मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय (PHQ) फिर अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चाओं में है। इस बार मामला सीधे वित्तीय नियमों और प्रशासनिक अनुशासन से जुड़ा है, जहां साइबर पुलिस के लिए इजराइली कंपनी से करीब 69 लाख रुपए का हाईटेक सॉफ्टवेयर बिना सरकार की पूर्व मंजूरी के खरीद लिया गया।
अब जब भुगतान की बारी आई तो पीएचक्यू को याद आया कि इसके लिए अनुमति जरूरी थी और इसी वजह से अब पूरा मामला गृह विभाग के सवालों में उलझ गया है।
दरअसल, राज्य साइबर पुलिस मुख्यालय के तहत साइबर फॉरेंसिक लैब के लिए Cellebrite Premium सॉफ्टवेयर के 8 लाइसेंस खरीदे गए हैं। इनकी कुल लागत करीब 68 लाख 54 हजार रुपए है। तकनीकी रूप से यह सॉफ्टवेयर जितना अहम है, उसकी खरीदी का तरीका उतना ही सतही है।
क्या है यह सॉफ्टवेयर और क्यों है अहम?
Cellebrite Premium अत्याधुनिक डिजिटल फॉरेंसिक टूल है, जिसका उपयोग पुलिस और जांच एजेंसियां मोबाइल फोन की गहराई से जांच करने के लिए करती हैं।
यह सॉफ्टवेयर लॉक या पासवर्ड लगे फोन को एक्सेस करने में मदद करता है। कॉल डिटेल, WhatsApp और सोशल मीडिया चैट निकाल सकता है। फोटो, वीडियो, ईमेल और लोकेशन डेटा रिकवर करता है। यहां तक कि डिलीट किया गया डेटा भी वापस ला सकता है।
इस तरह बढ़ते साइबर अपराधों के दौर में यह उपकरण पुलिस के लिए बेहद उपयोगी है, लेकिन सवाल इसके इस्तेमाल पर नहीं, बल्कि खरीदी के तरीके पर खड़े हो रहे हैं।
नियमों को दरकिनार कर खरीदी?
गृह विभाग ने जब इस खरीदी की प्रक्रिया की पड़ताल की तो सबसे बड़ा सवाल सामने आया कि क्या पुलिस महानिदेशक (DGP) के पास ऐसा सॉफ्टवेयर खरीदने का अधिकार था?
नियमों के मुताबिक Book of Financial Powers 1995 में सॉफ्टवेयर खरीदी के लिए डीजीपी को कोई स्पष्ट वित्तीय अधिकार नहीं दिया गया है। यही वजह है कि गृह विभाग ने पीएचक्यू को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
- किस नियम या आदेश के तहत खरीदी की गई?
- क्या किसी सक्षम प्राधिकरण से मंजूरी ली गई थी?
- खर्च किस बजट मद से किया गया?
- क्या उस मद में ऐसी खरीदी का प्रावधान था?
साथ ही यह भी पूछा गया है कि क्या इतनी बड़ी तकनीकी खरीदी से पहले किसी विशेषज्ञ या तकनीकी समिति की राय ली गई थी।
PHQ की कार्यशैली पर उठे बड़े सवाल...
इस मामले ने पुलिस मुख्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं-
1. पहला सवाल: नियमों की अनदेखी क्यों?
जब साफ है कि डीजीपी के पास अधिकार नहीं था तो फिर यह निर्णय किस आधार पर लिया गया?
2. दूसरा सवाल: पहले खरीद, बाद में मंजूरी क्यों?
सरकारी प्रक्रिया कहती है कि पहले स्वीकृति ली जाए और फिर खरीदी हो। यहां उल्टा हुआ। पहले खरीदी की गई। फिर कार्योत्तर अनुमोदन (Post Facto Approval) लेने के प्रयास किए जा रहे हैं।
3. तीसरा सवाल: क्या शीर्ष स्तर तक नाराजगी?
सूत्रों के अनुसार, इस घटनाक्रम से मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव तक नाराज बताए जा रहे हैं। गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस पर कड़ा रुख दिखाया है।
खरीदी का भुगतान अटका
नियमों को दरकिनार कर की गई इस खरीदी का सीधा असर अब भुगतान पर पड़ा है। बिना मंजूरी के भुगतान संभव नहीं है। यानी एक तरफ सॉफ्टवेयर खरीदा जा चुका है, दूसरी तरफ उसका भुगतान अटका हुआ है।
पहले भी सामने आई सामंजस्य की कमी
यह पहला मौका नहीं है जब पीएचक्यू की कार्यशैली पर सवाल उठे हों। इससे पहले नौ प्रशिक्षु आईपीएस अधिकारियों की ट्रेनिंग और जिला पोस्टिंग को लेकर भी विवाद हुआ था।
उस समय भी बिना गृह विभाग और मुख्यमंत्री की मंजूरी के आदेश जारी कर दिए गए थे, जिसके बाद प्रक्रिया अटक गई थी और अधिकारियों की ट्रेनिंग प्रभावित हुई थी। अब ताजा मामला उसी पैटर्न को दोहराता नजर आ रहा है, जिसमें पहले फैसला लिया गया और फिर उसे नियमों में फिट करने की कोशिश हो रही है।
यह जनसुरक्षा से जुड़ा मुद्दा: एडीजी
इस मामले में एडीजी साइबर ए.साई मनोहर का कहना है कि बढ़ते साइबर अपराधों को देखते हुए यह उपकरण बेहद जरूरी है। यह जनसुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका सब्सक्रिप्शन लिया गया है और गृह विभाग द्वारा मांगी गई सभी जानकारियां उपलब्ध कराई जाएंगी।
द सूत्र व्यू
तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों के इस दौर में पुलिस के लिए अत्याधुनिक तकनीक अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। यह सॉफ्टवेयर निस्संदेह मध्यप्रदेश पुलिस के हाथों में मजबूत और असरदार औजार साबित हो सकता है, जिससे जांच की गति तेज होगी।
डिजिटल सबूत जुटाना ज्यादा सटीक और आसान बनेगा। अपराधियों तक पहुंच पहले से कहीं ज्यादा जल्दी संभव होगी। यहां सवाल तकनीक की उपयोगिता से ज्यादा उस तक पहुंचने के तरीके का है।
पीएचक्यू ने जो जल्दबाजी दिखाई है, उसने सिस्टम को असहज स्थिति में खड़ा कर दिया है। नियमों को नजरअंदाज कर लिया गया फैसला भले इरादों में सही है, लेकिन प्रक्रिया की अनदेखी प्रशासनिक भरोसे को कमजोर करती है।
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