Shri Krishna Dwarka: कभी आपने सोचा है कि भगवान श्रीकृष्ण की भव्य द्वारका नगरी समुद्र में कैसे समा गई? प्राचीन भारत की यह सबसे सुंदर और सुरक्षित नगरी मानी जाती थी। यहां भव्य सोने के महल, चौड़ी सड़कें और बड़े बाजार हुआ करते थे।
समुद्र के रास्ते यहां दूर-दूर के देशों से व्यापारी व्यापार करने आते थे। लेकिन महाभारत युद्ध के बाद समय ने ऐसी करवट ली कि यह पूरी नगरी पानी में डूब गई।
प्राचीन पुराणों में लिखा है कि मथुरा छोड़ने के बाद कान्हा ने इसे बसाया था। उन्होंने यदुवंशियों की सुरक्षा के लिए विश्वकर्मा जी से इसका निर्माण कराया था। यह केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि सत्ता और संस्कृति का बड़ा केंद्र थी। लेकिन एक श्राप और काल के चक्र ने इस वैभवशाली शहर का अंत कर दिया। आइए जानें द्वारका के डूबने की पौराणिक और वैज्ञानिक कहानी।
श्रीकृष्ण ने क्यों बसाई थी द्वारका
पौराणिक कथाएं बताती है कि मथुरा में कंस के वध के बाद उसका ससुर जरासंध बहुत क्रोधित हो गया था। उसने मथुरा पर एक के बाद एक लगातार 17 बार बड़े आक्रमण किए। मथुरा की प्रजा को बार-बार होने वाले युद्धों और विनाश से बचाना जरूरी था।
इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़कर किसी सुरक्षित स्थान पर जाने का फैसला किया। वे यदुवंशियों को लेकर गुजरात के समुद्री तट पर पहुंचे।
वहां उन्होंने समुद्र देव से भूमि मांगकर एक अत्यंत सुरक्षित और अलौकिक नगरी का निर्माण किया। चारों तरफ से समुद्र से घिरी होने के कारण इस नगरी का नाम द्वारका रखा गया। इस नगर में प्रवेश करने के लिए केवल मुख्य द्वार ही हुआ करते थे।
गांधारी का यदुवंश विनाश का श्राप
पौराणिक कथा के मुताबिक, महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद कुरुक्षेत्र की भूमि पर केवल मातम था। महारानी गांधारी अपने 100 पुत्रों की मृत्यु के शोक में पूरी तरह डूबी हुई थीं।
उन्होंने इस भीषण विनाश का जिम्मेदार भगवान श्रीकृष्ण को ही माना। गांधारी ने श्रीकृष्ण को अत्यंत क्रोध में आकर एक भयंकर श्राप दे दिया। गांधारी ने कहा कि जिस तरह कौरव वंश का विनाश हुआ, ठीक वैसे ही यदुवंश नष्ट होगा।
तुम्हारे सामने ही तुम्हारा पूरा परिवार आपस में लड़कर खत्म हो जाएगा। श्रीकृष्ण ने गांधारी के इस श्राप को मुस्कुराते हुए स्वीकार कर लिया था। इसके बाद यदुवंशियों में आपसी मतभेद और अहंकार धीरे-धीरे बहुत बढ़ने लगा।
ऋषियों का श्राप और मुसली की घटना
समय बीतने के साथ यदुवंशी युवकों का व्यवहार बहुत अभिमानी हो गया था। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व और नारद मुनि द्वारका भ्रमण पर आए। यदुवंशी युवकों ने ऋषियों का अपमान करने के लिए एक दुष्ट योजना बनाई। वे जांबवती के पुत्र सांब को स्त्री के वस्त्र पहनाकर ऋषियों के पास ले गए।
युवकों ने पूछा कि इस स्त्री के गर्भ से क्या पैदा होगा? ऋषियों ने अपने तपोबल से उनका यह मजाक तुरंत पकड़ लिया। क्रोधित होकर ऋषियों ने श्राप दिया कि इसके पेट से एक लोहे का मूसल पैदा होगा। वही मूसल तुम सभी यदुवंशियों के कुल के विनाश का कारण बनेगा।
आपस में लड़कर खत्म हुआ यदुवंश
ऋषियों के श्राप के मुताबिक, सांब के पेट से सचमुच लोहे का मूसल निकला। राजा उग्रसेन ने उस मूसल को चुराकर समुद्र के किनारे घिसवा दिया। मूसल का बारीक चूरा समुद्र की लहरों के साथ बहकर किनारे आ गया। वहां उस चूरे से बहुत ही नुकीली और जहरीली एरका घास उग आई।
कुछ समय बाद किसी बात पर यदुवंशी आपस में ही बुरी तरह झगड़ने लगे। उन्होंने समुद्र तट पर उगी उसी एरका घास को उखाड़कर हथियार बना लिया। उस घास के वार से यदुवंशी एक-दूसरे को मारते चले गए। इस प्रकार गांधारी और ऋषियों का श्राप पूरी तरह सच साबित हुआ।
श्रीकृष्ण के द्वारका का अंत
यदुवंश के विनाश के बाद भगवान श्रीकृष्ण जंगल में ध्यान मुद्रा में बैठ गए। वहां जरा नाम के एक बहेलिए ने हिरण समझकर उनके पैर में तीर मार दिया। तीर लगते ही श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समाप्त की और अपने लोक लौट गए। श्रीकृष्ण के धरती से जाते ही द्वारका पर संकट के बादल छा गए।
अर्जुन द्वारका पहुंचे और बची हुई महिलाओं और बच्चों को लेकर वहां से निकले। अर्जुन के नगर छोड़ते ही समुद्र का जलस्तर बहुत तेजी से बढ़ने लगा। देखते ही देखते समुद्र की विशाल लहरों ने पूरी द्वारका नगरी को डुबो दिया। केवल भगवान कृष्ण का महल ही कुछ समय तक बचा रहा।
समुद्र की गहराइयों में शुरू हुई खोज
सदियों तक द्वारका केवल कथाओं और धार्मिक ग्रंथों तक ही सीमित रही। लेकिन 20वीं सदी में आर्कियोलॉजिस्ट ने समुद्र के नीचे खोज शुरू की। गुजरात के बेट द्वारका तट पर आधुनिक तकनीकों से वैज्ञानिक शोध किया गया। गोताखोरों को समुद्र के भीतर प्राचीन दीवारों और पत्थरों के अवशेष मिले।
वहां मिट्टी के प्राचीन बर्तन, तांबे के सिक्के और जहाजों के लंगर भी पाए गए। इन चीजों से साबित हुआ कि वहां कभी बड़ी मानव सभ्यता बसती थी। समुद्री पुरातत्व की इस खोज ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। लोग सोचने लगे कि क्या यही कान्हा की असली द्वारका है।
आस्था और विज्ञान के बीच फंसा रहस्य
समुद्र के नीचे मिले अवशेषों को लेकर वैज्ञानिकों में अलग-अलग राय है। कुछ इतिहासकार इन्हें हजारों साल पुराना और महाभारत कालीन मानते हैं। वहीं कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ये अवशेष अलग-अलग कालखंड के हैं। इसलिए ठोस सबूत के बिना इसे वही द्वारका कहना थोड़ा मुश्किल है।
एक तरफ वह द्वारका है जो करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था में बसती है। दूसरी तरफ वह द्वारका है जिसे विज्ञान आज भी समुद्र में ढूंढ रहा है। द्वारका का यह रहस्य आस्था, इतिहास और आधुनिक विज्ञान को आपस में जोड़ता है।
अरब सागर की लहरें आज भी इस पावन नगरी की कहानी सुनाती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के शोध बताते हैं कि हिमयुग के बाद समुद्र का जलस्तर बढ़ने से यह ऐतिहासिक शहर पानी में समा गया था।
भविष्य में सामने आ सकता है नया सच
आने वाले समय में नई और मॉडर्न सैटेलाइट तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। समुद्र के भीतर छिपे और गहरे रहस्यों की जांच तेजी से जारी है। हो सकता है कि भविष्य में कोई ऐसा बड़ा पुरातात्विक प्रमाण मिल जाए।
इससे यह पूरी तरह साबित हो जाए कि द्वारका सच में वहीं मौजूद थी। तब तक द्वारका की यह पावन कथा हमारे दिलों में हमेशा अमर रहेगी। यह नगरी हमें सिखाती है कि अहंकार हमेशा विनाश का कारण बनता है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
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