इंदौर हाईकोर्ट ने विवाहित महिला को लेकर एक अहम फैसला दिया है। इसके तहत महिला को अपनी मर्जी से 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी' एक्ट, 1971 के तहत गर्भपात कराने की अनुमति दी है।
हाईकोर्ट ने यह दिया आदेश
हाईकोर्ट ने आदेश में साफ कहा कि यदि कोई महिला गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती है तो टर्मिनेशन के लिए पति की सहमति जरूरी नहीं है। बस गर्भावस्था कानून के दायरें में होना चाहिए, यानी गर्भावधि इतनी सीमा तक होना चाहिए कि जिससे टर्मिनेशन के दौरान महिला की जान को खतरा नहीं रहे।
मौलिक अधिकार का दिया हवाला
मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप एन. भट्ट की बेंच में हुई थी। याचिकाकर्ता महिला अपने पति से अलग रह रही है और भविष्य में उसके साथ किसी भी प्रकार का वैवाहिक संबंध नहीं रखना चाहती है। महिला ने मौलिक अधिकार के संविधान की धारा 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात रखी थी। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि महिला के इस अधिकार को ध्यान में रखते हुए उसे गर्भपात की अनुमति दिया जाना पूरी तरह से उचित और न्यायसंगत है।
पहले होना था सहमति से तलाक
जानकारी के अनुसार पति और पत्नी अलग रह रहे हैं। पूर्व में दोनों तलाक के लिए सहमत थे लेकिन बाद में पति ने मना कर दिया। इस मामले में कोर्ट से पति को नोटिस भी हो चुके हैं।
हाईकोर्ट ने तीन बिंदु अहम माने
- एमटीपी एक्ट की समय सीमा: महिला की गर्भावस्था 13 सप्ताह की है। 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी' (MTP) एक्ट के तहत इस अवधि तक गर्भसमापन हो सकता है।
- पति-पत्नी के बीच चल रहा तलाक का मुद्दा वैध और कानूनी आधार है
- मौलिक अधिकार के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता अहम
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