नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार (29 अप्रैल, 2026) को तर्कवादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की 2013 में हुई हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए दो शूटरों में से एक, शरद कालस्कर को जमानत दे दी.
अदालत ने संदेह जताया कि सीबीआई ने गवाहों से जिस तरीके से शरद कालस्कर की पहचान करवाई, वह प्रक्रिया ठीक या भरोसेमंद नहीं थी. जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रणजीतसिंह भोंसले की खंडपीठ ने पुणे की सत्र अदालत द्वारा कालस्कर को दी गई आजीवन कारावास की सजा पर रोक लगाते हुए, 50,000 रुपये के निजी मुचलके पर जमानत देने का निर्देश दिया.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला ज़्यादातर अविश्वसनीय गवाहों पर आधारित था. अदालत ने कालस्कर के आठ साल से ज़्यादा समय तक जेल में रहने की बात को भी ध्यान में रखा.
कालस्कर को 2024 में एक विशेष अदालत ने दोषी ठहराया था और उसने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी.
एक तर्कवादी की हत्या
20 अगस्त 2013 की सुबह पुणे में 69 वर्षीय दाभोलकर की वीआर शिंदे ब्रिज पर सचिन प्रकाशराव अंदुरे और कालस्कर द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. वह महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक थे. उनकी हत्या महाराष्ट्र और कर्नाटक में की गई हत्याओं की श्रृंखला में सबसे पहली थी. दाभोलकर के बाद वामपंथी विचारक गोविंद पानसरे, अकादमिक और एक्टिविस्ट एमएम कलबुर्गी और पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या की गई थी.
पुणे पुलिस, जिसने शुरुआत में उनकी हत्या के मामले की जांच की थी, ने हाईकोर्ट के आदेश के बाद 2014 में जांच सीबीआई को सौंप दी थी.
हालांकि, दाभोलकर की हत्या 2013 में की गई थी, लेकिन अंदुरे और कालस्कर दोनों को 2018 में गिरफ्तार किया गया, जब गौरी लंकेश की हत्या में उनकी भूमिका सामने आई थी. महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने कर्नाटक पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) की मदद से दोनों को पकड़ा था. कर्नाटक एसआईटी 2017 में बेंगलुरु स्थित गौरी लंकेश के आवास पर उनकी हत्या की जांच कर रही थी.
जनवरी 2025 में अन्य छह आरोपियों - सचिन अंदुरे, गणेश मिस्किन, अमित डेगवेकर, अमित बड्डी, भरत कुराने और वासुदेव सूर्यवंशी - को लंबी हिरासत और निकट भविष्य में मुकदमे के समाप्त होने की संभावना कम होने के आधार पर ज़मानत दे दी गई थी.
क्या था कालस्कर के अपील का आधार?
अखबार अनुसार, सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता नितीन प्रधान और अधिवक्ता शुभदा खोत ने कालस्कर की ओर से दलील दी कि उसका नाम 2019 में दाखिल एक बाद के आरोपपत्र में 'बिना किसी वैध और ठोस कारण' के हमलावर के रूप में जोड़ा गया. उन्होंने यह भी कहा कि कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) नहीं कराई गई, जिससे भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत उसकी पहचान के साक्ष्य का महत्व कम हो जाता है. बचाव पक्ष के अनुसार, गवाहों को उसकी तस्वीरें दिखाकर पहचान कराई गई, जबकि वह पहले से ही हिरासत में था.
दूसरी ओर, सीबीआई की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजक अमित मुंडे ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अभियोजन ने मुख्य रूप से प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर भरोसा किया है. उन्होंने तर्क दिया कि केवल तस्वीरों के माध्यम से पहचान होने से साक्ष्य अमान्य नहीं हो जाता. उन्होंने कहा, 'यदि टीआईपी तस्वीरें दिखाकर भी कराई गई हो, तो इससे अभियोजन के मामले को कोई नुकसान नहीं पहुंचता.'
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने सीबीआई की उस अर्ज़ी को मंज़ूर करने से इनकार कर दिया जिसमें ज़मानत के आदेश पर चार हफ़्तों के लिए रोक लगाने की मांग की गई थी. जस्टिस गडकरी ने कहा, 'चूंकि हमने पहले ही आवेदक कालस्कर की हमलावर के तौर पर पहचान पर संदेह जताया है, इसलिए इस आदेश पर रोक लगाने का कोई सवाल ही नहीं उठता.'
अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि दाभोलकर की हत्या एक ऐसी साज़िश का हिस्सा थी जिसका मकसद अंधविश्वास को चुनौती देने वाली और तर्कवाद को बढ़ावा देने वाली आवाज़ों को खामोश करना था. आरोपी, जिनका संबंध कथित तौर पर दक्षिणपंथी संगठन सनातन संस्था से बताया जाता है, पर आरोप है कि उन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ काम करने वालों में डर पैदा करने की कोशिश की. 2015 में दाभोलकर के परिवार ने इस मामले की जांच के लिए एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की. हाईकोर्ट ने अगस्त 2015 में जांच की निगरानी शुरू कर दी.

