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टर्निंग प्वाइंट
देवरहा बाबा के कहने पर राजीव गांधी ने करवाया था विवादित भूमि पर शिलान्यास

अयोध्या आंदोलन में शिलान्यास बेहद अहम पड़ाव था. शिलान्यास ने मंदिर निर्माण के स्वप्न को नई ऊंचाइयां दीं. बीजेपी की 2 सांसद वाली संख्या को एक झटके में 85 तक पहुंचा दिया. पर शिलान्यास कराने के पीछे न बीजेपी थी, न वीएचपी और न ही संघ. ये काम एक संत के निर्देश पर एक प्रधानमंत्री का था. प्रधानमंत्री भी कांग्रेस पार्टी का.

ये उस समय की बात है जब राम जन्मभूमि ट्रस्ट के कार्यकारी अध्यक्ष रामचंद्र परमहंस ने ऐलान कर दिया था कि विश्व हिंदू परिषद् ने जिस जगह को शिलान्यास स्थल घोषित किया है, उसे बदला नहीं जाएगा. उनकी दलील थी कि जमीन विवादित कैसे हो सकती है. उन्होंने इस जमीन की ट्रस्ट के नाम पर पक्की रजिस्ट्री कराई है. अगर सरकार इसे नजूल की जमीन मानती भी है तो इसे साबित करने की जिम्मेदारी सरकार की है.

दूसरी तरफ, राज्य सरकार चाहती थी कि शिलान्यास तो हो पर जगह बदल दी जाए. ताकि सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे. सरकार ने परिषद् को बगल की खाली जमीन दिलाने की पेशकश की. विहिप ने इसे सिरे से खारिज कर दिया और देवरहा बाबा से संपर्क कर उनसे दखल देने को कहा. क्योंकि प्रधानमंत्री राजीव गांधी और विश्व हिंदू परिषद् के बीच शिलान्यास को लेकर देवरहा बाबा ही मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे. यहीं से शिलान्यास में देवरहा बाबा का रोल शुरू हुआ.

दरअसल, उस वक्त राजीव गांधी अपने आस-पास के माहौल और परिस्थितियों के दबाव में थे. उनके सभी साथियों ने उनका साथ छोड़ दिया था. वे समझ नहीं पा रहे थे क्या करें. उन्हें किसी ने देवरहा बाबा से संपर्क करने को कहा. देवरहा बाबा अवतारी पुरुष थे. उनकी उम्र के बारे में कोई आकलन नहीं था. वे धरती पर नहीं रहते थे, हमेशा पानी में 12 फुट ऊंचे मचान में रहते थे.

इस योगी ने हिमालय में साधना की थी. देवरिया जिले के लार रोड के पास मइल के रहने वाले बाबा जीवन भर निर्वस्त्र रहे. बाबा रामभक्त थे. इसीलिए ज्यादा वक्त वो सरयू के किनारे ही रहते थे. बाबा का आशीर्वाद बड़ा प्रभावी होता था. राजीव गांधी की मां इंदिरा जी भी जब किसी समस्या से घिरती तो समाधान के लिए बाबा के पास ही जाती थी.

राजीव गांधी 6 नवंबर को वृंदावन में बाबा से मिलने गए. बाबा ने कहा मंदिर बनना चाहिए. आप शिलान्यास करवाएं. और शिलान्यास की जगह बदली न जाए. कहते हैं उसी वक्त से राजीव शिलान्यास के लिए प्रयासरत हुए. दूसरे दिन बाबा ने विहिप के नेता श्रीशचंद्र दीक्षित को बुलाया. उनसे कहा आप निश्चिंत रहें, हमने प्रधानमंत्री से उसी जगह पर शिलान्यास करने को कहा है. जहां आप लोगों ने झंडा गाड़ा है. यानी शिलान्यास का फैसला लखनऊ दिल्ली में नहीं बल्कि वृंदावन में हुआ था. वो भी देवरहा बाबा के आशीर्वाद से.

इसके बाद राजीव गांधी के दूत लगातार बाबा के संपर्क में रहे. बाद में अयोध्या में वही हुआ, जो इन बैठकों में तय हुआ. दोनों पक्ष बाबा जी की बात आंख मूंद कर मान रहे थे. राम जन्मभूमि न्यास के प्रबंध न्यासी अशोक सिंघल ने बातचीत में मुझसे कहा था कि "देवरहा बाबा एक धार्मिक महापुरुष हैं, जो हमारे हर कदम पर मार्गदर्शन करते रहे हैं."

बाबा ने 6 नवंबर को राजीव गांधी से कहा था कि उन्हें मंदिर निर्माण के विश्व हिंदू परिषद् की मांग का समर्थन करना चाहिए. बाद की घटनाओं से साफ है कि गांधी ने वहीं किया जो बाबा ने उनसे कहा. शिलान्यास के पहले दिन बाबा ने शिलान्यास स्थल बदलने का सरकारी सुझाव भी ठुकरा दिया. वैसे विश्व हिंदू परिषद् के कुछ नेता जगह बदलने के लिए तैयार हो गए थे. ऐसा विनय कटियार का कहना था.

असल कहानी ये थी कि आखिरी वक्त तक सरकार शिलान्यास स्थल को प्लाट नं. 576 में स्थानांतरित करना चाहती थी. इस जगह पर कोई विवाद नहीं था. यह जगह मूल स्थल से सात गज दूर थी. पांच नवंबर को कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने ऐसा करवाने के लिए इलाके का दौरा किया था. यह प्लाट रामकृपाल दास के पास लीज पर था.

उन्होंने शिलान्यास के लिए अपनी जमीन देने की पेशकश की. वहां एक नहानघर और एक दीवार बनी हुई थी. जिसे शिलान्यास की जगह बनाने के लिए तोड़ा जा चुका था. छह नवंबर को राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अर्जी देकर पूछा था कि क्या प्लाट नं. 586 विवादित जमीन में आता है.

इसके जवाब में, इलाहाबाद हाईकोर्ट की विशेष डिवीजन बेंच ने अपने पूर्व अंतरिम आदेश को साफ करते हुए उस भूमि को विवदित बताया, जिस पर विश्व हिंदू परिषद् शिलान्यास करने जा रही थी. बेंच ने अपने फैसले में कहा कि विश्व हिंदू परिषद् ने जिस भूमि पर राम मंदिर के शिलान्यास के लिए झंडे और बल्लियों की बाड़ लगाई है वह विवादित है इसलिए उसकी यथास्थिति कायम रखी जानी चाहिए.

अदालत ने साफ किया कि यह प्लाट विवादास्पद जमीन में ही आता है. इससे किसी शक की गुंजाइश नहीं है. अब सबाल था कि सरकार को अगर इस प्लाट की सही स्थिति का पता था तो उसने वह बात अदालत से पूछी ही क्यों? प्रशासनिक अफसरों ने बताया कि इसकी एक वजह यह थी कि शिलान्यास की जगह बदलने के लिए विहिप पर कानूनी दबाव बनाया जाए.

अगर विश्व हिंदू परिषद् इसके लिए तैयार हो जाती तो कोई समस्या ही नहीं थी. शिलान्यास और महायज्ञ गैर-विवादित जमीन पर आराम से संपन्न हो जाते. बाबरी मसजिद एक्शन कमेटी को भी उस जगह पर शिलान्यास करने पर कोई एतराज नहीं होता. इस तरह सरकार हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को खुश कर लेती और इन दिनों दोनों की खुशी का मतलब था वोट.

इस सरकारी पेशकश कि दुविधा में फंस विश्व हिंदू परिषद् के नेता बंट गए. देवरहा बाबा ने अशोक सिंघल और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एससी दीक्षित से वृंदावन बुलाया. सिंघल ने बताया कि "देवरहा बाबा ने साफ-साफ कहा कि हमें शिलान्यास तय जगह पर ही करना चाहिए."

उन्होंने यह भी कहा कि राजीव गांधी भी वहीं शिलान्यास को राजी है. ऐसा उन्होंने मुझे भरोसा दिया है. हाईकोर्ट के फैसले और देवरहा बाबा के निर्देश के बीच सरकार में खलबली मची. प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दूसरे दिन 8 नवंबर को सुबह-सुबह गृहमंत्री बूटा सिंह को लखनऊ भेजा. क्योंकि शिलान्यास पर प्रधानमंत्री राजीव गांधी और मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी में सहमति नहीं बन पा रही थी.

आज्ञाकारी और चापलूस छवि के होने के बावजूद मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी शिलान्यास के लिए राजी नहीं थे. ये वही नारायण दत्त तिवारी थे जिन्होंने इमरजेंसी के दौरान खुशामदी में राजीव गांधी के छोटे भाई संजय गांधी की चप्पल उठाई थी. फिर भी वे इस मामले में राजीव गांधी का कहा मान नहीं रहे थे.

मतलब साफ था वे शिलान्यास से कांग्रेस पार्टी को होने वाले नुकसान को देख रहे थे. छह नवंबर को हाईकोर्ट के शिलान्यास पर रोक के बाद राजीव गांधी चाहते थे कि राज्य सरकार हाईकोर्ट से साफ कहे कि शिलान्यास वाली जगह विवादित नहीं है. नारायण दत्त तिवारी इसके लिए राजी नहीं थे.

काफी हीलहुज्जत के बाद यह तय हुआ फैजाबाद के जिलाधिकारी नक्शे की पैमाइश कर यह बयान देंगे कि शिलान्यास वाली जगह विवादित नहीं है. मिटिंग के बाद फैजाबाद के जिलाधिकारी को ऐसा कहने के निर्देश भी दिए गए. पंडित एन.डी. तिवारी इसी बात से उखड़े हुए थे.

हालांकि, तिवारी जी को तब 'न्यू डेल्ही तिवारी' भी कहा जाता था. क्योंकि वे सारे फैसले दिल्ली से पूछ कर करते थे. पर अपने स्वभाव के खिलाफ इस मामले में वे अड़े थे. इतिहास ने बाद में उन्हें सही साबित किया.

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