नई दिल्ली: विपक्षी सांसदों के वॉकआउट और करीब एक घंटे तक चली चर्चा के बाद राज्यसभा में बुधवार (29 जुलाई) को मोदी सरकार का वह विधेयक पारित कर दिया गया, जिसमें राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के गायन को रोकने या उसमें बाधा डालने वालों के लिए सज़ा का प्रावधान किया गया है.
विधेयक पर चर्चा शुरू होने के लगभग आधे घंटे बाद विपक्षी सांसदों ने गृह मंत्री अमित शाह की अनुपस्थिति और पिछले सप्ताह संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस द्वारा बल प्रयोग के विरोध में नारेबाज़ी की और सदन से वॉकआउट कर दिया.
यह विधेयक राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन का प्रस्ताव करता है. इसके तहत अब केवल राष्ट्रीय गान ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के गायन को रोकने या उसमें बाधा डालने पर भी तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सज़ा हो सकेगी.
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद मनोज झा ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि 'सम्मान कानून बनाकर नहीं कराया जा सकता.'
उन्होंने कहा, 'अपने छात्र जीवन में हम नारा लगाते थे- 'वंदे मातरम, कर ले थोड़ी शर्म.' क्या अब इसे भी अपमान माना जाएगा? मैं यह सवाल युवाओं की ओर से भी पूछ रहा हूं. वंदे मातरम, कर ले थोड़ी शर्म.'
इसके बाद उपसभापति हरिवंश ने अगले वक्ता को बोलने के लिए आमंत्रित किया.
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, जो विपक्ष के अन्य सांसदों के वॉकआउट के बाद भी सदन में मौजूद रहे, उन्होंने भी अपने भाषण में पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया.
उन्होंने कहा, 'वंदे मातरम का अर्थ मातृभूमि की वंदना है. हम पूरी दुनिया के सामने भारत माता की जय का आह्वान करते हैं, लेकिन दिल्ली में उसी भारत माता की बेटियों के सिर फोड़ दिए जाते हैं.'
बाद में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने चर्चा का जवाब देते हुए संशोधन विधेयक का बचाव किया. उन्होंने इसे 'भारत की आत्मा, राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता' बताया.
करीब दस मिनट के अपने भाषण में राय ने कई बार कांग्रेस पर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस 'तुष्टीकरण की राजनीति के जरिए हमेशा देश के गौरव का अपमान करती रही है' और 'वंदे मातरम का विरोध करती है.'
उन्होंने कहा, 'लेकिन इस देश के बेटे-बेटियां वंदे मातरम का विरोध देख रहे हैं. वंदे मातरम का विरोध करना, 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' गैंग का मनोबल बढ़ाना है.'
राय के जवाब के बाद विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया. सदन में इस पर विचार शुरू होने के लगभग एक घंटे बाद यह विधेयक पास हो गया.
इससे पहले शुक्रवार को जब नित्यानंद राय ने यह विधेयक पेश किया था, तब भी राज्यसभा में इस पर संक्षिप्त चर्चा हुई थी.
संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही पिछले कई दिनों से बाधित रही है, क्योंकि विपक्ष 20 जुलाई को दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के लिए सरकार से माफी की मांग कर रहा है.
क्या है वंदे मातरम विवाद?
आम तौर पर 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाते हैं. इसकी वजह यह है कि बाद के कुछ अंतरों में ऐसे हिंदू धार्मिक संदर्भ हैं, जिन्हें लेकर आपत्ति जताई जाती रही है.
हालांकि, इस साल की शुरुआत में गृह मंत्रालय ने निर्देश जारी किए थे कि कुछ सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सभी छह अंतरे गाए जाएं. मंत्रालय ने यह भी कहा था कि यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान दोनों प्रस्तुत किए जाएं, तो पहले वंदे मातरम और उसके बाद जन गण मन गाया जाए.
इन निर्देशों को एक महीने बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. तब अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा था कि ये केवल एडवाइजरी का हिस्सा हैं और इनका पालन न करने पर कोई दंड नहीं है.
हालांकि, अब पारित संशोधन विधेयक में वंदे मातरम के गायन में बाधा डालने पर आपराधिक सज़ा का प्रावधान किया गया है.
मोदी सरकार पहले भी वंदे मातरम के मुद्दे पर कांग्रेस की आलोचना करती रही है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 1930 के दशक में केवल पहले दो अंतरे गाने पर सहमत होकर उसने मुस्लिम लीग के सामने झुकने और तुष्टीकरण की राजनीति करने का काम किया था.
बीते दिसंबर लोकसभा में प्रधानमंत्री ने कहा था, 'दुर्भाग्य से कांग्रेस की नीतियां आज भी वैसी ही हैं. इतना ही नहीं, आईएनसी (कांग्रेस) धीरे-धीरे एमएमसी (माओवादी-मुस्लिम लीग कांग्रेस) में बदल गई है.'
हालांकि, स्वतंत्रता से पहले कांग्रेस ने वंदे मातरम के केवल पहले दो अंतरे गाने का निर्णय इसलिए लिया था क्योंकि बाद के अंतरों में मौजूद हिंदू धार्मिक संकेतों से मुसलमानों सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की भावनाएं आहत हो सकती थीं.
पिछले वर्ष द वायर से बातचीत में इतिहासकार मृदुला मुखर्जी ने कहा था कि कांग्रेस ने एक ओर अल्पसंख्यकों की चिंताओं को ध्यान में रखने की कोशिश की थी और दूसरी ओर मुस्लिम लीग जैसी सांप्रदायिक ताकतों के आगे झुकने से भी परहेज़ किया था.
उन्होंने बताया कि कांग्रेस द्वारा केवल पहले दो अंतरे गाने का फैसला लेने के बाद भी मुहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने इन दो अंतरों के गायन का भी विरोध किया था.
मृदुला मुखर्जी ने करण थापर से कहा था, 'इसलिए यह कहना गलत होगा कि कांग्रेस मुस्लिम लीग की मांग के आगे झुक गई थी. मुस्लिम लीग की मांग तो यह थी कि पूरे गीत को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में हटा दिया जाए, जिसे कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया.'

