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MP में नेताओं और अफसरों के विवाद का असर जनता पर, जानें क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?

MP में नेताओं और अफसरों के विवाद का असर जनता पर, जानें क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?

News In Short

  • मध्यप्रदेश में नेताओं और अफसरों के बीच विवाद तेज हो गया है।
  • कई मामलों में अफसरों ने जनप्रतिनिधियों की बात नहीं मानी।
  • भाजपा नेता और IAS अधिकारी आमने-सामने आए।
  • विशेषज्ञों ने इसे नया और खतरनाक चलन बताया है।
  • इस लड़ाई में पिसने वाली सबसे ज्यादा आम जनता है।

News In Detail

पहले ये विवाद बंद कमरों तक सीमित रहते थे। अब ये सड़क और मीडिया तक पहुंच रहे हैं।

पिछले कुछ समय में ऐसे कई मामले सामने आए हैं। आईएएस अधिकारी संजीव श्रीवास्तव और भाजपा विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाहा के बीच विवाद हो चुका है। अब ताजा मामला बीजेपी विधायक प्रीतम लोधी और करैरा एसडीओपी आयुष जाखड़ (IPS officer) के बीच का है।

इसके अलावा विधायक नागर सिंह चौहान का आलीराजपुर जनपद पंचायत के CEO (Chief Executive Officer) से भी टकराव चर्चा में है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कोई नई बात नहीं है। वहीं, जिस तेजी से मामले बढ़ रहे हैं, वह जरूर चिंताजनक है।

नेताओं की शिकायत क्या है?

एक प्रतिष्ठित अखबार में छपी खबर के मुताबिक, नेताओं का कहना है कि अफसर उनकी बात नहीं सुनते। जनप्रतिनिधि कोई काम करवाना चाहते हैं, तो अफसर आनाकानी करते हैं। ऐसे में नेताओं को लगता है कि उनकी अनदेखी की जा रही है।

वरिष्ठ राजनीतिक विशेषज्ञ विजय दत्त श्रीधर इस पर कहते हैं कि कई अफसर नेताओं के बंगले पर चक्कर लगाते हैं। जब तक सब कुछ ठीक रहता है, सामने कोई बात नहीं आती। बात बिगड़ने आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। अफसरों को नेताओं के बंगलों पर जाना छोड़ना होगा।

दोनों के बीच पिसती है जनता

प्रशासनिक विशेषज्ञ महेश श्रीवास्तव का नजरिया अलग है। उनका कहना है कि सच तो ये है कि जब नेता और अफसर आपस में भिड़ते हैं, तो कसूर दोनों का ही होता है। इस खींचतान में पिसती तो बेचारी आम जनता ही है। मध्य प्रदेश में आजकल ये झगड़े कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं, जो प्रदेश के भविष्य के लिए कतई अच्छी बात नहीं है।

तीन वजह, जो बढ़ा रही टकराव

  • पहली बात यह है कि जनप्रतिनिधियों की सुनवाई नहीं हो रही है। नेताओं को लगता है कि अफसर उनके साथ में काम नहीं करते। यह अविश्वास धीरे-धीरे विवाद की शक्ल लेता है।
  • दूसरी बात जिम्मेदारी का खेल है। पहले नेता और अफसर मिलकर काम करते थे। अब जब कोई काम बिगड़ता है तो दोनों एक-दूसरे पर दोष मढ़ते हैं। इससे माहौल और बिगड़ता है।
  • तीसरी बात और सबसे बड़ी वजह जनता की परेशानी है। दोनों पक्ष आपस में लड़ते रहते हैं। इस बीच जनता के जरूरी काम रुके रहते हैं। न शिकायतें सुनी जाती हैं, न समस्याएं हल होती हैं।

कानूनी दायरा क्या कहता है?

वरिष्ठ प्रशासनिक विशेषज्ञ गिरिजाशंकर इस विवाद पर एक अहम बात कहते हैं। उनके मुताबिक नेता और अफसर दोनों को अपने-अपने कानूनी अधिकारों को समझना होगा। दोनों को यह तय करना होगा कि संवैधानिक और कानूनी रूप से उनका काम कहां तक सीमित है। जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा, विवाद होते रहेंगे।

भारत में लोकतंत्र की व्यवस्था में जनप्रतिनिधि नीति बनाते हैं और अफसर उसे लागू करते हैं। वहीं, जब दोनों एक-दूसरे के काम में दखल देने लगते हैं, तो व्यवस्था चरमराने लगती है। यह समस्या सिर्फ मध्य प्रदेश की नहीं है, लेकिन यहां मामले ज्यादा तेजी से उभर रहे हैं।

जनता पर क्या असर पड़ता है?

अफसर और नेता के बीच की इस जंग में सबसे बड़ी कीमत आम आदमी चुकाता है। किसान, मजदूर, गरीब परिवार जब किसी सरकारी काम के लिए जाते हैं तो उन्हें दौड़ाया जाता है। फसल खराबी के समय मुआवजे में देरी, राशन वितरण में रुकावट और ग्राम पंचायत के कामों का ठप रहना इसी का नतीजा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अफसर कभी-कभी खुद को जनता से दूर कर लेते हैं। वे बड़े बंगलों में बैठे रहते हैं। और जब मामला नेता के साथ उलझता है तो सारी ऊर्जा उसी लड़ाई में खप जाती है।

मध्यप्रदेश में यह चलन क्यों चिंताजनक है?

यह विवाद इसलिए भी गहरा होता जा रहा है क्योंकि एक के बाद एक नए मामले सामने आते हैं। खाद वितरण के वक्त, राहत कार्यों के दौरान, बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स की जमीन अधिग्रहण के समय यह टकराव और तेज हो जाता है। कई बार स्थानीय स्तर पर अफसर जिम्मेदारी से बचने के लिए नेताओं पर दोष मढ़ते हैं और नेता अफसरशाही पर उंगली उठाते हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक इस मुद्दे की जड़ तक नहीं जाया जाएगा, यह सिलसिला थमने वाला नहीं है। सरकार को यह तय करना होगा कि जनप्रतिनिधि और प्रशासन के बीच तालमेल कैसे बने। अभी तो दोनों तरफ से आरोपों की बौछार हो रही है और जनता बीच में पिस रही है।

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