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लोकसभा सीट परिसीमन 2026: 1947 से अब तक कब और कैसे हुआ बदलाव, जानिए सीटों का इतिहास

लोकसभा सीट परिसीमन 2026: 1947 से अब तक कब और कैसे हुआ बदलाव, जानिए सीटों का इतिहास

News In Short

  • 1952 में पहले चुनाव में 489 सीटें थीं।
  • 1980 में 543 सीटें स्थायी रूप से तय हुईं।
  • 1976 में सीटें 'फ्रीज' की गईं, 2026 तक जारी।
  • परिसीमन से सीटें 850 तक हो सकती हैं।
  • यह छठी बार होगा जब लोकसभा सीटें बदलेंगी।

News In Detail

क्या आप जानते हैं कि भारत की लोकसभा (Lok Sabha) में हमेशा 543 सीटें नहीं थीं? 1952 के पहले आम चुनाव में केवल 489 सीटें थीं। तब से अब तक सीटों की संख्या पांच बार बदल चुकी है। अब परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण बिल (Women's Reservation Bill) की बहस के बीच सवाल उठ रहा है क्या एक बार फिर लोकसभा सीटें बढ़ेंगी?

पहला चुनाव: 489 सीटों का दौर

भारत में पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 के बीच हुआ था। यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग था। उस समय लोकसभा (Lok Sabha) में कुल 489 सीटें थीं। देश की आबादी, राज्यों की संरचना और प्रशासनिक जरूरतें उस वक्त अलग थीं। इसी के अनुसार सीटों की शुरुआती संख्या तय की गई थी।

1957 और 1962: धीरे-धीरे बढ़ता प्रतिनिधित्व

1957 के दूसरे आम चुनाव में सीटें बढ़कर 494 हो गईं। 1962 के चुनाव में भी यही संख्या बरकरार रही। यह वह दौर था जब जनसंख्या वृद्धि और राज्यों के पुनर्गठन (States Reorganisation) का असर संसदीय ढांचे पर दिखने लगा था। प्रतिनिधित्व (Representation) का दायरा धीरे-धीरे विस्तृत हो रहा था।

1967: एक बड़ा उछाल, 520 सीटें

1967 के चौथे आम चुनाव में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 520 हो गई। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत थी कि देश की बढ़ती जनसंख्या और राजनीतिक विविधता को साझा करने के लिए संसद का विस्तार जरूरी हो गया था। इस दौर में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व (Regional Representation) एक अहम मुद्दा बन चुका था।

1971 और 1977: घटत-बढ़त का राजनीतिक दौर

1971 के चुनाव में सीटों की संख्या घटकर 518 हो गई। इसके बाद 1977 में यह संख्या बढ़कर 542 तक पहुंच गई। यह समय देश में राजनीतिक उथल-पुथल (Political Instability) का था। इमरजेंसी के बाद का यह दौर संसदीय लोकतंत्र के लिए एक परीक्षा की घड़ी थी।

1980: 543 सीटों का स्थायी आंकड़ा

1980 में लोकसभा की सीटें 543 हो गईं और तब से यही संख्या बरकरार है। पिछले चार दशकों से भारत की संसदीय राजनीति इसी संख्या पर टिकी है। 543 का यह आंकड़ा आज भी हर चुनाव, हर गठबंधन और हर सरकार के गठन का आधार बनता है।

1976 का 'फ्रीज': एक ऐतिहासिक निर्णय

सीटों की बढ़ती संख्या पर 1976 में रोक लगा दी गई। इंदिरा गाँधी सरकार ने परिवार नियोजन (Family Planning) को बढ़ावा देने और राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए यह निर्णय लिया। इसका मतलब यह था कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद सीटें नहीं बढ़ेंगी। पहले यह फ्रीज 2001 तक था, लेकिन बाद में इसे 2026 तक बढ़ा दिया गया।

परिसीमन हुआ, सीटें नहीं बढ़ीं

1971 की जनगणना (Census) के बाद संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव यानी परिसीमन (Delimitation) तो हुआ, लेकिन कुल सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई गई। इसका उद्देश्य राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखना था। दक्षिण भारत के राज्यों को आशंका थी कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उनका प्रतिनिधित्व (South India Representation) कम हो जाएगा।

2026 और आगे: क्या बदलेगा?

अब जब 2026 के बाद सीटें बढ़ाने की संभावना पर चर्चा हो रही है, तो यह ऐतिहासिक रूप से छठी बार होगा जब लोकसभा सीटों में बदलाव होगा। महिला आरक्षण बिल (Women's Reservation Bill) के लागू होने के लिए परिसीमन जरूरी है।

सरकार का तर्क है कि सीटें 543 से बढ़कर लगभग 850 हो जाएंगी। यह सिर्फ संख्या का मामला नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र की गुणवत्ता (Quality of Democracy), राज्यों के बीच शक्ति संतुलन और देश के संसदीय भविष्य से जुड़ा है।

FAQ
Q. लोकसभा सीटों (Lok Sabha Seats) की संख्या कितनी बार बदली है? A. आजादी के बाद से अब तक लोकसभा सीटों की संख्या पांच बार बदली है। पहले आम चुनाव (1952) में 489 सीटें थीं। इसके बाद 1957 में 494, 1967 में 520, 1971 में 518, 1977 में 542 और 1980 में 543 सीटें हो गईं। 1976 में 'फ्रीज' (Freeze) के बाद से अब तक यही संख्या बरकरार है। अब परिसीमन (Delimitation) के बाद यह संख्या छठी बार बदल सकती है। Q. परिसीमन (Delimitation) क्या है और यह महिला आरक्षण बिल (Women's Reservation Bill) से कैसे जुड़ा है? A. परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसमें जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं नए सिरे से तय की जाती हैं। महिला आरक्षण बिल के अनुसार लोकसभा में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, लेकिन यह व्यवस्था तभी लागू होगी जब नया परिसीमन हो जाए। इसीलिए दोनों मुद्दे आपस में जुड़े हैं। सरकार के अनुसार परिसीमन के बाद लोकसभा सीटें 543 से बढ़कर लगभग 850 हो जाएंगी। Q. 1976 का 'फ्रीज' (Freeze) क्यों लागू किया गया और इसका दक्षिण भारत (South India) पर क्या असर पड़ा? A. 1976 में तत्कालीन सरकार ने परिवार नियोजन (Family Planning) को प्रोत्साहन देने और राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए सीटों की संख्या को फ्रीज कर दिया। इसका अर्थ यह था कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण किया, जैसे कि दक्षिण भारत के राज्य — उन्हें इसका फायदा मिला। लेकिन अब अगर जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ तो उत्तर भारत के घनी आबादी वाले राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं, जिससे दक्षिण भारत के राज्यों के प्रतिनिधित्व (South India Representation) में कमी आने की आशंका है। यही इस समय सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद है।

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