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क्या राहुल गांधी सच में मोदी के एकमात्र विकल्प बन गए हैं?

क्या राहुल गांधी सच में मोदी के एकमात्र विकल्प बन गए हैं?

बंगाल की हार ने कांग्रेस को दिए उम्मीदों के पंख

भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलते, जिसमें एक चुनाव परिणाम ने सियासत को अप्रत्याशित रूप से घुमा दिया हो।

बंगाल 2026 विधानसभा चुनाव परिणाम ने कांग्रेस की राजनीति को अप्रत्याशित रूप से घुमा दिया है और उम्मीदों के पंख लगा दिए हैं।

कांग्रेस के केरल में अपनी और तमिलनाडु में TVK की सरकार बनवाने में महती भूमिका निभाने के बाद राहुल को मोदी के सामने विपक्ष के सबसे बड़े नेता के रूप में मान्यता मिलने की राह आसान हो गई है।

ममता की आपदा में कांग्रेस का अवसर

TMC में टूट के बाद ममता पर आई इस आपदा में कांग्रेस अपने लिए अवसर देख रही है। ममता की हार कांग्रेस को कई मोर्चों पर राहत लेकर आई है। बंगाल चुनाव के पहले ममता बनर्जी खुद को मोदी के मुकाबले खड़ा कर रही थीं। साथ ही, बंगाल चुनाव परिणाम के बाद दिल्ली की गद्दी से मोदी को हटाने का दंभ भर रही थीं।

चुनाव परिणाम ने ममता की उम्मीदों को ध्वस्त किया और कांग्रेस की उम्मीदों को पंख लगा दिए। बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में मोदी के मुकाबले के लिए विपक्ष के पास राहुल के अलावा कोई विकल्प नहीं है। राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती देने वाले सभी नेता एक-एक कर मोदी के सामने चुनाव हार रहे हैं और राहुल गांधी की राह अनचाहे ही प्रशस्त कर रहे हैं।

विपक्ष का कमजोर होता मोर्चा

केजरीवाल दिल्ली हार गए, राहुल के मुकाबले कमजोर हो गए और पंजाब बचाने के लिए कांग्रेस से अलग हो गए। DMK सत्ता से बाहर होने के साथ INDIA गठबंधन से बाहर हो गई। ममता ने पार्टी की टूट के बाद घुटने टेक दिए हैं।

बिहार में तेजस्वी हार चुके हैं और पार्टी के भीतर अपनी पकड़ बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे अपने सांसदों के बगावती होने के समाचार से परेशान हैं और एक भारी टूट के बाद दूसरी टूट से पार्टी बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

शरद पवार और अखिलेश की भी मुश्किलें

शरद पवार का स्वास्थ्य बेहद खराब है और उतना ही खराब राजनीतिक स्वास्थ्य उनकी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) का भी है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को कुछ महीनों बाद अपने जीवन की सबसे मुश्किल राजनीतिक लड़ाई का सामना करना है।

अखिलेश, बिहार में तेजस्वी और बंगाल में ममता का हाल देखकर सशंकित हो रहे हैं और अपनी आसन्न हार को टालने के लिए कांग्रेस को सबसे अहम सहयोगी के रूप में देख रहे हैं।

अखिलेश की राजनीतिक मजबूरी

अखिलेश की सबसे बड़ी प्राथमिकता राहुल के नेतृत्व को चुनौती देने से ज्यादा आठ महीने बाद UP में सरकार बनाना है। अखिलेश यादव जानते हैं कि इस बार सरकार नहीं बनी तो उनकी पार्टी का भी वही हाल होगा जो ममता का बंगाल में हुआ है। इसलिए राहुल को साधना और स्वीकार करना अखिलेश यादव की राजनीतिक मजबूरी भी है।

कांग्रेस की ताकत: छह राज्यों में सरकार

कांग्रेस के चार राज्यों - कर्नाटक, हिमाचल, केरल और तेलंगाना में अपने मुख्यमंत्री हैं और दो राज्यों झारखंड और तमिलनाडु में कांग्रेस सरकार में शामिल है। एक केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस बाहर से उमर सरकार को समर्थन दे रही है। सहयोगी दलों के कमजोर होने ने कांग्रेस और राहुल गांधी को मजबूती प्रदान की है।

राहुल को मोदी के सामने खड़ा करने की रणनीति

कांग्रेस अपने सहयोगी दलों की इसी मजबूरी का फायदा उठाकर राहुल को प्रधानमंत्री मोदी के सामने खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस अपने सहयोगी दलों को यह समझाने में जुटी है कि मोदी को चुनौती देने का हौसला और माद्दा सिर्फ राहुल गांधी में है, विपक्ष के किसी और नेता में नहीं।

राहुल का कायाकल्प: पार्ट-टाइम से फुल-टाइम नेता

कांग्रेस राहुल गांधी को एक परिपक्व नेता के रूप में पेश कर रही है - ऐसा नेता जो मोदी को हर तरह से चुनौती देने में सक्षम हो। कांग्रेस का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम और उसके बाद तेजस्वी और ममता की हार ने राहुल गांधी के राजनीतिक सफर को नया मकसद दे दिया है।

जनता ने दिया दोहरा संदेश

मोदी को 240 पर रोकने में सफल हुए राहुल गांधी ने मोदी के विकल्प के रूप में खुद को पेश कर दिया। चुनाव परिणाम जनता के मन में झांकने का दिलचस्प झरोखा होते हैं। जनता ने मोदी को गठबंधन की सरकार का प्रधानमंत्री बना दिया और राहुल को 10 साल बाद विपक्ष का नेता भी बना दिया।

बरसों की नाकामी से निकला बदलाव

राहुल को जानने वाले नेता बताते हैं कि राहुल ने खुद को बदला है और यह बदलाव रातों-रात नहीं आया। दरअसल यह जरूरतों की पैदाइश है, जो बरसों की नाकामियों और उनके साथ आए उपहास और तौहीन से सीखे गए कठोर सबकों से निकला है।

राहुल के आलोचकों ने लंबे वक्त से अनिच्छुक नेता के तौर पर उनकी तस्वीर गढ़ी - परिवार की विरासत को कंधों पर उठाए एक ऐसा नेता जिसमें उसे आगे ले जाने का विश्वास नहीं है। वहीं, लोकसभा चुनाव के बाद और हाल के महीनों में राहुल गांधी उस नैरेटिव को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं - अपने लिए भी और कांग्रेस पार्टी के लिए भी।

कांग्रेस का मानना है कि 18वीं लोकसभा में नेता विपक्ष का चोगा धारण करने के बाद राहुल ने अपनी भूमिका के प्रति असामान्य प्रतिबद्धता दिखाई है। साथ ही, पार्ट-टाइम पॉलिटिशियन से सातों दिन काम करने वाले नेता के रूप में अपनी छवि का कायाकल्प किया है।

राहुल की आगे की राह: चुनौतियां कम नहीं

क्षेत्रीय पार्टियों के तार-तार होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी के सबसे अव्वल चैलेंजर के रूप में राहुल गांधी ने अपनी स्थिति मजबूत की है। अपने सहयोगी दलों की हार में भले ही कांग्रेस अपनी जीत देख रही हो, लेकिन इससे सिर्फ कांग्रेस और राहुल की नैया पार नहीं होगी। अभी राहुल गांधी को कई और परीक्षाएं पास करनी होंगी।

लोकसभा से लेकर राज्यों तक की परीक्षा

राहुल गांधी विपक्ष का सर्वमान्य नेता बनकर भाजपा और मोदी के सामने ताल तो ठोक सकते हैं, लेकिन अपने लिए और कांग्रेस का भरोसा बढ़ाने के लिए उन्हें प्रभावशाली और सुसंगत आख्यान गढ़ना होगा। चुनाव भी जीतने होंगे। लोकसभा में मुद्दों पर मोदी को घेरना होगा।

राहुल गांधी की एक और बड़ी परीक्षा 2027 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर के विधानसभा चुनाव होंगे और 2027 के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव। उत्तराखंड, गोवा में BJP को हराना, मणिपुर और पंजाब में सरकार बनाना, हिमाचल में सरकार बचाना और गुजरात और उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन करना राहुल गांधी के लिए एक चुनौती से कम नहीं होगा। 2028 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की चुनौती भी राहुल गांधी के सामने होगी।

2029 से पहले साबित करना होगा दम

2029 के लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी को तमाम राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बेहतर प्रदर्शन के लिए तैयार करना होगा। साथ ही, अपने सहयोगी दलों को भी साथ जोड़कर रखना होगा। रूठे दलों को मनाना होगा।

आने वाले चुनाव और चुनौतियां राहुल की आगे की राह तय करेंगे। राहुल इसमें कितने सफल होते हैं, यह राहुल का आने वाला समय बताएगा। फिलहाल राहुल गांधी INDIA गठबंधन के सबसे बड़े नेता तो बन ही गए हैं।

नोट- प्रिंट मीडिया में दो दशक से सक्रिय समीर चौगांवकर राजनीतिक पत्रकारिता के एक विश्वसनीय और स्थापित नाम हैं। इंडिया टुडे, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और एशिया टाइम्स सहित देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर उनके लेख प्रकाशित होते हैं। भाजपा, पीएमओ, संसद और आरएसएस की गहरी कवरेज तथा प्रमुख न्यूज चैनलों पर तथ्यपरक राजनीतिक विश्लेषण उनकी पहचान है। इस लेख में प्रकाशित विचार उनके व्यक्तिगत हैं।


FAQ
Q. बंगाल 2026 चुनाव परिणाम का कांग्रेस पर क्या असर पड़ा? A. ममता बनर्जी की करारी हार के बाद INDIA गठबंधन में कांग्रेस की स्थिति मजबूत हुई है। राहुल गांधी अब विपक्ष के सबसे बड़े और सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे हैं। Q. क्या राहुल गांधी मोदी के एकमात्र विकल्प हैं? A. बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में क्षेत्रीय नेताओं - ममता, तेजस्वी, केजरीवाल - के कमजोर होने के बाद विपक्ष के पास मोदी के मुकाबले राहुल गांधी के अलावा कोई प्रभावशाली विकल्प नहीं बचा है। Q. राहुल गांधी में क्या बदलाव आया है? A. 18वीं लोकसभा में नेता विपक्ष बनने के बाद राहुल ने पार्ट-टाइम पॉलिटिशियन की छवि तोड़ी है। अब वे सातों दिन सक्रिय रहने वाले, मुद्दों पर मोदी को घेरने वाले पूर्णकालिक नेता के रूप में दिखाई देते हैं। Q. राहुल गांधी के सामने आगे कौन सी बड़ी चुनौतियां हैं? A. 2027 में UP, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और 2028 में MP, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव राहुल की असली परीक्षा होंगे। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें गठबंधन को मजबूत रखना होगा।

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