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क्या वीबी-जी राम जी महिलाओं को नरेगा जैसे मौके दे पाएगा?

क्या वीबी-जी राम जी महिलाओं को नरेगा जैसे मौके दे पाएगा?

द वायर 1 week ago

क्षिणी राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में पुरुष रोज़गार के लिए प्रवास करते हैं. वर्ष 2014 में राजस्थान में प्रवास पर प्रकाशित एक राज्य-स्तरीय अध्ययन के अनुसार दक्षिणी राजस्थान के 56.6 प्रतिशत परिवारों में कम-से-कम एक पुरुष प्रवासी है.

ऐसे में यहां के परिवारों की आजीविका का बड़ा हिस्सा महिलाओं के श्रम पर टिका हुआ है.

यही कारण है कि यहां की महिलाओं के लिए नरेगा केवल मज़दूरी पाने की योजना नहीं, बल्कि पंचायत तक पहुंचने, अपनी बात रखने, सामूहिक रूप से संगठित होने और स्थानीय व्यवस्था से जवाबदेही मांगने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है.

महिलाओं के लिए नरेगा सिर्फ रोज़गार नहीं

हमारे उजाला संगठन से जुड़ीं हज़ारों महिलाएं अब तक नरेगा के लिए आवेदन करने पंचायत पहुंच चुकी हैं. यह आंकड़ा केवल आवेदनों की संख्या नहीं बताता, बल्कि यह उन महिलाओं की कहानी भी कहता है जिन्हें लंबे समय तक पंचायतों में बैठने, बोलने या सवाल करने से रोका जाता रहा है.

काम मांगने की इस प्रक्रिया ने उन्हें पंचायत भवन तक जाने, सचिव, सरपंच और अन्य कर्मचारियों से बात करने तथा आवेदन की रसीद मांगने की हिचक को धीरे-धीरे कम करने का मौका दिया. एक महिला संगठन की लीडर बताती हैं, 'अकेले जाने से कोई पंचायत में हमारी बात नहीं सुनता था. लेकिन हम सब महिलाएं साथ जाती हैं तो उन्हें रसीद देनी ही पड़ती है.'

वर्ष 2016-17 में डूंगरपुर ज़िले की एक पंचायत में लगभग 200 महिलाओं से नरेगा के लिए आवेदन करने के 50 रुपये लिए जा रहे थे. महिलाओं ने इसका विरोध किया और जिनसे पैसा लिया गया था, उन्हें वह राशि वापस दिलवाई. यह घटना केवल गलत वसूली के खिलाफ खड़े होने की नहीं, बल्कि इस बात की भी गवाह है कि महिलाएं सामूहिक रूप से पंचायत और प्रशासन से जवाब मांग रही थी.

हालांकि इस विरोध के चलते कई महिलाओं को काम नहीं मिला. और कुछ को मज़दूरी भी देरी से मिली. इसके बावजूद महिलाएं पीछे नहीं हटीं. वे पंचायत पहुंची, आवेदन करती रही और व्यवस्था की खामियों को सामने लाती रही.

पंचायत की बैठकों में महिलाएं केवल नरेगा की बात नहीं करतीं. वे घर-परिवार, आंगनवाड़ी, स्कूल, सड़क, राशन, आधार में गलत नाम, बंद पड़ी पेंशन, जनाधार कार्ड में दर्ज गलत जन्मतिथि, अस्पतालों में डॉक्टर की कमी, हिंसा और धोखाधड़ी जैसे मुद्दों पर भी चर्चा करती हैं. लेकिन उनके अनुसार उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि अब वे घर से बाहर निकल सकती हैं, पंचायत में बैठ सकती हैं, ज़रूरत पड़े तो पंचायत खुलवा सकती हैं और सरपंच, सचिव या एलडीसी (लोअर डिवीज़न क्लर्क) से अपने अधिकारों पर सवाल पूछ सकती हैं.

मज़दूरी के साथ दुख-सुख बांटने की जगह

नरेगा की साइटें महिलाओं के लिए केवल काम करने की जगह नहीं, बल्कि आपस में बातचीत करने और घुलने-मिलने का परिवेश भी हैं.

खेरवाड़ा क्षेत्र की एक नरेगा साइट पर महिलाएं काम करते हुए आपस में बात कर रही थी. एक महिला ने कहा, 'आज तो बड़ी ठंड है. मैं तो आलस कर गई, इसलिए बस रोटी लाई, सब्ज़ी नहीं.' दूसरी महिला ने हंसते हुए कहा, 'मैं सब्ज़ी लाई हूं.' दोनों की बात सुनकर पास बैठी एक बुज़ुर्ग महिला बोली, 'मैं तो बस चाकू लाई हूं. कोई ककड़ी लाया हो तो मैं खा लूंगी.'

रोज़ाना की यह बतकही शायद सुनने में मामूली लग सकती है, लेकिन महिलाओं के लिए इनके गहरे अर्थ होते हैं. घर की चारदीवारी और घरेलू ज़िम्मेदारियों से बाहर यह वह जगह है, जहां वे अपनी सहेलियों के साथ खुलकर बात कर सकती हैं, अपने तनाव बांट सकती हैं और कुछ देर के लिए अपने जीवन को अलग ढंग से जी सकती हैं.

महिलाओं के लिए काम करना केवल पैसे कमाने का माध्यम नहीं होता. यह घर से बाहर निकलने, दोस्ती करने और अपनी पहचान को केवल पत्नी, बहू या बेटी से आगे ले जाकर एक कामगार के रूप में देखने का अवसर भी होता है. नरेगा साइट पर महिलाएं योजनाओं से जुड़ी जानकारियां साझा करती हैं, आवेदन की आखिरी तारीखों पर बात करती हैं, बैंक या ई-मित्र साथ जाने की योजना बनाती हैं और एक-दूसरे की मदद करती हैं.

नरेगा की इन साइटों का महिलाओं के स्वास्थ्य से भी अप्रत्यक्ष नाता है. उनका अच्छा स्वास्थ्य केवल पोषण पर निर्भर नहीं रहता. उनके लिए ऐसी जगहें भी ज़रूरी होती हैं जहां वे तनाव, चिंता और भावनाओं को साझा कर सकें. ऐसे में काम की जगह कई महिलाओं के लिए मनोवैज्ञानिक सहारे की जगह भी बनती दिखाई देती है.

आर्थिक ताकत और मोलभाव की क्षमता का विकास

कोदार गांव की संगठन लीडर किरण बाई (बदला हुआ नाम) कहती हैं, 'नरेगा का पैसा आवे, तो खुसी मले, नरेगा न चाले, तो पैसा कोणी आए.'

दक्षिणी राजस्थान के उन इलाकों में, जहां बड़ी संख्या में पुरुष प्रवास पर जाते हैं, महिलाओं के लिए अपनी आय होना आर्थिक निर्भरता कम करने का माध्यम बनता है. यह कमाई उन्हें घर के खर्चों, बच्चों की ज़रूरतों, यात्रा और अपने छोटे-छोटे निजी खर्चों से जुड़े निर्णय लेने का आत्मविश्वास देती है.

महिलाओं और कार्यकर्ताओं का कहना है कि नरेगा ने स्थानीय श्रम बाज़ार में उनकी मोलभाव की ताकत भी बढ़ाई है. जैसा कि एक कार्यकर्ता बताती हैं, 'अभी तो महिलाएं ठेकेदार या मालिक को बोल देती हैं कि 200-250 रुपये तो नरेगा में मिल जाते हैं, इससे कम में काम नहीं करेंगे.'

इस तरह नरेगा की मज़दूरी केवल सरकारी भुगतान नहीं, बल्कि स्थानीय श्रम बाज़ार में न्यूनतम सम्मानजनक मज़दूरी का एक संदर्भ भी बनती है. महिलाओं की चिंता यह है कि यदि गांव में काम की उपलब्धता कम हुई, तो उन्हें निजी निर्माण कार्यों या दूसरे असंगठित क्षेत्रों में कम मज़दूरी पर काम करना पड़ सकता है, जहां उनके पास मोलभाव की ताकत कम होगी.

नरेगा में काम: अधिकारों और सरकारी योजनाओं तक पहुंच का ज़रिया

नरेगा की अहमियत केवल मज़दूरी तक सीमित नहीं है. ग्रामीण इलाकों में स्थानीय निर्माण कार्य सीमित होने के कारण कई महिलाओं के लिए नरेगा के 90 दिन काम करने का रिकॉर्ड ही बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एक्ट के तहत पंजीकरण, छात्रवृत्ति, मातृत्व लाभ और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंच का आधार बनता है.

जब काम मांगने का अधिकार कमज़ोर पड़ता है, तो महिलाएं क्या खोती हैं?

महिलाओं की चिंता केवल इस बात को लेकर नहीं है कि उन्हें काम मिलेगा या नहीं. उनकी चिंता यह भी है कि यदि काम मांगने की प्रक्रिया सीमित हुई, काम का स्वरूप बदल गया या काम की उपलब्धता अनिश्चित हुई, तो पंचायत तक उनकी सामूहिक पहुंच, योजनाओं तक पहुंचने के रास्ते और अपनी कमाई पर निर्णय लेने की क्षमता भी कमज़ोर पड़ सकती है.

हमने महिलाओं के साथ काम करने के दौरान यह समझा कि नरेगा में पहले से ही भुगतान में देरी और काम मिलने की अनिश्चितता जैसी समस्याएं रही हैं. ऐसे में आशंका है कि यदि व्यवस्थागत बदलावों के बाद राज्यों पर अधिक वित्तीय भार पड़ा या काम की उपलब्धता सीमित हुई, तो ग्रामीण महिलाओं के लिए काम तक पहुंच और कठिन हो सकती है.

वीबी-जी राम जी को लेकर महिलाओं की आशंकाएं

यदि महिलाओं को गांव में पर्याप्त काम नहीं मिलेगा, तो उन्हें श्रम बाज़ार की ओर रुख करना पड़ेगा, जहां उनको अक्सर अपेक्षाकृत कम भुगतान होता है. ऐसी स्थिति में वे नरेगा की मज़दूरी का हवाला देकर बेहतर भुगतान की मांग करने की स्थिति में भी नहीं रहेंगी. इससे उनकी मोलभाव की क्षमता और आर्थिक स्वतंत्रता दोनों प्रभावित हो सकती हैं.

इसी कारण कई महिलाएं नरेगा के स्थान पर प्रस्तावित वीबी-जी राम जी एक्ट को लेकर आशंकित हैं. उनका मानना है कि यदि काम की मांग करने, काम के चयन और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रियाएं कमज़ोर होती हैं, तो महिलाओं और पंचायत के बीच पिछले कई वर्षों में विकसित हुआ संबंध भी प्रभावित हो सकता है.

महिलाओं को चिंता है कि काम का बजट, प्राथमिकताएं और उनके क्रियान्वयन से जुड़े निर्णय स्थानीय समुदाय द्वारा लिए जाने की बजाय अधिक केंद्रीकृत हो जाएंगे. साबला क्षेत्र की संगठन लीडर गौरी (बदला हुआ नाम) कहती हैं, 'अब दिल्ली वाले तय करेंगे कि मेरे घर में चूल्हा जलेगा या नहीं.'

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि महिलाओं को काम मिलेगा या नहीं. सवाल यह भी है कि क्या उनके पास वह सार्वजनिक और लोकतांत्रिक स्थान बचा रहेगा, जहां वे पंचायत से जवाब मांगना सीख रही थी, अपनी मज़दूरी पर मोलभाव कर रही थी, एक-दूसरे का सहारा बन रही थी और घर की सीमाओं से बाहर अपनी एक स्वतंत्र पहचान गढ़ रही थी.

(श्रद्धा जैन आजीविका ब्यूरो के फैमिली एंपावरमेंट प्रोग्राम में एग्ज़ीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं. वह दक्षिणी राजस्थान में महिलाओं के उजाला संगठन के साथ भी काम कर रही हैं.)

(यह लेख मूल रूप से आईडीआर हिंदी पर प्रकाशित हुआ है.)

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