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ओडिशा से हिमाचल तक खैर तस्करी का सिंडिकेट, छत्तीसगढ़ बना मुख्य ट्रांजिट पॉइंट

ओडिशा से हिमाचल तक खैर तस्करी का सिंडिकेट, छत्तीसगढ़ बना मुख्य ट्रांजिट पॉइंट

त्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा के जंगलों से खैर की अवैध कटाई का मामला अब बड़े अंतरराज्यीय नेटवर्क की ओर इशारा कर रहा है। वन विभाग की जांच में सामने आया है कि खैर की लकड़ी अलग-अलग रास्तों से उत्तर भारत तक पहुंचाई जा रही थी।

इसके लिए कई राज्यों में ट्रांजिट पॉइंट, गोदाम और प्रोसेसिंग यूनिट का इस्तेमाल किया जा रहा था।

जांच अधिकारियों के मुताबिक यह नेटवर्क केवल लकड़ी की चोरी तक सीमित नहीं था। इसके लिए परिवहन, फर्जी परमिट, गाड़ियों की रेकी और अलग-अलग लोगों की जिम्मेदारी तय थी। विभाग का दावा है कि इस नेटवर्क की गतिविधियां करीब 10 राज्यों तक फैली हुई हैं।

छत्तीसगढ़ बना था नेटवर्क का बड़ा ट्रांजिट पॉइंट

जांच में सामने आया है कि ओडिशा के जंगलों से निकाली गई खैर की लकड़ी सबसे पहले छत्तीसगढ़ लाई जाती थी। महासमुंद, सरायपाली, पिथौरा, रायपुर, जांजगीर, रायगढ़ और कोरबा के कुछ इलाकों का इस्तेमाल इसके परिवहन के लिए किया जाता था। कुछ स्थानों पर लकड़ी उतारकर उसकी छंटाई की जाती थी। इसके बाद माल को बड़े ट्रकों में दोबारा लोड किया जाता था। फिर अलग-अलग रास्तों से मध्य प्रदेश और उत्तर भारत की ओर भेजा जाता था। जांच एजेंसियों को आशंका है कि इस पूरी व्यवस्था के लिए पहले से तय रास्ते और संपर्क तैयार किए गए थे।

ओडिशा के जंगलों से जुटाई जाती थी खैर की लकड़ी

ओडिशा के संबलपुर, पटनागढ़, बलांगीर, बेलपड़ा, कांटाभांजी और खरियार रोड के वन क्षेत्र जांच के दायरे में हैं। अधिकारियों के मुताबिक स्थानीय स्तर पर खैर की लकड़ी जुटाई जाती थी। इसके लिए ग्रामीण इलाकों और स्थानीय नेटवर्क की मदद ली जाती थी। कई मामलों में अवैध कटाई की भी आशंका जताई गई है। इसके बाद छोटी गाड़ियों और ट्रकों की मदद से लकड़ी को राज्य की सीमा से बाहर भेजा जाता था।

मध्य प्रदेश के रास्ते उत्तर भारत पहुंचता था माल

वन विभाग की जांच में मध्य प्रदेश के कुछ रास्तों का भी जिक्र सामने आया है। मंडला, जबलपुर और सीधी क्षेत्र से गुजरने वाले मार्गों का इस्तेमाल उत्तर भारत की ओर जाने वाली गाड़ियों के लिए किए जाने की आशंका है। सीधी में भी खैर की लकड़ी की एक बड़ी खेप पकड़े जाने की जानकारी सामने आई है। जांच अधिकारियों के अनुसार इस मामले में नेटवर्क से जुड़े दूसरे लोगों की भूमिका भी खंगाली जा रही है।

हिमाचल प्रदेश बड़ा प्रोसेसिंग सेंटर

खैर की लकड़ी का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग कत्था बनाने में होता है। जांच में हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और ऊना जिलों की कई प्रोसेसिंग यूनिट का जिक्र सामने आया है। सिरमौर जिले का काला अंब औद्योगिक क्षेत्र हरियाणा की सीमा के पास स्थित है। यहां कई उद्योग खैर की लकड़ी और उससे जुड़े उत्पादों की प्रोसेसिंग करते हैं। ऊना जिले के गगरेट क्षेत्र में भी कत्था और आयुर्वेदिक उत्पादों से जुड़ी कई इकाइयां संचालित हैं। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि अवैध तरीके से भेजी गई लकड़ी किन इकाइयों तक पहुंची।

10 राज्यों तक फैली बताई जा रही सप्लाई चेन

जांच में सामने आए नेटवर्क में अलग-अलग राज्यों की अलग भूमिका बताई जा रही है।

ओडिशा को खैर की लकड़ी जुटाने का प्रमुख क्षेत्र माना जा रहा है। छत्तीसगढ़ में माल की आवाजाही, स्टोरेज और दोबारा लोडिंग की व्यवस्था होने का दावा है।

मध्य प्रदेश को उत्तर भारत तक पहुंचने वाले रास्ते के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंका है।

उत्तर प्रदेश के आगरा, इटावा, झांसी, मेरठ और मथुरा जैसे शहरों में लकड़ी से जुड़े उत्पाद तैयार करने वाली इकाइयां जांच के दायरे में बताई गई हैं।

हरियाणा और दिल्ली क्षेत्र में कत्था उद्योग और कारोबार से जुड़े संपर्कों की जांच की जा रही है।

राजस्थान में भी कुछ प्रोसेसिंग यूनिट तक लकड़ी पहुंचने की आशंका है।

बिहार और झारखंड में स्थानीय गुटखा, दवा और दूसरे उद्योगों तक खैर से बने उत्पाद पहुंचने की बात जांच में सामने आई है।

हिमाचल प्रदेश को इस सप्लाई चेन का बड़ा प्रोसेसिंग सेंटर बताया जा रहा है।

खैर की लकड़ी से बनता है कत्था

खैर की लकड़ी की बाजार में बड़ी मांग रहती है। इससे मुख्य रूप से कत्था तैयार किया जाता है। इसके अलावा इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाओं, चमड़े की रंगाई और कपड़ा उद्योग में भी होता है। रिपोर्ट में खैर की लकड़ी की कीमत करीब 8 से 9 हजार रुपए प्रति क्विंटल बताई गई है। ऊंची कीमत और लगातार मांग के कारण इसकी अवैध कटाई और तस्करी का कारोबार फायदे का सौदा बन गया है।

फर्जी ट्रांजिट पास का भी इस्तेमाल करने का आरोप

जांच में तस्करी के तरीके भी सामने आए हैं। अधिकारियों के मुताबिक लकड़ी से भरे ट्रकों को वैध दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते थे। नेशनल ट्रांजिट पास सिस्टम यानी NTPS जैसे दिखने वाले डिजिटल परमिट और QR कोड बनाए जाने की भी आशंका है। चेकिंग के दौरान कई स्थानों पर QR कोड की तत्काल पुष्टि की व्यवस्था नहीं होने का फायदा उठाया जाता था। इसी वजह से कई गाड़ियां जांच से बचकर निकल जाती थीं।

ट्रकों के आगे-पीछे चलती थीं एस्कॉर्ट गाड़ियां

तस्करी में लगे ट्रकों को सुरक्षित निकालने के लिए रेकी की व्यवस्था होने की बात भी सामने आई है। आरोप है कि ट्रकों के आगे और पीछे कार या बाइक चलती थी। इन गाड़ियों में बैठे लोग पुलिस और वन विभाग के चेकिंग पॉइंट की जानकारी देते थे। रास्ते में खतरा दिखाई देने पर ट्रकों को ढाबों, गोदामों या बंद औद्योगिक परिसरों में रोक दिया जाता था। हालात सामान्य होने के बाद गाड़ी को दोबारा आगे बढ़ाया जाता था।

फर्जी नंबर प्लेट का भी इस्तेमाल

जांच में वाहनों पर फर्जी नंबर प्लेट इस्तेमाल किए जाने का मामला भी सामने आया है। इससे गाड़ियों की वास्तविक पहचान छिपाने की कोशिश की जाती थी। अधिकारियों का मानना है कि परिवहन के दौरान गाड़ी, ड्राइवर और मोबाइल नंबर बदलने जैसी रणनीति अपनाई जाती थी। इससे पूरे नेटवर्क को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता था।

मनीष अग्रवाल को मास्टरमाइंड मान रहा वन विभाग

वन विभाग की जांच में सरसीवा क्षेत्र से जुड़े मनीष अग्रवाल का नाम प्रमुख रूप से सामने आया है। अधिकारियों का दावा है कि वह पूरे नेटवर्क के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। उसके खिलाफ गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं। मोबाइल लोकेशन और दूसरे तकनीकी इनपुट के आधार पर जांच एजेंसियों को उसके नेपाल सीमा के आसपास छिपे होने की आशंका है। हालांकि उसकी गिरफ्तारी के बाद ही इस संबंध में स्थिति पूरी तरह साफ हो सकेगी।

कई मोबाइल नंबरों से संपर्क रखने का दावा

जांच में यह भी सामने आया है कि नेटवर्क चलाने के लिए कई मोबाइल नंबर इस्तेमाल किए जाते थे। अधिकारियों के अनुसार सीधे बातचीत करने के बजाय सहयोगियों के फोन से कॉन्फ्रेंस कॉल के जरिए संपर्क किया जाता था।इससे मुख्य व्यक्ति की लोकेशन और कॉल रिकॉर्ड छिपाना आसान हो जाता था। जांच एजेंसियां अब मोबाइल डेटा और संपर्कों की कड़ी जोड़ने में लगी हैं।

दूसरे राज्यों में भी पहुंची जांच

पिथौरा में खैर की लकड़ी से भरा ट्रक पकड़े जाने के बाद जांच का दायरा लगातार बढ़ा है। मध्य प्रदेश के सीधी में भी खैर की बड़ी खेप पकड़े जाने की जानकारी सामने आई है। इस मामले में नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक छत्तीसगढ़ के साथ ओडिशा, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में भी नेटवर्क से जुड़े लोगों और कारोबारी संपर्कों की जानकारी जुटाई जा रही है।

अब सप्लाई चेन तोड़ने पर जांच एजेंसियों का फोकस

जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस नेटवर्क की पूरी सप्लाई चेन का पता लगाना है। जंगल से लकड़ी काटने वाले लोगों से लेकर परिवहन करने वाले ड्राइवर, फर्जी दस्तावेज बनाने वाले लोग, गोदाम संचालक और अंतिम खरीदार तक सभी की भूमिका खंगाली जा रही है। जांच में यह भी पता लगाया जा रहा है कि अवैध खैर की लकड़ी किन फैक्ट्रियों तक पहुंची और इसके बदले कितने रुपए का लेन-देन हुआ। मामले में मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच के बाद तस्करी के पूरे नेटवर्क की तस्वीर और साफ होने की उम्मीद है।


FAQ
Q. खैर तस्करी का नेटवर्क किन राज्यों तक फैला है? A. यह नेटवर्क ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, यूपी, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, बिहार, झारखंड और हिमाचल प्रदेश तक फैला बताया गया है। Q. खैर की लकड़ी का इस्तेमाल किस काम में होता है? A. खैर की लकड़ी से मुख्य रूप से कत्था बनता है। इसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं, चमड़े और कपड़ों की रंगाई में भी होता है। Q. खैर तस्करी मामले का मास्टरमाइंड कौन है? A. वन विभाग ने मनीष अग्रवाल को इस नेटवर्क का मुख्य आरोपी बताया है। उसकी गिरफ्तारी के लिए अंतरराज्यीय स्तर पर तलाश जारी है।

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