समझें मानसून का गणित...
- MP में LPA का 94% से कम वर्षा का अनुमान।
- अल नीनो सक्रिय होने की 92 प्रतिशत संभावना।
- जून 2026 में MP में लू के दिन बढ़ेंगे।
- सोयाबीन, धान, मक्का की फसलें खतरे में।
- बरगी, तवा, इंदिरा सागर में जलसंकट की आशंका।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मानसून 2026 का पूर्वानुमान जारी किया है। इस वर्ष देशभर में दीर्घकालिक औसत का केवल 90 प्रतिशत वर्षा होने की संभावना है।
मध्यप्रदेश के लिए यह खबर विशेष रूप से चिंताजनक है। अल नीनो का बढ़ता खतरा, कम बारिश और भीषण लू मिलकर प्रदेश के किसानों और जनजीवन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर सकते हैं।
मानसून 2026 क्या कह रहा है?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 29 मई 2026 को दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) का संशोधित पूर्वानुमान जारी किया है। इस पूर्वानुमान के अनुसार देशभर में दीर्घकालिक औसत का केवल 90 प्रतिशत वर्षा होगी।
यह आंकड़ा पहले के 92 प्रतिशत अनुमान से कम है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार 84 प्रतिशत संभावना है। इस वर्ष मानसून सामान्य से कम या अल्पवर्षा वाला रहेगा।मध्यप्रदेश के लिए यह खबर बेहद चिंताजनक है। राज्य की अधिकांश खेती वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में कमज़ोर मानसून कृषि संकट को और गहरा कर सकता है।
मानसून का LPA क्या होता है?
मानसून वर्षा को मापने के लिए IMD एक मानक आंकड़े का उपयोग करता है। इसे दीर्घकालिक औसत यानी LPA (Long Period Average) कहते हैं। यह औसत 1971 से 2020 के बीच दर्ज वर्षा के आधार पर तय होता है। इस अवधि में देशभर में औसत वर्षा लगभग 868.6 मिलीमीटर रही है।
जब वर्षा इस औसत के 96 से 104 प्रतिशत के बीच रहे तो सामान्य मानसून माना जाता है। जब वर्षा 90 से 95 प्रतिशत के बीच रहे तो सामान्य से कम मानसून कहलाता है। यदि वर्षा 90 प्रतिशत से भी नीचे जाए तो उसे अल्पवर्षा (Deficit Rainfall) मानसून कहते हैं। इस वर्ष अल्पवर्षा की आशंका 60 प्रतिशत है जो बेहद गंभीर संकेत है।
MP में मानसून कब और कैसे आता है?
दक्षिण-पश्चिम मानसून हर वर्ष 1 जून के आसपास केरल से भारत में प्रवेश करता है। वहाँ से यह धीरे-धीरे उत्तर और पश्चिम की ओर बढ़ता है। 10 जून से 15 जून के बीच मानसून महाराष्ट्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और ओडिशा पहुँचता है।
20 जून से 25 जून के बीच मध्यप्रदेश में मानसून (Monsoon in Madhya Pradesh) सक्रिय होना शुरू होता है। इस दौरान बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी यह फैल जाता है।
जून के अंत या जुलाई की शुरुआत तक दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में मानसून पहुँचता है। मध्यप्रदेश में मानसून की सर्वाधिक सक्रियता जुलाई और अगस्त में रहती है। इन्हीं दो महीनों में प्रदेश की अधिकांश वार्षिक वर्षा होती है।
MP के लिए IMD का अनुमान
IMD ने स्पष्ट किया है कि मध्य भारत में इस वर्ष LPA के 94 प्रतिशत से कम वर्षा होगी। मध्यप्रदेश इसी मध्य भारत क्षेत्र में आता है। इसका सीधा अर्थ है कि प्रदेश में सामान्य से कम बारिश (Below Normal Rainfall MP) होगी।
खरीफ सीजन में बोई जाने वाली सोयाबीन, धान, मक्का और दलहन जैसी फसलों के लिए पर्याप्त वर्षा आवश्यक है। कम बारिश से इन फसलों के उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा। मध्यप्रदेश का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर है। ऐसे में यह अनुमान राज्य के किसानों के लिए गंभीर चेतावनी है।
जून 2026 में मध्यप्रदेश का ऐसा रहेगा हाल
IMD के अनुसार जून 2026 में वर्षा LPA के 92 प्रतिशत से कम रहने का अनुमान है। यह मध्यप्रदेश के लिए दोहरी चुनौती लेकर आता है। पहली चुनौती कम बारिश की है और दूसरी भीषण गर्मी की।
IMD ने मध्यप्रदेश को उन राज्यों में शामिल किया है। यहां जून 2026 में सामान्य से अधिक लू (Heatwave) वाले दिन दर्ज होने की संभावना है। देश के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहेगा। मध्यप्रदेश के मैदानी इलाकों में लू का खतरा अधिक रहेगा। यह स्थिति कृषि और जनजीवन दोनों के लिए कठिन साबित हो सकती है।
लू का खतरा और जनजीवन पर असर
IMD ने जून 2026 में लू को लेकर विशेष चेतावनी जारी की है। कम वर्षा और ऊँचे तापमान का संयोजन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। बुजुर्गों, बच्चों और खुले में काम करने वाले मजदूरों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ेगा। पहले से बीमार लोगों के लिए भी यह स्थिति जोखिमभरी है।
पानी की उपलब्धता, बिजली की खपत और आवश्यक सेवाओं पर दबाव बढ़ेगा। IMD ने राज्य सरकारों को शीतलन केंद्र (Cooling Shelter) चालू रखने की सलाह दी है। साथ ही सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था और स्वास्थ्य निगरानी मजबूत करने को कहा है। आपातकालीन सेवाएं सक्रिय रखना भी आवश्यक बताया गया है।
अल नीनो क्या है, क्यों है खतरा?
अल नीनो (El Nino) एक समुद्री-वायुमंडलीय घटना है। इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। यह ENSO यानी El Niño-Southern Oscillation का गर्म चरण है।
ऐतिहासिक रूप से अल नीनो सक्रिय होने पर भारत में मानसून कमज़ोर पड़ा है। 2026 में अल नीनो का असर होने की संभावना 92 प्रतिशत है। यह बेहद ऊंचा और चिंताजनक आंकड़ा है। अल नीनो से वर्षा कम होती है और उसका वितरण भी असमान हो जाता है। मध्यप्रदेश जैसे कृषि-प्रधान राज्य में यह सूखे की संभावना को कई गुना बढ़ा देता है।
IOD क्या है, इससे मिलेगी राहत?
इंडियन ओशन डायपोल यानी IOD (Indian Ocean Dipole) हिंद महासागर की एक जलवायु प्रणाली है। जब हिंद महासागर का पश्चिमी भाग पूर्वी भाग से अधिक गर्म होता है तो इसे सकारात्मक IOD कहते हैं।
सकारात्मक IOD से भारत में मानसूनी वर्षा बढ़ती है। यह अल नीनो के नकारात्मक प्रभावों को कुछ हद तक संतुलित भी कर सकता है। हालांकि, IMD ने इस वर्ष सकारात्मक IOD विकसित होने की संभावना अपेक्षाकृत कम बताई है।
इसका अर्थ है कि अल नीनो के असर को संतुलित करने वाला कोई मजबूत कारक सक्रिय नहीं दिखता। ऐसे में मध्यप्रदेश सहित पूरे मध्य भारत में वर्षा की कमी और बढ़ सकती है।
कृषि संकट की आशंका कितनी?
मध्यप्रदेश देश के प्रमुख कृषि राज्यों में शामिल है। यहाँ की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खेती पर टिका है। सोयाबीन, धान, मक्का, अरहर और उड़द जैसी खरीफ फसलों के लिए जुलाई-अगस्त की बारिश अनिवार्य है। I
MD के अनुसार मध्य भारत के वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में इस वर्ष औसत से कम वर्षा होगी। इससे बुआई में देरी और पैदावार में कमी की आशंका है। किसानों की आय पर सीधा नकारात्मक असर पड़ सकता है। यदि अल नीनो और अधिक मजबूत हुआ तो कुछ जिलों में सूखे जैसे हालात बन सकते हैं। ऐसे में सरकारी राहत और कृषि बीमा की भूमिका और महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
जल संकट की आशंका
कम वर्षा का सीधा असर जलाशयों, नदियों और भूजल स्तर पर पड़ता है। मध्यप्रदेश में बरगी, बाणसागर, तवा और इंदिरा सागर जैसे बड़े बाँध खरीफ वर्षा पर निर्भर हैं। पर्याप्त वर्षा न होने पर इन जलाशयों का जलस्तर कम रहेगा। इससे रबी सीजन की सिंचाई और पेयजल आपूर्ति दोनों प्रभावित होंगी।
बिजली उत्पादन पर भी दबाव बढ़ सकता है। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जल संकट (Water Crisis MP) की आशंका बनी रहेगी। भूजल स्तर में गिरावट से आने वाले रबी सीजन में भी कठिनाई हो सकती है।
प्रशासन की तैयारी जरूरी
IMD ने राज्य सरकारों और जिला प्रशासनों को अभी से तैयारी करने की सलाह दी है। लू से बचाव के लिए शीतलन केंद्र और सामुदायिक शेल्टर तैयार रखना जरूरी है। पेयजल की उपलब्धता के लिए आपातकालीन योजना बनाई जानी चाहिए।
किसानों को कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली फसलों और तकनीकों की जानकारी देना आवश्यक है। सूखा प्रभावित जिलों की पहचान पहले से कर राहत कार्यों की तैयारी होनी चाहिए। स्वास्थ्य विभाग को लू संबंधित बीमारियों के उपचार के लिए सतर्क रहना होगा। प्रशासन की सक्रियता और समय पर लिए गए निर्णय इस संकट को कम कर सकते हैं।
MP के लिए 2026 का मानसून
इस वर्ष का मानसून मध्यप्रदेश के लिए कई चुनौतियाँ लेकर आ रहा है। IMD के अनुसार मध्य भारत में सामान्य से कम वर्षा होगी। अल नीनो के 92 प्रतिशत सक्रिय होने की संभावना इस चिंता को और गहरा करती है।
जून में लू, जुलाई-अगस्त में कम वर्षा और खरीफ फसलों पर संकट एक साथ प्रदेश के सामने खड़े हैं। समय रहते सावधानी और सुनियोजित प्रबंधन से इस संकट को कम किया जा सकता है। किसान, आम नागरिक और प्रशासन तीनों को मिलकर इस मौसम का सामना करना होगा।
FAQ
Q. मध्यप्रदेश में मानसून 2026 कब आएगा और कैसा रहेगा? A. दक्षिण-पश्चिम मानसून हर वर्ष की तरह 2026 में भी 1 जून के आसपास केरल से भारत में प्रवेश करेगा। मध्यप्रदेश में मानसून 20 से 25 जून के बीच सक्रिय होना शुरू होगा। IMD के अनुसार इस वर्ष मध्यप्रदेश में मानसून 2026 (Monsoon 2026 MP) सामान्य से कम रहेगा। मध्य भारत में LPA के 94 प्रतिशत से कम वर्षा होने का अनुमान है। अल नीनो के सक्रिय होने की 92 प्रतिशत संभावना इस अनुमान को और गंभीर बनाती है। Q. अल नीनो का मध्यप्रदेश की खेती पर क्या असर पड़ेगा? A. अल नीनो (El Nino) एक समुद्री घटना है जो भारत में मानसून को कमज़ोर करती है। 2026 में इसके सक्रिय होने की संभावना 92 प्रतिशत है। मध्यप्रदेश में सोयाबीन, धान, मक्का और दलहन जैसी खरीफ फसलें इससे सबसे अधिक प्रभावित होंगी। कम वर्षा से बुआई में देरी होगी और पैदावार घटेगी। किसानों की आय पर सीधा नकारात्मक असर पड़ेगा। IMD ने राज्य सरकार को पहले से सूखा राहत योजना तैयार रखने की सलाह दी है।
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