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MPPSC में इंटरव्यू अंकों में भेदभाव का मुद्दा फिर उठा, कैटेगरी के हितों के लिए है यह नियम

MPPSC में इंटरव्यू अंकों में भेदभाव का मुद्दा फिर उठा, कैटेगरी के हितों के लिए है यह नियम

द सूत्र 2 months ago

मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग में एक बार फिर इंटरव्यू में अंकों के भेदभाव का मुद्दा उठने लगा है। द सूत्र ने सबसे पहले यह जानकारी रखी कि इस बार फिर लिखित परीक्षा में ज्यादा अंक लाने वाले उम्मीदवारों को इंटरव्यू में मिले कम अंकों ने मेरिट में पीछे या बाहर कर दिया है।

लिखित परीक्षा जो 800 अंक की थी। इसमें 600 और उससे अधिक अंक लाने वाले कई उम्मीदवारों का आंकड़ा इंटरव्यू में 50 अंक (100 अंक में से) नहीं छू पाया है। वहीं इससे नीचे वाले कई उम्मीदवारों को 90 से 92 अंक तक मिले हैं।

कौन उम्मीदवार हो रहे हैं चिंतित

इस इंटरव्यू के अंक को लेकर अब बड़ा सवाल उठ रहा है। वह सीधे तौर पर आरक्षण और कैटेगरी से जुड़ा है। उधर इसमें भी सामान्य वर्ग ज्यादा इसे लेकर चिंतित है, कारण है कि फूड सेफ्टी ऑफिसर का रिजल्ट हो या असिस्टेंट प्रोफेसर में विविध विषयों के, इनमें सामान्य वर्ग के चयन ना के बराबर हुए हैं। जैसे असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास विषय में अनारक्षित के 10 पद में से केवल एक सामान्य महिला चयनित हुई, वह भी गेस्ट फैकल्टी कोटे से।

कैटेगरी के हितों के लिए क्या है बोर्ड बनाने का नियम

दरअसल, पीएससी के जानकारों ने बताया कि राज्य सेवा परीक्षा में आयोग ने उम्मीदवारों की जाति छिपाने का नियम बना रखा है। इंटरव्यू बोर्ड के पास उम्मीदवार की सिर्फ एक पेज की समरी भेजी जाती है। उसमें सरनेम भी नहीं लिखा होता, ताकि जाति के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न हो।

वहीं, असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में उम्मीदवार की पूरी जानकारी बोर्ड के पास जाती है। बोर्ड बनाने को लेकर मध्य प्रदेश सरकार का एक पुराना नियम भी है। इसके मुताबिक ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग के उम्मीदवारों के हितों का ध्यान रखने के लिए इंटरव्यू बोर्ड में उसी कैटेगरी का कम से कम एक विशेषज्ञ होना जरूरी है।

यानी अगर किसी ओबीसी उम्मीदवार का इंटरव्यू हो रहा है, तो बोर्ड में कम से कम एक सदस्य ओबीसी वर्ग से होना चाहिए। इसका मकसद यह है कि उम्मीदवार के साथ जाति के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न हो और उसके हितों का ध्यान रखा जा सके।

बोर्ड में यह मेंबर इस कैटेगरी से

पीएससी में भी अध्यक्ष पद पर डॉ. राजेश लाल मेहरा हैं जो अनुसूचित जाति (एससी) से हैं। वहीं सदस्य में डॉ. पिंकेश लता रघुवंशी (सामान्य) व डॉ. नरेंद्र लाल कोष्ठी (ओबीसी) से हैं। दो पद अभी खाली हैं। ऐसे में एसटी के हितों के लिए जब उनके इंटरव्यू होते हैं तो विशेषज्ञ के तौर पर सदस्य को बुलाया जाता है। बोर्ड में सामान्य तौर पर तीन से चार सदस्य होते हैं। हर बोर्ड का अध्यक्ष पीएससी का सदस्य होता है।

असिस्टेंट प्रोफेसर में क्यों आती है समस्या

दरअसल जब राज्य सेवा परीक्षा के बोर्ड बनते हैं तो इसमें सभी कैटेगरी के एक-एक विशेषज्ञ को रख लिया जाता है। ऐसे में सभी बोर्ड कॉमन आधार पर बन जाते हैं, जिनमें भी कैटेगरी वाले होते हैं। वहीं, जब एक्सपर्ट विषय की भर्ती आती है, जैसे असिस्टेंट प्रोफेसर हो, फूड सेफ्टी ऑफिसर हो, आईटीआई प्रिंसिपल जैसे पद की, तो इसमें संबंधित फील्ड का उसी कैटेगरी का एक्सपर्ट मिलना मुश्किल हो जाता है।

ऐसे में आयोग के जो सदस्य हैं, उनकी आरक्षण कैटेगरी के आधार पर ही कई बार इंटरव्यू बोर्ड बना दिए जाते हैं, ताकि उनमें उस कैटेगरी का प्रतिनिधित्व हो सके। बाकी जो उपलब्ध विशेषज्ञ होते हैं, उन्हें रख लिया जाता है। ऐसे में एक कैटेगरी वाले उम्मीदवार का बोर्ड फिक्स हो जाता है। इसके चलते कई बार इंटरव्यू के अंकों में भेदभाव के आरोप लगते हैं।

इतिहास में इस तरह अंकों को लेकर लगे आरोप

इसमें टॉपर को लिखित परीक्षा में सर्वाधिक अंक आए हैं और इंटरव्यू में भी 100 में से 84 अंक मिले हैं। वहीं टॉप टू रैंक वाले को लिखित में अधिक अंक हैं और इंटरव्यू में 74 अंक मिले हैं। वहीं, ऐसे कई उम्मीदवार हैं जिनके लिखित में अच्छे अंक थे लेकिन इंटरव्यू में काफी कम अंक मिले। लिखित परीक्षा 800 अंक की और इंटरव्यू 100 अंक का था।

  • टॉपर को लिखित में 684 अंक, इंटरव्यू में 84 अंक

  • टॉप टू रैंक वाले को लिखित में 648 और इंटरव्यू में 74 अंक

  • वहीं लिखित परीक्षा में 660 अंक लाने वाले उम्मीदवार को केवल 18 अंक, इसी तरह एक 652 अंक लाने वाले उम्मीदवार को केवल 44 अंक, एक अन्य उम्मीदवार के लिखित परीक्षा में 648 अंक थे लेकिन इंटरव्यू में केवल 38 अंक। एक अन्य उम्मीदवार को लिखित में 632 लेकिन इंटरव्यू में केवल 25 अंक मिले हैं।

लिखित परीक्षा में कम लेकिन इंटरव्यू में ऐसे अंक

वहीं जिस उम्मीदवार के लिखित में 548 अंक हैं उसे इंटरव्यू में सर्वाधिक 92 अंक, इसी तरह 468 अंक वाले को दूसरे सर्वाधिक 91 अंक दिए गए। इसी तरह 524 अंक वाले को भी 91 अंक, 608 व 588 अंक लाने वाले को 90-90 अंक इंटरव्यू में मिले हैं।

इंटरव्यू के अंकों को कम करने की लगातार मांग

इस संबंध में उम्मीदवार पहले भी कह चुके हैं कि इंटरव्यू के अंक कम होने चाहिए। नेशनल एजुकेटेड यूथ यूनियन (एनईवाययू) द्वारा भी इसके लिए आंदोलन किए गए और फिर इसकी मांग की जा रही है। इसमें अंकों में अधिक अंतर होने से उम्मीदवार लिखित में अधिक अंक लाने के बाद भी चयन में पिछड़ जाता है। वह या तो मेरिट से ही बाहर हो जाता है या फिर बड़े पद की जगह निचले पद पर आ जाता है।

आयोग का तर्क यह है

आयोग का तर्क रहा है कि विविध कोर्ट फैसलों के आधार पर भी इंटरव्यू के अंकों का अधिकतम दायरा लिखित परीक्षा के कुल अंकों का 12.50 फीसदी तक हो सकता है। आयोग ने इंटरव्यू के अंक इसी दायरे में रखे हुए हैं, चाहे वह कोई भी भर्ती परीक्षा हो।

वहीं जानकारों का कहना है कि यह संभव है कि कई उम्मीदवार लिखित में अच्छे होते हैं लेकिन वह बोर्ड के सामने खुद को अच्छे से व्यक्त नहीं कर पाते हैं, जिसके चलते अंक कम होते हैं। बोर्ड को उनके लिखित अंक नहीं पता होते हैं और बोर्ड तो उनके व्यक्तित्व और ज्ञान का परीक्षण करते हुए अंक देता है। वहीं कैटेगरी के आधार पर हितों पर नजर रखने के लिए तो एक मेंबर होता ही है, यह तो शासन का ही नियम है।

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