नई दिल्ली: गुजरात के मोरबी ज़िले के जेटपार गांव में किसान अडानी समूह की बिजली ट्रांसमिशन परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ, राज्य सरकार द्वारा मुआवज़ा बढ़ाए जाने के बाद भी अपना आमरण अनशन जारी रखे हुए हैं.
शुक्रवार (3 जुलाई) को भूपेंद्र पटेल सरकार ने मुआवज़े में वृद्धि की घोषणा की थी, लेकिन प्रदर्शनकारी किसानों ने स्पष्ट किया है कि उन्हें केवल मौखिक आश्वासन नहीं, बल्कि सरकार का लिखित प्रस्ताव चाहिए. साथ ही वे अपनी ज़मीन के बदले बाज़ार मूल्य का दोगुना नहीं, बल्कि चार गुना मुआवज़ा देने की मांग कर रहे हैं.
ज्ञात हो कि अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड (एईएसएल) मोरबी ज़िले की कृषि ज़मीन पर हाई-टेंशन बिजली लाइनें और टावर लगा रही है. इस परियोजना से मोरबी की कम-से-कम छह तहसीलों के सैकड़ों किसान प्रभावित होंगे.
आंदोलनकारी किसानों का कहना है कि इन टावरों और लाइनों के कारण उनकी ज़मीन खेती के लायक नहीं रहेगी. इसलिए वे 'राइट ऑफ वे' (मार्गाधिकार) देने के बदले बाज़ार मूल्य का चार गुना मुआवज़ा चाहते हैं. सरकार का शुरुआती प्रस्ताव सरकार द्वारा तय 'जंत्री दर' (सरकारी रेट) का दोगुना मुआवज़ा देने का प्रस्ताव रखा था, जो असल बाज़ार भाव से काफी कम है.
मोरबी के अलावा यह परियोजना कच्छ, जामनगर, देवभूमि द्वारका, सुरेंद्रनगर, पाटन और बनासकांठा ज़िलों के किसानों को भी प्रभावित करेगी.
शुक्रवार (3 जुलाई) को जब मोरबी के 11 किसानों का आमरण अनशन 16वें दिन में प्रवेश कर चुका था, तब कृषि मंत्री जीतू वाघाणी, ऊर्जा मंत्री कनुभाई देसाई और ऊर्जा राज्य मंत्री मुकेश पटेल ने एक प्रेस वार्ता में संशोधित नीति की घोषणा की. इसके तहत अब किसानों को जंत्री दर के बजाय बाज़ार मूल्य का दोगुना मुआवज़ा देने की पेशकश की गई. मंत्रियों ने इसे 'निष्पक्ष, पारदर्शी और बाज़ार आधारित' नीति बताया.
खबरों के अनुसार, मंत्रियों ने यह भी कहा कि मुआवज़े के लिए ज़मीन के क्षेत्रफल की गणना किसानों के पक्ष में बदली गई है. इसमें टावर के आधार (फुटप्रिंट) के दोनों तरफ़ एक अतिरिक्त मीटर जोड़ा गया है और पूरी रकम अब किश्तों के बजाय एकमुश्त में ही दी जाएगी.
सरकार ने यह भी घोषणा की कि आगे से भूमि का बाज़ार मूल्य तय करने के लिए एक नई समिति बनाई जाएगी, जिसमें ज़िला कलेक्टर, प्रभावित ज़मीन मालिकों के प्रतिनिधि, किसानों द्वारा नियुक्त मूल्यांकनकर्ता और कंपनी का एक प्रतिनिधि शामिल होंगे.
हालांकि, रविवार को किसानों का अनशन 18वें दिन में प्रवेश कर गया. किसानों का कहना है कि उन्हें मौखिक आश्वासन नहीं, बल्कि सरकार का लिखित आदेश चाहिए और संशोधित मुआवज़े में भी और बढ़ोतरी की जानी चाहिए.
यह आंदोलन शुरुआत में अलग-अलग जगहों पर छोटे विरोध प्रदर्शनों के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन जून की शुरुआत में जेटपार गांव में संगठित हो गया. 17 किसानों ने 'इंसानियत की मौत' के प्रतीक के रूप में अपने सिर मुंडवाए और ऐसे तख्ते लेकर प्रदर्शन किया, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'गद्दार' कहा गया था.
इसके बाद उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया. फिलहाल 11 किसान अब भी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं.
15 जून को किसान कांग्रेस और किसान संघर्ष समिति के बैनर तले हज़ारों किसानों ने ट्रैक्टर, बैलगाड़ी, कार, दोपहिया वाहन, बस और पैदल शांतिपुरा सर्किल से गांधीनगर तक मार्च निकाला.
सुरेंद्रनगर ज़िले के कोंध गांव के किसान अजीत चौहान ने डेक्कन हेराल्ड से कहा, 'यह तानाशाही से कम नहीं है. मुझे अब तक मुआवज़े के रूप में एक पैसा भी नहीं मिला है. जब भी मैं मजदूरों के मेरे खेत में घुसने पर आपत्ति जताता हूं, तो पुलिस मुझे परेशान करती है. पुलिस सुरक्षा में यह काम कराया जा रहा है. मैंने मजबूरी में पावर ट्रांसमिशन लाइनों के लिए अपनी ज़मीन के अधिग्रहण पर सहमति दी थी.'
किसान नेताओं ने अडानी समूह सहित संबंधित कंपनियों पर ज़बरन बिजली के खंभे लगाने का भी आरोप लगाया है.
अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे किसान नेता राकेश अमृतिया ने पिछले सप्ताह द टेलीग्राफ से कहा, 'वे बिना हमसे कोई सलाह-मशविरा किए जबरन हमारी ज़मीन में घुस आए हैं और अब उचित मुआवज़ा देने को भी तैयार नहीं हैं. हमें किसी भी आधारभूत ढांचा परियोजना से समस्या नहीं है, लेकिन इस तरह नहीं.'
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, 'यह आंदोलन गांधीवादी सत्याग्रह के तरीके से चल रहा है, लेकिन अगर सरकार किसानों को उचित मुआवज़ा देने के लिए ठोस कदम नहीं उठाती, तो स्थिति बिगड़ सकती है और नियंत्रण से बाहर भी जा सकता है.'
दूसरी ओर, अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड (एईएसएल) ने पहले जारी एक बयान में कहा था, 'एईएसएल जमीन मालिकों के साथ बातचीत करने और कानून के तहत नागरिक प्रशासन द्वारा निर्धारित उचित मुआवज़ा देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. लेकिन कुछ स्वार्थी तत्व भूमि मालिकों को भड़का रहे हैं.'
गुजरात सरकार द्वारा संशोधित मुआवज़े की घोषणा से पहले एक लिखित बयान में कंपनी ने कहा, 'कानूनी प्रक्रिया के तहत हमने ज़िला प्रशासन से आवश्यक निर्देश प्राप्त किए. सभी पक्षों के साथ कई दौर की सुनवाई के बाद प्रशासन ने मुआवज़ा निर्धारित किया और जरूरत पड़ने पर पुलिस सुरक्षा के साथ एईएसएल को काम जारी रखने की अनुमति दी.'

