समझें क्या है पूरा मामला...
- विश्व मानव तस्करी निरोधक दिवस पर पुलिस मुख्यालय की समीक्षा रिपोर्ट सामने आई है।
- इसमें मध्य प्रदेश में गुमशुदा बच्चों की तलाश को लेकर बड़ी लापरवाही उजागर हुई है।
- सागर में 75 और भोपाल में 29 फीसदी से ज्यादा मामले अब भी अनसुलझे हैं।
- बीते छह महीनों में पेंडिंग मामलों की संख्या 27 फीसदी तक बढ़ गई है।
- गुमशुदगी के मामलों में तस्करी एंगल से जांच को भी नजरअंदाज किया जा रहा है।
सुस्त जांच का खुलासा
राज्य महिला सुरक्षा शाखा की समीक्षा रिपोर्ट में मध्य प्रदेश की पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के अनुसार गुमशुदा बच्चों, खासकर नाबालिग बेटियों की तलाश में जरूरी तेजी नहीं दिखाई जा रही है।
नियम के मुताबिक हर गुमशुदगी के मामले में तस्करी की आशंका को ध्यान में रखकर जांच होनी चाहिए। लेकिन कई जिलों में यह प्रक्रिया ठीक से पालन नहीं हो रही है।
जिलेवार आंकड़े चिंताजनक
रिपोर्ट में सागर जिले का हाल सबसे खराब बताया गया है। यहां 75 फीसदी मामले अब भी अनसुलझे पड़े हैं।
छतरपुर में यह आंकड़ा 65 फीसदी है। भोपाल में भी 29 फीसदी से ज्यादा मामलों की जांच अब तक पूरी नहीं हो पाई है।
रिपोर्ट के मुताबिक कुछ और जिलों का प्रदर्शन भी संतोषजनक नहीं माना गया है। इंदौर और ग्वालियर में भी गुमशुदगी के कई मामले लंबित बताए गए हैं।
छह महीने में बढ़ी पेंडेंसी
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू पेंडेंसी में बढ़ोतरी है। बीते छह महीनों में लंबित मामलों की संख्या 27 फीसदी बढ़ गई है।
इसका मतलब है कि जितने नए मामले दर्ज हो रहे हैं, उतनी रफ्तार से जांच पूरी नहीं हो पा रही है। इससे गुमशुदा बच्चों के परिवारों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
महिला सुरक्षा शाखा की भूमिका
राज्य महिला सुरक्षा शाखा को नाबालिगों की गुमशुदगी के मामलों में खास निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। रिपोर्ट में कई जिलों का प्रदर्शन इस मोर्चे पर कमजोर पाया गया है।
कुछ जिलों से जांच रिपोर्ट भेजने में भी देरी हुई है। इससे पुलिस मुख्यालय स्तर पर निगरानी और मुश्किल हो जाती है।
एएचटीयू की जिम्मेदारी बड़ी
मानव तस्करी रोकने के लिए राज्य में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU – Anti Human Trafficking Unit) काम करती है। हर जिले में महिला थानों के जरिए यह यूनिट सक्रिय रहनी चाहिए।
वहीं रिपोर्ट बताती है कि कई जगह यह यूनिट पर्याप्त संसाधनों और स्टाफ की कमी से जूझ रही है। इस वजह से गुमशुदगी के मामलों की गहराई से जांच नहीं हो पा रही।
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