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ई-20 ईंधन पर मोदी सरकार की सफ़ाई के बाद भी नहीं मिले इन छह सवालों के जवाब

ई-20 ईंधन पर मोदी सरकार की सफ़ाई के बाद भी नहीं मिले इन छह सवालों के जवाब

द वायर 1 week ago

ई दिल्ली: 4 जुलाई 2026 को ई-20 ईंधन को लेकर मोदी सरकार की प्रेस ब्रीफिंग साफ तौर पर डैमेज कंट्रोल की कोशिश थी. इसमें पेट्रोलियम मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, ऑटोमोबाइल उद्योग के प्रतिनिधियों और तेल विपणन कंपनियों के अधिकारियों ने बारी-बारी से उपभोक्ताओं की चिंताओं को 'रेज बेट' (यानी लोगों को भड़काने के लिए फैलाई जा रही सामग्री) बताकर खारिज किया, जबकि ई-20 कार्यक्रम के आर्थिक लाभों को बढ़-चढ़कर पेश किया.

यह कार्यक्रम मुख्य रूप से मीडिया और आम उपभोक्ताओं को भरोसा दिलाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया जनसंपर्क अभियान था. यही वजह थी कि इसमें ऑटोमोबाइल कंपनियों के अधिकारी भी मौजूद थे, जो लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि उनकी कारों के इंजन पूरी तरह सुरक्षित हैं.

हालांकि, करीब 90 मिनट तक चली इस प्रेस ब्रीफिंग में कई ऐसे अहम सवालों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया.

यह ब्रीफिंग ऐसे समय आयोजित की गई, जब देशभर से ई-20 को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं और सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान यह खबर आई थी कि सरकार ने ई-20 को एक 'प्रयोग' (एक्सपेरिमेंट) बताया है, हालांकि सरकार अब इस

रही है.

ब्रीफिंग के दौरान अधिकारियों ने लगातार यह संदेश देने की कोशिश की कि पूरे देश में ई-20 का लागू होना हर दृष्टि से आसान और सभी के लिए लाभकारी है. लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल है. ई-20 को लेकर कीमत, सुरक्षा मानकों, नियामकीय (रेगुलेटरी) एकरूपता और उपभोक्ताओं को होने वाले नुकसान की भरपाई जैसे कई महत्वपूर्ण सवाल हैं, जिन पर इस पूरी प्रेस ब्रीफिंग में कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया.

अगर ई-20, ई-10 और ई-0 वाहनों के लिए सुरक्षित है, तो फिर अलग से ई-20-प्रमाणित (सर्टिफाइड) वाहन बनाने और उन्हें अनिवार्य करने की जरूरत क्यों पड़ी?

प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार और ऑटोमोबाइल उद्योग के प्रतिनिधियों ने दावा किया कि 2023 से पहले बने ई-10-कंपैटिबल वाहनों के लिए भी ई-20 पूरी तरह सुरक्षित है. इसके समर्थन में उन्होंने मारुति सुजुकी का उदाहरण देते हुए कहा कि कंपनी ने ई-20 ईंधन के साथ 1.5 करोड़ पुराने वाहनों की सर्विसिंग की है और उनमें ईंधन से जुड़ी कोई समस्या सामने नहीं आई.

हालांकि, यह दावा मौजूदा नियामकीय व्यवस्था से मेल नहीं खाता.

नियमों के मुताबिक अप्रैल 2023 के बाद निर्मित सभी वाहनों का ई-20-सर्टिफाइड होना अनिवार्य है. इसके लिए अलग मटेरियल कंपैटिबिलिटी और इंजन ट्यूनिंग संबंधी मानक तय किए गए हैं.

यदि वास्तव में ई-20 बिना किसी बदलाव के सभी पुराने वाहनों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है, तो फिर अलग से ई-20 प्रमाणन व्यवस्था बनाने, नए तकनीकी मानक तय करने और वाहन निर्माताओं को अपने उत्पादन तंत्र में बदलाव (रीटूलिंग) करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?

एक ओर सरकार पुराने वाहनों के लिए ई-20 को पूरी तरह सुरक्षित बता रही है, वहीं दूसरी ओर नए वाहनों के लिए ई-20 प्रमाणन को अनिवार्य किया गया है. इन दोनों बातों का एक साथ मौजूद होना यह संकेत देता है कि या तो नियामकीय व्यवस्था जरूरत से ज्यादा सख्त बनाई गई है, या फिर 2023 से पहले बने वाहनों के लिए ई-20 की सुरक्षा को लेकर अब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता.

हकीकत यह है कि एथेनॉल पुराने वाहनों में इस्तेमाल होने वाली रबर की सील, प्लास्टिक के पुर्जों और फ्यूल लाइनों पर संक्षारणकारी (कोरोसिव) प्रभाव डालता है. ऐसे में, भले ही ई-10 के अनुरूप बना कोई पुराना वाहन ई-20 इस्तेमाल करने से तुरंत खराब न हो, लेकिन लंबे समय में ई-20 उसके पुर्जों के घिसने और खराब होने की प्रक्रिया को तेज कर देता है.

इसके अलावा, नीति आयोग के अपने आंकड़े भी स्वीकार करते हैं कि ई-10 के लिए डिजाइन किए गए वाहनों में ई-20 इस्तेमाल करने पर फ्यूल एफिशिएंसी में 1 से 2 प्रतिशत तक की कमी आती है. वहीं, वास्तविक परिस्थितियों में कई उपभोक्ताओं ने इससे कहीं अधिक माइलेज घटने की शिकायत की है.

अगर एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता है (58-72 रुपये प्रति लीटर बनाम 102-115 रुपये प्रति लीटर), तो फिर ई-20 की कीमत सामान्य पेट्रोल से कम क्यों नहीं?

तेल विपणन कंपनियां (ओएमसी) एथेनॉल की खरीद 57.97 रुपये प्रति लीटर (सी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल) से लेकर 71.86 रुपये प्रति लीटर (मक्का आधारित एथेनॉल) तक की कीमत पर करती हैं, जबकि दिल्ली में पेट्रोल की खुदरा कीमत लगभग 102 रुपये प्रति लीटर है.

यानी, एथेनॉल प्रति लीटर पेट्रोल की तुलना में 20 से 40 प्रतिशत तक सस्ता है और ई-20 ईंधन में इसकी हिस्सेदारी 20 प्रतिशत है. इसके बावजूद पेट्रोल पंप पर ई-20 की कीमत में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं दिखाई देती.

मोदी सरकार अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि ऐसी कौन-सी मूल्य निर्धारण (प्राइसिंग) व्यवस्था है, जिसके कारण एथेनॉल की कम लागत का लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच रहा है.

हाल ही में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा था कि ई-85, ई-20 की तुलना में 20 रुपये प्रति लीटर सस्ता होगा, क्योंकि उसका कैलोरिफिक वैल्यू कम है. यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है कि ईंधन में एथेनॉल की मात्रा का उसके मूल्य निर्धारण पर असर पड़ता है.

ऐसे में सवाल यह है कि जब ई-20 में भी एथेनॉल की 20 प्रतिशत मिलावट है, तो उसकी कीमत ई-10 के बराबर क्यों बनी हुई है?

यहां सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल एनर्जी डेंसिटी का है. एथेनॉल में प्रति लीटर शुद्ध पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है. इसलिए जब ईंधन में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाया जाता है, तो वाहन का माइलेज घट जाता है.

ब्राज़ील जैसे देशों, जहां फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का व्यापक इस्तेमाल होता है, वहां अधिक एथेनॉल वाले ईंधनों पर भारी सब्सिडी दी जाती है, ताकि उनकी कीमत शुद्ध पेट्रोल की तुलना में काफी कम रहे और माइलेज में होने वाले नुकसान की भरपाई हो सके.

इसके विपरीत, भारत में उपभोक्ता माइलेज घटने का नुकसान भी उठाता है और ई-20 के लिए लगभग उतनी ही कीमत भी चुकाता है, जितनी सामान्य पेट्रोल के लिए.

इस व्यवस्था में कच्चे तेल के आयात में कमी से होने वाली बचत का लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिलता, बल्कि उसका फायदा तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) और सरकार को होता है.

अगर एथेनॉल उत्पादन के लिए कृषि सब्सिडी, आयातित उर्वरकों और अत्यधिक पानी की जरूरत वाली फसलों का इस्तेमाल हो रहा है, तो यह कार्यक्रम अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं के लिए बचत कैसे कर रहा है?

एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ना, धान और मक्का जैसी ऐसी फसलों से होता है, जिनमें पानी और उर्वरकों की भारी आवश्यकता होती है. इन फसलों को बिजली, सिंचाई और उर्वरकों पर सरकारी सब्सिडी मिलती है, जबकि यूरिया और डीएपी जैसे कई उर्वरक विदेशों से आयात किए जाते हैं.

इसके बावजूद सरकार अब तक ऐसा कोई समग्र लागत-लाभ विश्लेषण (कॉस्ट-बेनिफिट एनालिसिस) सार्वजनिक नहीं कर पाई है, जिसमें निम्नलिखित पहलुओं को शामिल किया गया हो-

इन सभी पहलुओं का समग्र आकलन किए बिना यह दावा करना कि एथेनॉल कार्यक्रम अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं के लिए शुद्ध बचत का सौदा है, अब भी एक अनुत्तरित प्रश्न बना हुआ है.

असल में एथेनॉल कार्यक्रम कच्चे तेल के आयात पर होने वाले खर्च को कम करके उसका बोझ कृषि सब्सिडी पर डाल देता है. यह पूरी व्यवस्था मुख्य रूप से ऐसी फसलों पर निर्भर है, जिनमें पानी की अत्यधिक खपत होती है.

उदाहरण के लिए, गन्ने से एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 3,000 लीटर पानी लगता है, जबकि चावल से एक लीटर एथेनॉल के उत्पादन में 10,000 लीटर से अधिक पानी की आवश्यकता होती है.

यदि इसमें भूजल निकालने के लिए इस्तेमाल होने वाली मुफ्त या रियायती बिजली, इन फसलों की खेती में उपयोग होने वाले सब्सिडी वाले उर्वरकों और किसानों को दी जाने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की लागत भी जोड़ दी जाए, तो एथेनॉल की वास्तविक कीमत कहीं अधिक हो जाती है.

इन छिपी हुई लागतों को शामिल किए बिना यह दावा करना कि कच्चे तेल के आयात में कमी से देश की विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है, वास्तविकता से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया दावा हो सकता है.

दूसरे शब्दों में, भारत ऊर्जा सुरक्षा का दावा करने के लिए अपने तेजी से घटते भूजल भंडार को ही ईंधन टैंक तक पहुंचा रहा है.

अब तक मोदी सरकार ने यह सार्वजनिक नहीं किया है कि क्या एथेनॉल कार्यक्रम का फुल लाइफ-साइकिल इकोनॉमिक असेसमेंट किया गया है, जिसमें कृषि सब्सिडी और पर्यावरणीय लागत (एनवायरमेंटल एक्सटर्नैलिटीज़) को भी शामिल किया गया हो.

यदि ऐसा कोई आकलन किया गया है, तो उसके निष्कर्ष क्या हैं, इस बारे में भी सरकार ने कोई जानकारी नहीं दी है.

एथेनॉल की नमी सोखने (हाइग्रोस्कोपिक) की प्रकृति को देखते हुए, ई-20 ईंधन के भंडारण और परिवहन के दौरान पानी की मिलावट रोकने के लिए तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने क्या विशेष इंतज़ाम किए हैं?

एथेनॉल वातावरण से नमी को आसानी से सोख लेता है. इसकी वजह से ई-20 ईंधन में फेज़ सेपरेशन (परतें अलग हो जाना) जैसी समस्या पैदा हो सकती है, जिसमें पानी और एथेनॉल पेट्रोल से अलग होकर टैंक की तलहटी में जमा हो जाते हैं. इससे सूक्ष्मजीव (माइक्रोबियल) पनपने लगते हैं और इंजन में जंग लगने (कोरोज़न) का खतरा बढ़ जाता है.

यह अत्यधिक संक्षारणकारी (कोरोसिव) मिश्रण ईंधन टैंक में जंग लगा सकता है और फ्यूल इंजेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पुर्जों को भी नुकसान पहुंचा सकता है.

दरअसल, भंडारण और नमी से जुड़ा यही जोखिम वह प्रमुख कारण था, जिसकी वजह से भूटान ने आधिकारिक तौर पर भारतीय तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) के ई-20 ईंधन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.

पीआईबी ने ई-20 ईंधन से कीड़े आकर्षित होने और जंग लगने संबंधी वायरल दावों को खारिज तो किया, लेकिन यह नहीं बताया कि देशभर के लगभग 90,000 पेट्रोल पंपों पर पानी की मिलावट के जोखिम से निपटने के लिए तेल विपणन कंपनियों ने कौन-से विशेष बुनियादी ढांचे, गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था और निगरानी तंत्र विकसित किए हैं.

ईंधन में पानी की मिलावट रोकने के लिए अपनाए जाने वाले मानक उपाय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छी तरह स्थापित हैं. इसके बावजूद सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि ई-20 की अधिक नमी सोखने वाली प्रकृति को देखते हुए भारतीय ओएमसी ने ई-10 या सामान्य पेट्रोल (ई-0) की तुलना में कोई अतिरिक्त या अधिक सख्त भंडारण एवं गुणवत्ता नियंत्रण प्रोटोकॉल लागू किए हैं या नहीं.

न्यायालय की कार्यवाही में जिस 2021 की नीति आयोग की एथेनॉल ब्लेंडिंग संबंधी सलाह का हवाला दिया गया था, उसे बाद में हटाया क्यों गया या सार्वजनिक पहुंच से बाहर क्यों कर दिया गया?

ई-20 को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने नीति आयोग की 2021 की 'रिपोर्ट रोडमैप फॉर एथेनॉल ब्लेंडिंग इन इंडिया 2020-25' का हवाला दिया था. इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि ई-20 मिश्रित ईंधन के इस्तेमाल से कारों की फ्यूल एफिशिएंसी में 6-7 प्रतिशत और मोटरसाइकिलों में 3-4 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है.

रिपोर्ट में नीति आयोग ने स्पष्ट रूप से सिफारिश की थी कि पेट्रोलियम मंत्रालय पुराने वाहनों के लिए ई-10 पेट्रोल की उपलब्धता बनाए रखने की योजना अधिसूचित करे. दूसरी ओर, पेट्रोलियम मंत्रालय ने बाद में ई-20 के पर्यावरणीय लाभों के समर्थन में नीति आयोग के लाइफ-साइकिल एमिशन अध्ययन का हवाला दिया.

हालांकि, कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मूल सलाह या उससे संबंधित वेबपेज बाद में हटा दिए गए या अब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं, जिससे पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े होते हैं.

सरकार ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस महत्वपूर्ण नीतिगत दस्तावेज़ को सार्वजनिक पहुंच से क्यों हटाया गया, क्या इसमें किए गए अनुमानों को बाद में संशोधित किया गया था, या फिर बाद में उपलब्ध हुए आंकड़ों ने फ्यूल एफिशिएंसी में कमी संबंधी उसके निष्कर्षों की पुष्टि की या उनका खंडन किया.

ई-20 के कारण माइलेज घटने और रखरखाव (मेंटेनेंस) का खर्च बढ़ने पर उपभोक्ताओं को क्या मुआवजा या राहत उपलब्ध है?

कई सर्वेक्षणों के अनुसार, 2023 से पहले बने वाहनों के 55 से 66 प्रतिशत मालिकों ने ई-20 लागू होने के बाद 10 प्रतिशत से अधिक माइलेज घटने और वाहन के पुर्जों के अधिक घिसने (वेयर एंड टियर) की शिकायत की है.

हालांकि, मोदी सरकार ने इन दावों को 'बेबुनियाद' और 'रेज बेट' बताकर खारिज किया है, लेकिन उसने अब तक इन महत्वपूर्ण सवालों का जवाब नहीं दिया है कि-

सुप्रीम कोर्ट ने एथेनॉल-मुक्त पेट्रोल उपलब्ध कराने की मांग वाली याचिकाओं को राष्ट्रीय हित और किसानों के लाभ का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था, लेकिन इससे उस व्यक्तिगत उपभोक्ता की आर्थिक समस्या का समाधान नहीं होता, जिसे ई-20 के कारण अधिक खर्च उठाना पड़ रहा है.

सरकार ने अब तक यह नहीं बताया है कि कच्चे तेल के आयात में कमी और विदेशी मुद्रा की बचत जैसे जिन लाभों को सार्वजनिक हित बताया जा रहा है, उनका बोझ आम नागरिक क्यों उठाएं? दूसरे शब्दों में, यदि इस नीति के व्यापक आर्थिक लाभ पूरे देश को मिलने हैं, तो कम माइलेज और बढ़े हुए रखरखाव खर्च जैसी व्यक्तिगत आर्थिक लागत केवल उपभोक्ताओं पर ही क्यों डाली जा रही है?

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