजों के मार्गदर्शन पर भी ध्यान देना होगा।
FAQ
Q. हेल्थकेयर सर्वे 2026 के अनुसार कितने मरीज जांच के बाद इंटरनेट पर सर्च करते हैं? A. A1: दिल्ली-एनसीआर में किए गए सर्वे के अनुसार, लगभग 80% मरीज डॉक्टर से मिलने के बाद अपनी बीमारी और इलाज को समझने के लिए गूगल या सोशल मीडिया की मदद लेते हैं। यह संकेत करता है कि मरीजों के बीच हेल्थकेयर जानकारी को लेकर भ्रम बढ़ रहा है। Q. मरीज डॉक्टर से मिलने के बाद अपनी बीमारी क्यों नहीं समझ पाते? A. सर्वे में लगभग 73.8% मरीजों ने बताया कि डॉक्टर से बातचीत के लिए समय बहुत कम होता है। बढ़ती मरीज संख्या और सीमित समय के कारण उन्हें अपनी बीमारी और उपचार विकल्प पूरी तरह समझने का अवसर नहीं मिलता। Q. अस्पतालों में मार्गदर्शन की कमी कैसी देखी गई? A. सर्वे में यह सामने आया कि लगभग 70% मरीजों को अगले कदम के बारे में सही गाइडेंस नहीं मिला। 72% से अधिक अस्पतालों में हेल्प डेस्क या हेल्पलाइन नंबर नहीं हैं, जिससे मरीजों को विभागों में खुद ही भटकना पड़ता है।
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