समझें क्या है पूरा मामला...
- मप्र में नर्सिंग कॉलेज घोटाला सामने आने के बाद कोर्ट में याचिकाएं बढ़ीं।
- चार साल में कुल 760 याचिकाएं कोर्ट में दायर हुई हैं।
- इन्हें लड़ने में सरकार 6.62 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर चुकी है।
- इतने पैसे में एक अच्छा नर्सिंग कॉलेज खुल सकता था।
- महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को हर पेशी के लिए 4.95 लाख रुपए मिले हैं।
कॉलेज खुलता तो संवरता भविष्य
मध्य प्रदेश में नर्सिंग कॉलेज घोटाला सामने आने के बाद सरकार की जेब पर भारी बोझ पड़ा है। घोटाला उजागर होने के बाद से छात्रों और नागरिकों ने कोर्ट का रुख किया। पिछले चार साल में इससे जुड़ी कुल 760 याचिकाएं कोर्ट में लगाई गई हैं। नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल और स्वास्थ्य विभाग साल 2022 से अब तक इन केस को लड़ रहे हैं।
इस पूरी कानूनी लड़ाई में अब तक छह करोड़ 62 लाख 44 हजार 795 रुपए खर्च हो चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इतने पैसे से राज्य में एक बेहतर नर्सिंग कॉलेज खोला जा सकता था। इससे कई छात्रों का भविष्य भी संवर सकता था। लेकिन यह रकम अदालती लड़ाई में ही खर्च हो गई।
विधानसभा में उठा मामला
यह पूरी जानकारी विधानसभा में एक सवाल के जवाब में सामने आई है। विधायक हेमंत कटारे ने इस मुद्दे पर लिखित सवाल पूछा था। इसके जवाब में स्वास्थ्य विभाग ने पूरी जानकारी सदन में रखी।
विभाग के मुताबिक 01 जनवरी 2022 से अब तक नर्सिंग काउंसिल में कुल 760 न्यायालयीन प्रकरण मिले हैं। इनमें से 599 प्रकरणों का निराकरण न्यायालय द्वारा किया जा चुका है। बाकी बचे प्रकरण अभी भी अदालत में विचाराधीन हैं। यानी अब भी बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। इन पर भविष्य में और खर्च होने की आशंका बनी हुई है।
क्यों बढ़ीं इतनी याचिकाएं
घोटाला सामने आने के बाद याचिकाओं की संख्या अचानक क्यों बढ़ी, इसका भी जवाब सामने आया है। नर्सिंग घोटाले के उजागर होने के बाद परीक्षा और रिजल्ट में बहुत ज्यादा देरी होने लगी। कई कोर्स समय पर आगे नहीं बढ़ पाए। कुछ मामलों में तो पांच से छह साल में भी कोर्स पूरा नहीं हो सका। इससे परेशान छात्र-छात्राओं ने एक के बाद एक याचिकाएं लगाईं।
इसके अलावा सरकार ने नर्सिंग शिक्षण संस्थानों की मान्यता के नियमों में कुछ बदलाव भी किए थे। कई मामलों में पात्रता की शर्तों में ढील दी गई। इन फैसलों को भी अपात्र संस्थानों ने कोर्ट में चुनौती दी। इस तरह अलग-अलग वजहों से याचिकाओं की संख्या लगातार बढ़ती चली गई।
महाधिवक्ता को मिला सबसे ज्यादा भुगतान
नर्सिंग काउंसिल से जुड़े कोर्ट केस में सबसे ज्यादा भुगतान महाधिवक्ता यानी एडवोकेट जनरल (Advocate General) प्रशांत सिंह को किया गया है। उन्हें अब तक एक करोड़ 83 लाख रुपए का भुगतान हो चुका है। इसके बावजूद उनका एक करोड़ 13 लाख रुपए का भुगतान अभी भी बाकी है। उन्हें हर पेशी के लिए चार लाख 95 हजार रुपए के हिसाब से भुगतान किया गया।
यह रकम बाकी वकीलों की तुलना में सबसे ज्यादा है। इसके अलावा अतिरिक्त महाधिवक्ता भरत सिंह को हर पेशी के लिए 82 हजार 500 रुपए दिए गए। उनका भी अभी 18 लाख 97 हजार 500 रुपए का भुगतान लंबित है। अनुज त्यागी पैनल एडवोकेट को हर पेशी पर 75 हजार रुपए का भुगतान हुआ। वहीं उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी और अन्य अधिवक्ताओं को 15 हजार रुपए प्रति पेशी दिए गए।
किस वकील को कितनी रकम मिली
कोर्ट में पैरवी के लिए अलग-अलग वकीलों और फर्मों को अलग-अलग रकम दी गई है। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को अब तक कुल एक करोड़ 83 लाख 15 हजार रुपए मिले हैं। अभिजीत ए अवस्थी पैनल को 33 लाख 85 हजार रुपए दिए गए। अनुज त्यागी पैनल एडवोकेट को 22 लाख 54 हजार 500 रुपए का भुगतान हुआ।
अतिरिक्त महाधिवक्ता भरत सिंह को 15 लाख 37 हजार 500 रुपए मिले। उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी को 10 लाख 15 हजार रुपए दिए गए। अधिवक्ता विवेक खेड़कर को पांच लाख 70 हजार रुपए का भुगतान हुआ। ब्राइम डी सेल्वा को तीन लाख 50 हजार रुपए मिले।
मिनी रविन्द्रन पैनल को तीन लाख 40 हजार रुपए का भुगतान किया गया। साल 2025-26 में ही महाधिवक्ता सहित पांच वकीलों को कुल 1 करोड़ 56 लाख 45 हजार रुपए दिए गए हैं। यह जानकारी खुद विधानसभा में स्वास्थ्य विभाग के जवाब से मिली है।
अभी भी बाकी है सवा करोड़ का भुगतान
इस पूरे मामले में अब तक कुल भुगतान का हिसाब भी सामने आया है। विधिक सलाह में महाधिवक्ता, उनकी टीम और अन्य अधिवक्ताओं की फीस मिलाकर पांच करोड़ 66 लाख रुपए बनती है। इसमें से चार करोड़ 34 लाख रुपए का भुगतान हो चुका है। जबकि अभी भी एक करोड़ 32 लाख रुपए का भुगतान बाकी है। यह रकम आने वाले समय में सरकार को चुकानी होगी। इसके अलावा चार विधिक सलाहकारों को अलग से 95 लाख रुपए दिए गए हैं।
काउंसिल में कार्यरत हैं चार विधिक सलाहकार
वर्तमान में नर्सिंग काउंसिल में चार विधिक सलाहकार काम कर रहे हैं। इनमें अंकित नेमा, अभिषेक सिंह, हरीश बारी और शिवांग शुक्ला शामिल हैं। साल 2022 से अब तक इन चारों को परामर्श शुल्क के रूप में 95 लाख 50 हजार 295 रुपए दिए जा चुके हैं।
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक अधिकांश मामले छात्र-छात्राओं ने परीक्षा और रिजल्ट से जुड़े विवादों को लेकर लगाए हैं। यानी बड़ी संख्या में छात्रों को अपने अधिकार के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। इससे साफ है कि घोटाले का असर सीधे विद्यार्थियों की पढ़ाई और भविष्य पर पड़ा है।
अब आगे क्या होगा
फिलहाल नर्सिंग काउंसिल से जुड़े कई मामले अभी भी अदालत में विचाराधीन हैं। जब तक ये मामले पूरी तरह नहीं निपटते, तब तक सरकार का खर्च और बढ़ने की आशंका है। वहीं विपक्ष भी इस मुद्दे पर सरकार को घेर सकता है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि जितना पैसा कोर्ट केस में खर्च हुआ, उतने में नई सुविधाएं भी खड़ी हो सकती थीं। छात्र संगठनों का कहना है कि सरकार को अब जल्द फैसला लेकर मामलों को निपटाना चाहिए। इससे न सिर्फ पैसों की बचत होगी, बल्कि छात्रों का भरोसा भी बहाल होगा।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर सरकारी खजाने और छात्रों के भविष्य दोनों से जुड़ी है। जनता के टैक्स का पैसा किस तरह खर्च हो रहा है, यह जानना हर नागरिक का अधिकार है। यहां करोड़ों रुपए सिर्फ कोर्ट केस लड़ने में खर्च हुए, जबकि यही रकम शिक्षा सुविधाओं में लग सकती थी।
यह पारदर्शिता, सुशासन और जवाबदेही से जुड़ा मामला है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है। साथ ही यह छात्रों के शिक्षा के अधिकार से भी जुड़ा है, जो संविधान की भावना का हिस्सा है। ऐसी खबरें जनता को सही जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाती हैं।
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