News In Short
- श्योपुर नगर पालिका अध्यक्ष के चुनाव को लेकर विवाद शुरू हुआ है।
- नोटिफिकेशन नहीं होने पर चुनाव को चुनौती दी गई।
- अब इंदौर-उज्जैन संभाग के 8 जिलों की 15 याचिकाएं इंदौर हाईकोर्ट पहुंच गई हैं।
- कई मामलों में अध्यक्षों के वित्तीय अधिकारों पर रोक लग चुकी है।
- 6 अप्रैल की सुनवाई से पूरे प्रदेश की नगर पालिकाएं प्रभावित हो सकती हैं।
News In Detail
श्योपुर नगर पालिका अध्यक्ष के चुनाव का नोटिफिकेशन जारी नहीं होने पर मध्यप्रदेश सरकार की किरकिरी हो रही है। ग्वालियर हाईकोर्ट के जस्टिस ने इसे लेकर मुख्य सचिव, संभागायुक्त चंबल से लेकर सभी अधिकारियों पर तीखी टिप्पणियां की हैं। इस मामले में देरी पर जस्टिस ने इसे सरकार की बेंच हंटिंग की कोशिश और कोर्ट के साथ किया जा रहा छल तक कहा है।
वहीं अब यह बवाल इंदौर-उज्जैन संभाग के आठ जिलों तक फैल गया है। इन मामलों में इंदौर हाईकोर्ट में 06 अप्रैल को सुनवाई संभावित है। इस पर अब पूरे प्रदेश की नजरें हैं। जो श्योपुर में हुआ वह पूरे एमपी की नगर पालिका परिषद के निर्वाचन (नगर पालिका अध्यक्ष चुनाव) को लेकर हुआ था। कहीं पर भी निर्वाचन का नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ था।
इंदौर हाईकोर्ट में यहां से हुई थी शुरुआत
इसकी शुरुआत एमपी में श्योपुर के साथ ही बड़वानी जिले के पानसेमल से हुई थी। पानसेमल में राधिका सतोते ने नगर पालिका अध्यक्ष शैलेष भंडारकर के निर्वाचन को चुनौती दी। इसके बाद कहा गया कि चुनाव का नोटिफिकेशन ही जारी नहीं हुआ था।
इस पर 2 मई 2024 को हाईकोर्ट इंदौर ने अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार पर रोक लगा दी थी। इस केस में 25 सितंबर 2025 (संदर्भ अनुसार संशोधित) को याचिकाकर्ता ने मप्र नगर पालिका संशोधन एक्ट 2025 पेश किया और कहा कि बिना नोटिफिकेशन चुनाव मान्य नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने जवाब मांगा है, लेकिन अभी शासन से जवाब नहीं आया है।
इंदौर-उज्जैन संभाग के इन जिलों पर लगी याचिकाएं
इंदौर और श्योपुर केस के बाद इंदौर-उज्जैन संभाग के आठ जिलों की विभिन्न नगर पालिकाओं को लेकर 15 याचिकाएं दायर हो गई हैं। इन सभी पर 06 अप्रैल को संभावित सुनवाई है।
इसमें उज्जैन, खरगोन, देवास, धार, आगर-मालवा, रतलाम, राजगढ़ और बड़वानी जिले शामिल हैं।
बड़वानी के पानसेमल की याचिका को छोड़कर बाकी जिलों की याचिकाएं मार्च 2026 में ही दायर हुई हैं।
जावरा (रतलाम), नागदा (उज्जैन), सोनकच्छ (देवास) के मामलों में हाईकोर्ट ने वित्तीय अधिकारों के उपयोग पर रोक लगा दी है।
बाकी मामलों में शासन से जवाब मांगा गया है। इनमें जावरा की एक और नगर पालिका बड़ावदा परिषद, बागली (देवास), पडाल्याखुर्द (खरगोन), तराना (उज्जैन), बाबड़ी (राजगढ़), खाचरौद (उज्जैन), मंडलेश्वर (खरगोन), बरोद (आगर-मालवा), सैलाना (रतलाम), सतवास (देवास) और कुक्षी (धार) शामिल हैं।
इंदौर हाईकोर्ट केस की सुनवाई क्यों अहम
ग्वालियर हाईकोर्ट में केस गंभीर स्थिति में है।निचले स्तर पर जवाब तैयार करने में हुई चूक के कारण अधिकारी और सरकार उलझ गए हैं। अब इसमें हाईकोर्ट ने सीधे 13 जुलाई की तारीख लगा दी है।
वहीं इसी तरह के 15 केस में इंदौर हाईकोर्ट में सुनवाई होना है। मामला नोटिफिकेशन का ही है। ऐसे में इंदौर हाईकोर्ट का कोई भी आदेश पूरे प्रदेश की नगर पालिकाओं को प्रभावित करेगा। इससे एमपी की 98 नगर पालिका और 247 नगर परिषद के अध्यक्षों की कुर्सी और अधिकार संकट में आ सकते हैं।
क्या हुई थी गफलत
तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान के समय स्थानीय निकाय में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का मामला सुप्रीम कोर्ट गया था। बाद में राहत मिलने पर राज्य चुनाव आयोग ने जल्दबाजी में नगर निगम और पंचायत चुनाव कराए थे।
चुनाव के बाद नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के महापौरों और पार्षदों के परिणाम की अधिसूचना जारी हुई थी। वहीं, निर्वाचित अध्यक्षों के लिए अधिसूचना राज्य सरकार के शहरी विकास और आवास विभाग द्वारा जारी नहीं की गई।
इसका खुलासा तब हुआ जब 22 अप्रैल 2024 को पानसेमल (बड़वानी) को लेकर याचिका दायर हुई और वित्तीय अधिकारों पर रोक लग गई। इसके बाद श्योपुर मामले ने सरकार को हिला दिया।
श्योपुर मामले में सीएस, संभागायुक्त सभी उलझे
श्योपुर मामले ने सरकार को सबसे ज्यादा उलझा दिया। यह केस अब सरकार के लिए बड़ी समस्या बन गया है। दरअसल, श्योपुर केस में पहले शासन पक्ष की ओर से जवाब दिया गया कि नोटिफिकेशन जारी हुआ ही नहीं, इसलिए चुनाव याचिका मेंटेन करने योग्य नहीं है।
इस पर हाईकोर्ट ने आश्चर्य जताया और वित्तीय अधिकार रोक दिए। सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गई, लेकिन राहत नहीं मिली।
फिर सरकार ने बदला जवाब
इसके बाद सरकार ने अचानक रुख बदला और दूसरा जवाब पेश किया कि नोटिफिकेशन की जरूरत ही नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारियों को फटकार लगाई।
कहा गया कि शासकीय अधिवक्ता से गलती हुई और जवाब गलत तैयार किया गया था। इस पर हाईकोर्ट और सख्त हो गया और जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा।
चंबल आयुक्त से लेकर मुख्य सचिव अनुराग जैन तक से जवाब मांगा गया। लेकिन जवाब नहीं मिलने पर 01 अप्रैल को ग्वालियर हाईकोर्ट ने इसे सरकार की बेंच हंटिंग प्रैक्टिस करार दिया और कहा कि देरी कर सरकार कोर्ट के साथ छल कर रही है।
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