नई दिल्ली: सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने कर्ज चुकाने में चूक करने वाले छोटे उधारकर्ताओं से बड़े कॉरपोरेट और संस्थागत कर्जदारों की तुलना में अधिक राशि वसूल की है.
मनीलाइफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2016-17 से 2025-26 तक के दस वित्तीय वर्षों में बैंक ने 1 करोड़ रुपये से कम कर्ज बकाया रखने वाले उधारकर्ताओं से 5,004.28 करोड़ रुपये की वसूली की.
इसके विपरीत, बैंक 100 करोड़ रुपये से अधिक कर्ज बकाया रखने वाले बड़े उधारकर्ताओं से केवल 3,874.41 करोड़ रुपये ही वसूल कर सका.
इसी अवधि में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने बड़े डिफॉल्टरों के 26,701.55 करोड़ रुपये के कर्ज को राइट-ऑफ कर दिया, जबकि छोटे उधारकर्ताओं के 6,774.23 करोड़ रुपये के कर्ज को राइट-ऑफ किया गया.
आंकड़ों के अनुसार, बड़े कर्जदारों से वसूली की दर महज 14.5% रही, जबकि छोटे कर्जदारों से वसूली की दर 74% दर्ज की गई.
उल्लेखनीय है कि ये आंकड़े पुणे के आरटीआई कार्यकर्ता और सजग नागरिक मंच के अध्यक्ष विवेक वेलणकर द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन के जवाब में सामने आए हैं. मनीलाइफ ने अपनी रिपोर्ट में इन आंकड़ों का उल्लेख किया है.
बड़े कर्जदारों की राइट-ऑफ की राशि में बड़ी हिस्सेदारी, लेकिन वसूली की दर कम
गौरतलब है कि किसी कर्ज को राइट-ऑफ किए जाने का मतलब यह नहीं है कि उसकी वसूली की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है. डिफॉल्ट के मामलों में बैंक बाद में भी वसूली की कार्रवाई जारी रख सकते हैं.
हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) उन कंपनियों के नाम पूरी तरह सार्वजनिक नहीं करता, जिन पर बड़े पैमाने पर कर्ज बकाया है.
आरटीआई के जरिए सामने आए आंकड़े कर्ज राइट-ऑफ और वसूली के मामले में एक स्पष्ट अंतर दिखाते हैं. बड़े कर्जदार कुल राइट-ऑफ की राशि में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं, लेकिन उनसे वसूली की दर काफी कम है.
इसके उलट, छोटे डिफॉल्टरों के कर्ज अपेक्षाकृत कम राइट-ऑफ किए गए और उनसे वसूली की दर कहीं अधिक रही.
मनीलाइफ के अनुसार, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने उन बड़े डिफॉल्टरों में से किसी एक का भी नाम बताने से इनकार कर दिया, जिनका राइट-ऑफ किया गया बकाया हजारों करोड़ रुपये तक पहुंचता है.
हालांंकि, इससे पहले आरबीआई भी 'जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों' यानी विलफुल डिफॉल्टर्स की सूची सार्वजनिक कर चुका है. ये उन उधारकर्ताओं का एक हिस्सा हैं, जिनके कर्ज को राइट-ऑफ किया गया है या जिनके खाते गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) की श्रेणी में चले गए हैं. यह जानकारी आरटीआई अधिनियम के तहत सार्वजनिक की गई थी.
इस संबंध में द वायर द्वारा मई 2019 में एक आरटीआई आवेदन दायर कर सवाल पूछा गया था, जिसके जवाब में आरबीआई ने नवंबर 2019 में ऐसे 30 विलफुल डिफॉल्टरों की सूची जारी की थी. इसमें 30 अप्रैल 2019 तक बकाया कर्ज और राइट-ऑफ की गई राशि का विवरण दिया गया था.
द वायर ने उस समय रिपोर्ट किया था कि आरबीआई से जानकारी मांगने के लिए 2011 में दायर कई आरटीआई आवेदन केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) तक पहुंचे थे. उस समय आयोग का नेतृत्व शैलेष गांधी कर रहे थे. उन्होंने आरबीआई को याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई जानकारी, जिसमें जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों की सूची भी शामिल थी, सार्वजनिक करने का निर्देश दिया था.
वेलणकर के हवाले से मनीलाइफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि आरटीआई आवेदक इस तरह की कर्ज वसूली के पैटर्न पर 'मूक दर्शक' बने रहने के लिए बैंकिंग नियामक आरबीआई और केंद्रीय वित्त मंत्रालय को समान रूप से जिम्मेदार मानते हैं.
उनका कहना है कि इस मामले में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के निदेशक मंडल को भी जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.

